Monday, 19 February 2024

गजल (नफरत)

नफरत सी हो गई है,इस दुनिया को देख के ।
डरता है दिल हमारा, लोगों को देख के ॥
नफरत सी हो.........

हमने बुलाया पा उन्हें, बिठाया था प्यार से ।
खंजर उतार दी है मेरे, पिछे के वार से ॥
नफरत सी हो.........

वो तो पिलाए जाम मगर, जहर को दे गये ।
हमने जलाये दीप मगर, वो तो बुझा गये ॥
नफरत सी हो.........

कैसे यकीन करें हम, झूठे जमाने पे ।
सच बोला उनको तो हम, हैं उनके निशाने पे ॥
नफरत सी हो.........

सच पे रहे तो आखिर,हमें दूर कर दिये ।
ईमान बेचने पे हमे, मजबूर कर दिये ॥
नफरत सी हो.........

सच्चाई की तो राह पे कैसे कोई चले ।
कांटे ही कांटे राह में, लोगों से है मिले ॥ 

नफरत सी हो गई है,इस दुनिया को देख के ।
डरता है दिल हमारा, लोगों को देख के ॥
नफरत सी हो.........

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
13-02-2000,sunday,5.30pm,
chandrapur,maharshtra.

रोज-रोज किमतों मे बृद्धि कर

बजट सत्र है, आने वाला,
जिसमें सब मनमानी, मंहगाई बढ़ायेंगे ।
बे-कसुर भोली, जनता पर,
अपनी नाकामी का, बोझ चढ़ायेंगे ॥

चाहे कोई कितना, चीखे-चिल्लाए,
पर इनके कानों पर, जूं नही रेंगेगी ।
मंहगाई से घुट-घुट कर, मर जाये कोई,
पर इनकी, आत्मा नही रोएगी ॥

शरबती गिलास में, मिठा दूध,
फिर उसमें मंहगाई का, जहर मिलाते हैं ।
लम्बे-चौड़े, भाषण कर वे,
कुटिल मुस्कानों से, हमें पिलाते हैं ॥

खुद अपने खर्चों में, कटौती नही करते,
उसका भार भी, हमपे ही चढ़ाते हैं ।
डीजल-पेट्रोल, छिड़क कर के,
फिर रसोई गैस से, हमें जलाते हैं ॥

रोज-रोज किमतों, में बृद्धि कर,
जींदा ही हमें, मार रहे हैं ।
हमें मंहगाई की, भेंट चढ़ा कर,
हमारे खुन से वे, नहा रहे हैं ॥

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
15-02-2000,tuesday,11am,
chandrapur,maharashtra.

जाने वाले जाते रहेंगे

जाने वाले, जाते रहेंगे,
आने वाले, आयेंगे ।
हम तो रहेंगे, दिल में उनके,
ना वे हमें तो, भुलायेंगे ॥
जाने वाले.......

हम तो नही हैं, गीत हैं अपने,
ना वे जहां से, जायेंगे ।
वे तो मधुरम,सुर व ताल से,
गाकर हमें, सुनायेंगे ॥
जाने वाले.........

गीत या हो, संगीत का जादू,
मरता नहीं, दुनिया वालों ।
हम तो, आते-जाते रहेंगे,
गीत सुनाने, दुनिया वालों ॥
जाने वाले........

तुम मायुश, नही होना,
अपने दिल तो, सजा लो गीतों से ।
हम तो खड़े हैं, राहों में तेरे,
स्वागत करने, संगीत से ॥
जाने वाले..........

जाने वाले, जाते रहेंगे,
आने वाले, आयेंगे ।
हम तो रहेंगे, दिल में उनके,
ना वे हमें तो, भुलायेंगे ॥
जाने वाले.......

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
19-02-2000,saturday,10:10am,
chandrapur,maharashtra.

गजल (हम तो समझे थे जहर का प्याला)

हम तो समझे थे जहर का प्याला,वे तो अमृत हमें पिला के गये ।
हम तो समझे थे मौत ही उनको, हमें मरते हुए जिला वो गये ॥
हम तो समझे थे जहर का.....

हम तो उन्हें देखते थे नफरत से, दिल मे मेरे प्यार वो जगा के गये ।
हम उन्हें जानते थे पत्थर दिल, अपने आंसू से वो, भिगा के गये ॥
हम तो समझे थे जहर का.....

वो तो रहते रहे मय-खाने में,मेरा पीना वे तो छुड़ा के गये ।
हम तो टूटा हुआ सा दिल समझे, वो तो दिल से दिल को जुड़ा के गये ॥
हम तो समझे थे जहर का.....

