Saturday, 28 September 2013

हिंदी बेचारी घुट रही है आज

हिंदी दिवस व, हिंदी साल का,
हम औपचारिकता, निभाते हैं ।
पर अपने, बिबी-बच्चों को,
अंग्रेजी मे, शोध कराते हैं ॥

अंग्रेजी बोलना-अंग्रेजी पढ़ना,
के हम नीति पर, चलते हैं ।
हेलो और हाऊ आर यु से,
हम अंग्रेजी मे, अभिनंदन करते हैं ॥

हिंदी बेचारी, घुट रही है आज,
अंग्रेजी के, अत्याचारों से ।
अपने ही देश मे, बिदेशी सी हो गई,
अंग्रेजी के, तीब्र कटारों से ॥

हिंदी मे बोलकर, वोट को लेते,
फिर मंत्री बन जाते हैं ।
अंग्रेजी मे, शपथ हैं लेते,
फिर हिंदी बोलने मे, वे शर्माते हैं ॥

अब हिंदी मे, पढ़ो-पढ़ावो,
जिसमें राष्ट्रियता का, अंकुर पनपता है ।
सिखना है तो, चीन व रशिया से सिखो,
जहां बच्चा-बच्चा, अपनी भाषा पे गुरुर करता है ॥

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.bloggspot.com
22-12-1999,wednsday,5.10pm,
chandrapur,maharashtra.


Friday, 27 September 2013

पर आज मिडिया एक, व्यवसाय हो गया है

भारत की तरक्की, में बड़ा हाथ,
अब की हमारी, मिडिया का है ।
पल-पल मिलती, हमको खबरें,
ये कमाल की नेट की, दुनिया का है ॥

दुरदर्शन का तो, कोई जवाब नहीं,
जो सरकारों से, ही चला करता ।
आकाशवाणी का, भी यही हाल,
जो निष्पक्ष बात, नहीं करता ॥

निजी चैनलों के, आने से,
भारत में मिडिया क्रांति आई ।
हर तरह की,  खबरें देकर,
वे हम सब के, दिल मे छाई ॥

पर आज मिडिया एक, व्यवसाय हो गया है,
जहां बस पैसे ही, कमाना मकसद है ।
विग्यापन से लेकर, समाचारों तक,
इनमें भ्रष्टाचार, चरम पर है ॥

स्टिंग आपरेशनों को करके,
इनमें पैसे खुब, वसूले जाते ।
खबरें प्रसारित, करने से पहले,
मोल भाव हैं, किये जाते ॥

पर आज की ऐसी, परिस्थिति में भी,
कुछ चैनल, भ्रष्टाचार से दूर हैं ।
वे अपनें निष्पक्ष बात से,
दर्शकों में बहुत मशहूर हैं ॥

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com

05-08-13,monday,6.30 pm,
pune,m.h


Thursday, 26 September 2013

ये युद्ध नहीं तो और क्या है

ये युद्ध नही तो और क्या है,
वे वेष बदल-बदल कर हमको मार रहे ।
हम शांति का पहाड़ा रट करके,
उनकी आरती उतार रहे हैं ॥

आतंकवादियों के माध्यम से,
वे हमपे हमले कर रहे हैं ।
और हम शांति वार्ता की बातें कर,
आतंकवाद की आग मे जल रहे हैं ॥

आज सारा भारत ही,
उनके कुकृत्यों से परेशान है ।
हम दुश्मन हैं सदा से उनके,
और हम समझते कि दोस्त हमारा पाकिस्तान है ॥

अब बहुत सह लिया हम सबने,
अब और अधिक बर्दास्त नहीं ।
उनसे सारे रिश्ते बंद करो,
ये देश की अब है मांग यही ॥

अंग फड़क रहे हैं हमारे,
दुश्मन के शीश काटने को ।
मजबूर कर देंगे हम उनको,
जीवन का भीख मांगने को ॥

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
27-09-2013,friday,8.15 a.m,(758)
pune,maharashtra