Sunday, 22 July 2018

"वर्षा ऋतु भाय रही हर मन "

वर्षा ऋतु भाय रही हर मन , उत्सव सी मनाय रही है धरा | 
बुँदे जिमि पायल सी रुनझुन , चहुँ ओर उड़ाय रहे बदरा  || 
मदमस्त हुए सब जीव बहुत , धरती लहराय रही अंचरा  | 
नव  अंकुर फूट रहे थल पे , दादुर अब देई रहे पहरा  || १|| 


कर ताल - तलाई रहे संगम , सरिता निज सिंधु समाय रही | 
नभ प्यास बुझाय रहा बसुधा , तरुवर से लता लिपटाय रही || 
बगियां में मोर है नाचि रहे , अरु कोयल गीत सुनाय  रही | 
जिनके हैं पिया  परदेश बसे , रही रही के वो अकुलाय रही || २|| 


कृषिराज जी खेती किसानी करें , जन ग्वालन धेनु चराय रहे | 
धान रोपाई करें सखियाँ अरु ,  बगुले नित ध्यान लगाय रहे  || 
हरियाली चारिहुँ ओर भई , दिनकर जी लुकाय छिपाय रहे | 
कभी मध्यम तेज बयार चले , तरु शाखा हिलाय डुलाय रहे || ३|| 


मृदंग बजाई रहे बादल , ईन्दर जी बिजुरी चमकाय रहे | 
छपरी जिनकी है टूट रही , रहि रहि के वो बिलखाय रहे || 
बरसे मेघा जबहीं दिन में , बस बैठि के सबही बिताय रहे | 
सब खाई रहे भजिया - गुझिया , अरु जोड़े तो खूब मोहाय रहे || ४ || 

मोहन श्रीवास्तव ( कवि )

रचना क्रमांक ;-1083 
22 / 07 /2018 , durg .c.g