हम तो रहते थे दूर ही उनसे,वो तो मुझको दिवाना कर के गये ।
हम तो समझे थे उनको बेगाना, वो तो बाहों में हमको भर के गये ॥
हम तो समझे थे जहर का.....

उनका मुस्कराता हुआ सा चेहरा, गम को अपने दिल मे छिपा के गये ।
हम तो समझे थे गम दे रहे हमको, अपने गम से उसे मिलाते रहे ॥
हम तो समझे थे जहर का.....

वो तो हमसे हैं आज दूर कहीं, अपनी यादें हमें दिलाते गये ।
हम तो राहों में हैं खड़े उनके, वो तो अपने को ही लुटाते गये ॥

हम तो समझे थे जहर का प्याला,वे तो अमृत हमें पिला के गये ।
हम तो समझे थे मौत ही उनको, हमें मरते हुए जिला वो गये ॥
हम तो समझे थे जहर का.....

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
19-02-2000,saturday,11.50am,
chandrapur,maharashtra.

लानत है उन दहेज लोभियों को

लानत है उन दहेज, लोभियों को,
जो अपनी बहुओं को, जींदा जलाते हैं ।
किसी के घर की, आंगन की गुड़िया पर,
अपने जुल्मों का, कहर बरसाते हैं ॥

वे ईन्षान नही, शैतान हैं वे,
जो अपनी बहुओं पर, जुल्म ढहाते हैं ।
वे समाज के, दुश्मन हैं,
जो दहेज के लिये, उन्हें सताते हैं ॥

वो भी किसी बाप, की बेटी थी,
जो आज दुल्हन, बन कर आई ।
प्यार के बदले, उसने तुमसे,
दहेज का, दावानल पाई ॥

यदि उसकी जगह, तुम्हारी अपनी बेटी पर,
कोई इतना, अत्याचार करे ।
तब तुम्हारे दिल पर, क्या बीतेगी,
जब वह दहेज की, मौत मरे ॥

इसलिये अपनी, बहुओं को,
अपनी बेटी, जैसा ही प्यार करो ।
पति हो तो, अपनी मेहनत से पैसे कमावो,
और खुशियों से, उसकी माँग भरो ॥

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
24-02-2000,thursday,11:40am,
chandrapur,maharashtra. 

दहेज के लिए मारा जाता


पत्थर दिल भी कलेजा कांप उठता,

और आंखों में आंसू आ जाता !

जब किसी बाप की बेटी को,

दहेज के लिए मारा जाता !!



उन दहेज लोभी-दरिदों के दिलों में,

इंसान का खून नही होता होगा!

उन अत्याचारियों के नश-नश में,

किसी बहसी जानवर का खून भरा होगा !!



आज हमारे कई घरों मे ,

बहुवों को सताया जाता है !

मैके से दहेज लाने के लिए उन पर,

कई तरह से दबाव बनाया जाता है !!



नर्क बन गया है , जीवन उनका,

उनके रोज-रोज के अत्याचारों से !

वेदना है उनकी नश-नश में,

उनके तीब्र प्रहारों से !!



दहेज के इन भूखे- भेड़ियों को,

कठोर सजाएं दी जाए !

जिससे उनको देख-देख कर,दहेज के लिए,

कोई अपनी बहुवों पर ज़ुल्म न ढहा पाए !!



मोहन श्रीवास्तव (कवि)

www.kavyapushpanjali.blogspot.com

दिनांक-२४/०२/२०००,वॄहस्पतिवार

दोपहर-१२.१० बजे

चंद्रपुर(महाराष्ट्र)

पर कुछ लोग दहेज के खातिर

किसी बाप की, बेटी है वो,

तो किसी भाई की, बहना है ।

किसी-किसी के, आंगन की गुड़िया है वो,

तो किसी माँ का, गहना है ॥



बड़े प्यार-दुलार से, पली-बढ़ी,

और बचपन से, पाई तरुणाई ।

नयी उमंगें, दिल में लेकर,

अपने साजन के, घर आई ॥



मां-बाप भी, लड़के वालों को,

अपनी औकात से, जादा दहेज दिये ।

अपनी फूल से भी, नाजुक बिटिया को,

रोते-रोते हैं, बिदा किये ॥



पर कुछ लोग, दहेज की खातिर,

जींदा ही उन्हें, जलाते हैं ।

उन मासुमों के, सपने बखराकर,

उनपे दहेज का, कफन चढ़ाते हैं ॥



अपने बेटियों के, जैसा ही,

अपनी बहुओं को, भी प्यार करो ।

उन मासुमों को, अपना बना के,

उनके सपनें, साकार करो ||

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
24-02-2000,thursday,7:10pm,
chandrapur,maharashtra.

