Wednesday, 16 October 2013

हां मैं एक कातिल ही हूं


आपके शहर में,
इक अन्जान सा मुशाफिर हूं,
राह चलते हुए
वे समझते हैं कि मैं एक कातिल हूं

दूर रहता हूं तो वे
पत्थर मुझपे बरसाते हैं
पास जाता हूं मैं तो
गले से वे लगाते हैं

मेरे कंधे से टंगी झोली को
वे बारूद समझ बैठे

पास आते तो उन्हें
गीतों की फुलझड़ियां मिलती

यहां मैं आया था तो
मेरे हाथों में
बस एक कलम और कागज था
आपने हमे एक
कवि का रूप दे डाला

कौन कहता है कि
मैं कातिल नहीं हूं
शहर के हर गुनाह मे
मैं शामिल जो हूं

हां मैं एक कातिल ही हूं

जिसने तलवार या गोली नहीं मारा

बस अपनी चंद रचनावों से
आपके दिलों में घाव कर डाला
बस अपनी चंद रचनावों से
आपके दिलों में घाव कर डाला

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
01-03-2001,thursday,11:05am,(467),
kerala express train,between selam to ballarsha jn.


Saturday, 12 October 2013

देवी गीत (कैसे करूं माँ विदाई मै तेरी)

कैसे करूं माँ, विदाई मै तेरी,
जाने का दुःख मोसे, सहा नही जाये
जैसे बिदा हो कोई, बिटिया की डोली,
वैसे ही दुःख मोसे, कहा नही जाये
कैसे करूं मा.......

फुटि-फुटि रोएं सब, घर के लोगवां,
अंखियन के आंसू, सबसे रोका नही जाये
छुपि-छुपि रोएं सब, घर के लोगवां,
तोहरी बिदाई का गम, देखा नही जाये
कैसे करूं मां.........

नौ दिन करते थे ,सब तेरी सेवा,
आज हमे छोड़ के ,चली जा रही हो
तुझको खिलाते थे सब, रूखा-सुखा मेवा,
आज मुंह मोड़ कर, चली जा रही हो
कैसे करूं मा...........

थर-थर कांप रहे, हाथ मेरे  मइया,
तुझे तो जल मे, छोड़ा नही जाये
धक-धक धड़के है, दिल मेरा मइया,
तुझे मां अकेली यहां, छोड़ा नही जाये

कैसे करूं मां ,बिदाई मै तेरी,
जाने का दुःख मोसे, सहा नही जाये
जैसे बिदा हो कोई, बिटिया की डोली,
वैसे ही दुःख मोसे, कहा नही जाये
कैसे करूं मां..........

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com

१६--२०१३,मंगलवार,शाम-.३० बजे,

पुणे,महा