पापा मेरे पापा

पापा मेरे पापा, मेरे प्यारे-प्यार पापा.........२



दफ्तर से तुम, जल्दी आना,

पापा अपने, परिवार में ।

मम्मी के संग, रहेंगे हम सब,

आप के, ईंतजार में ॥

पापा मेरे पापा......



कहीं घुमने चलेंगे, हम सब,

पापा सब कोई, साथ में ।

झुमेंगे-नाचेंगे, खुशियां मनायेंगे,

आज की हम, रात मे ॥

पापा मेरे पापा......



सैर सपाटा करेंगे, हम सब,

हरे-भरे, मैदानों में ।

खा-पी करके, मौज करेंगे,

इस नई सदी के, जमाने में ॥

पापा मेरे पापा......



रंग-बिरंगे, फैशन के,

मेले में हम, जायेंगे ।

उस मेले में ,घुम-घूम कर के,

ढेरों खुशिया, मनायेंगे ॥

पापा मेरे पापा......



नई जगह की, सैर करेंगे,

फिर घर में, वापस आयेंगे ।

गुड नाइट मम्मी, को बोलके,

फिर बिस्तर पे, सो जायेंगे ॥

पापा मेरे पापा......



नीद में हम, सपना देखेंगे,

अपनें देखे हुए, स्थानों की ।

सपनें में हम, सैर करेंगे,

चमकते, चाँद-सितारों की ॥

पापा मेरे पापा......



आना पापा, जल्दी दफ्तर से,

वर्ना हम, रूठ जायेंगे ।

दिल टूटेगा, मम्मी का भी,

फिर मम्मी को, आप मनायेंगे ॥

पापा मेरे पापा......



मोहन श्रीवास्तव (कवि)

www.kavyapushpanjali.blogspot.com

27-02-2000,sunday,5.45pm,

chandrapur,maharashtra.

इक पैसा दे दो भइया

इक पैसा, दे दो भइया,
तुम्हे मिले बहुत, सी रुपइया...
धन-दौलत से, खजाना भरा रहे...
और अमर रहे, तेरा संइया.....
इक पैसा दे दो......२

हम गरीब हैं, फिर क्या हुआ,
पर दिल तो, हमारा गरीब नही ।
द्वारे-द्वारे, भटक रहे,
क्या करें हमारा, नसीब यही ॥
आद-औलाद से, भरा रहे..२
तेरा घर खुशियों, से भइया....
इक पैसा दे दो......२

ऊमर हो लम्बी, नाम हो जग मे,
चमके जैसे, चाँद-सितारे ।
घर हो, महला-दस महला,
और चाँदी की, दीवारें ॥
सोने-हीरे से, भरा रहे....२
तेरे घर का, खजाना भइया...
इक पैसा दे दो.....२

यदि प्यार किया, हो तो प्यार मिले,
जींदगी मजे से, गुजरे ।
कभी गम ना सताए, किसी चीज का,
कोई तेरा काम, न बिगड़े ॥
बुरे राह से, बचो सदा....२
और रहो सत्य पर भइया...

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
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15-01-2000,saturday,10:5am,
chandrapur,maharashtra.

कहां गये आजादी के दीवाने

कहां गये आजाद, भगत सिंह,

नेहरू-शास्त्री,गांधी ।

कहां गये आजादी, के दीवाने,

और सुभाष बोष, की क्रान्ति ॥



आजादी दिलाई थी, हम सब को,

क्या-क्या सपने, देखे थे ।

सब कुछ निछावर, कर के अपना,

मुस्काते भारत का, सपना देखे थे ॥



आज के भारत को, देख-देख कर,

उनकी आत्माएं, रोती होंगी ।

भ्रष्टाचार में डूबे, भारत से,

उनके दिल में, वेदना होती होगी ॥



चारों तरफ, लूट-पाट,

अत्याचार, चरम पर है ।

नारियों की ईज्जत, लुट रही आज,

और संकट अपने, वतन पर है ॥



वोटों के विकास में, दिलचस्पी है बहुत,

पर देश के विकास मे, ध्यान है कम इनका ।

दिन-रात बढ़ रही, किमतों से,

प्रजा का हाल, बिन जीवन का ॥



दर्द से कराहते हुए, भारत को,

आकर छुटकारा, दिला जावो ।

मातॄ भूमि की, डूबती नइया को,

आकर, पार लगा जावो ॥



मोहन श्रीवास्तव (कवि)

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27-02-2000,sunday,8pm,

chandrapur,maharashtra.

हम वतन पे शहीद हो जाते हैं

हम आंधी नहीं तूफान हैं,

कभी नहीं, रुक सकते हैं ।

हम कमजोर नहीं, बलवान हैं,

कभी नहीं, झुक सकते हैं ॥



हमें जितना भी, जो कोई रोकेगा,

हम और भी, आगे बढ़ते जायेंगे ।

हमारे पीठ में, जो कोई खंजर घोपेगा,

हम उसे मौत की, नींद सुलायेंगे ॥



हम कायर नहीं, शेरे दिल हैं,

डरना हमको, आता है नहीं ।

हम वतन पे, शहीद हो जाते हैं,

मरना हमको, आता है नहीं ॥



दिल में आग, जल उठता है,

जो हमें बुरी नजर, से देखते हैं ।

आखों से अंगारे, निकल उठते,

जो हम पे शक, की नजर फेरते हैं ॥



इतिहास गवाह, रहा है सदा,

हम मित्रता पे, जान लुटा देते ।

पर दुश्मनी, कोई करे हमसे,

तो हम उसकी, आखें निकाल लेते ॥



मोहन श्रीवास्तव (कवि)

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14-03-2000,,tuesday,7:10pm,

chandrapur,maharashtra.

गजल (ढेरों गम है मिला जमाने में)

ढेरों गम है मिला जमाने में, हम तो युं ही उन्हें बुलाते रहे ।

मेरे दिल में तो दर्द उठता रहा, पर उन्हें हंस के हम छिपाते रहे ॥

ढेरों गम है मिला जमाने में.........



हम तो उनको ओढ़ाये थे चादर, वे तो ईज्जत मेरी लुटाते रहे ।

हम तो दीपों से थे सजाये उन्हें, वे तो उनसे हमें जलाते रहे ॥

ढेरों गम है मिला जमाने में.........



वे जब आते थे घर में मेरे कभी, हम तो पलकें सदा बिछाते रहे ।

वे जब जाने की बात करते थे, मेरे आखों से आंसू आते रहे ॥

ढेरों गम है मिला जमाने में.........



हमने चाहा था प्यार उन सब से,वे तो नफरत हमको देते रहे ।

फूल उनके लिये बिछाये थे, वे तो कांटे हमें चुभाते रहे ॥

ढेरों गम है मिला जमाने में.........



वो जब पहले थे तो रहम दिल थे, बाद में वे अहम दिखाते रहे ।

कभी हम मिल के इक संग रहते थे, अब तो नजरें हमसे बचाते रहे ॥

ढेरों गम है मिला जमाने में.........



दिल तो टूटा मेरा जमाने से, हम तो किससे कहें और कैसे कहें ।

अब तो जाना नहीं वहां मोहन, जहां तुम्हें दुश्मन कोई समझते रहे ॥



ढेरों गम है मिला जमाने में, हम तो युं ही उन्हें बुलाते रहे ।

मेरे दिल में तो दर्द उठता रहा, पर उन्हें हंस के हम छिपाते रहे ॥

ढेरों गम है मिला जमाने में.........



मोहन श्रीवास्तव (कवि)

www.kavyapushpanjali.blogspot.com

21-03-2000,tuesday,5:20pm,

chandrapur,maharashtra.



गजल (बेरहम जमाने में)

देखा भी नही जाता, सुन के भी न रह पाता ।

बेरहम जमाने में, कोई हंस के न रह पाता ॥

देखा भी नहीं जाता.......



चारों ही तरफ देखो, जहां मौत का साया है ।

जहां भय से तड़पते लोग, और कोई न छाया है ॥

देखा भी नहीं जाता.......



हर जगह बेटियों की, आबरू है खतरे में ।

जहां दहेज के लिये उनको, जिन्दा ही जलाया है ॥

देखा भी नहीं जाता.......



पैसे वालों की ये दुनिया, कमजोर न रह पाते ।

दहशत फैला कर के, हम सब को डराया है ॥

देखा भी नहीं जाता.......



यहां जीवन है सुरक्षित नहीं, किसी का भी सुनों यारों ।

हर जगह लूटेरे हैं, और आतंक का साया है ॥

देखा भी नहीं जाता.......



लोगों का हाल बुरा, बढ़ती मंहगाई से ।

बच्चों के लिये दूध नहीं, उन्हें भूख ने सताया है ॥

देखा भी नहीं जाता.......



कुर्सी के लिये देखो, ये आपस मे झगड़ते हैं ।

वोटों के लिये ये हममें, नफरत फैलाया है ॥

देखा भी नहीं जाता.......



बेहयाई भरे फैशन में, सब मस्त हुए जाते ।

मर्द हो रहे औरतों जैसे, औरतें बन रहीं मर्दाना है ॥

देखा भी नहीं जाता.......



खाने के लिए अन्न न हो, दारू का नशा पहले ।

बच्चों की हर अदावों में, फिल्मी धुन तो समाया है ॥



देखा भी नही जाता, सुन के भी न रह पाता ।

बेरहम जमाने में, कोई हंस के न रह पाता ॥

देखा भी नहीं जाता.......



मोहन श्रीवास्तव (कवि)

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21-03-2000,tuesday,2:30pm,

chandrapur,maharashtra.





ऐ वीर जवानों भारत के

ये हमारे मरने पर, कफन पहना रहे हैं

किमतें बढ़ाने में, होड़ लगी है है,

इन हिलती-डुलती, सरकारों में ।

जहां रातो-रात, किमतें बढ़ा देते,

ऐसी चलती-फिरती, सरकारों में ॥



इनको चुनने के, लिये जहां,

अरबों रुपये, बहाये जाते ।

हम बेकसुरों के, आंसू से,

फिर इन्हें ताज, पहनाये जाते ॥



वोटों का उपहार, हम देते हैं इन्हें,

ये हमें मंहगाई की, भेंट चढ़ा देते ।

रोजगार दिलाने के, नारे देकर,

ये हमें और, बेरोजगार बना देते ॥



हम कई वस्तुओं मे, कटौती कर,

फिर अपना बजट बनाते हैं ।

पर किमतें, बढ़ाने वाले ये,

हमारे बजट को, आग लगाते हैं ॥



अभी रसोंई गैस की, कीमतें बढ़ाकर,

और ये हमपे, एहसान जता रहे हैं ।

अभी डीजल-पेट्रोल के, दाम नहीं बढ़ेंगे,

ये हमारे मरने पर, कफन पहना रहे हैं ॥



मोहन श्रीवास्तव (कवि)

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हर रूप में तुम सुंदर

इस जहां से न्यारी हो,तुम मेरी दुलारी हो,

मै हूं किस्मत वाला, जो तुमको पाया है ।

हर अदा सुहाना है, कहता ये जमाना है,

देखो मैने तुमको, दिल में तो बसाया है ॥

इस जहां से न्यारी........



हर रूप मे तुम सुन्दर,इस जहां से हो हट कर,

बिधि ने लगता है तुम्हें, फुर्सत से बनाया है ।

तेरी अदा खुबसुरत, तुम हो कोई मूरत,

मैने तुम पर यारा, सब कुछ तो लुटाया है ॥

इस जहां से न्यारी........



मेरी श्वांस तुम ही हो, मेरी धड़कन भी तुम हो,

मैने जैसा सोचा था, तुम्हें वैसा ही पाया है ।

तुम हो कोई गुलशन, मै हूं तेरा माली,

तेरी खुशबू को हर पल, मैने मन में बसाया है ॥

इस जहां से न्यारी........



मेरी कविता तुम ही हो, तुम ही हो मेरी गजल,

तुमने तो हमें देखो, शायर जो बनाया है ।

तुम ही हो मेरी डगर, तुम्हें लगे ना किसी की नजर,

हर पल मैने तेरे लिये,पलकों को बिछाया है ॥



इस जहां से न्यारी हो,तुम मेरी दुलारी हो,

मै हूं किस्मत वाला, जो तुमको पाया है ।

हर अदा सुहाना है, कहता ये जमाना है,

देखो मैने तुमको, दिल में तो बसाया है ॥

इस जहां से न्यारी........



मोहन श्रीवास्तव (कवि)

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19-07-2013,friday.4am,

pune,maharashtra.





मर रहा आम आदमी है यहां

वोटों के लिये, ये सरकारें,

हमें कई उपहार, दिलाते हैं ।

पर शायद हमको, पता नही,

ये हमपे मंहगाई का, भार चढ़ाते हैं ॥



खुश होते हम इन, उपहारों से,

पर ये हमारे, पैसों से ही दिये जाते ।

विभीन्न तरह के, टैक्स लगा कर,

हमपे एहसान, किये जाते ॥



इन्हीं उपहारों में, सस्ता अनाज,

व कई तरह की, ऋण माफी है ।

अल्प संख्यकों को, दी जा रही सौगात,

और कइयों की, निःशुल्क पढ़ाई है ॥



चाहे किसी तरह के, सरकारी दान,

कोई ये अपने, पैसों से नहीं देते ।

तुष्टिकरण की नीति से ये,

वोट हमारे ले लेते ॥



यदि देना है, दान इन्हें तो,

जरुरत मंदों को, ही दान दिया जाये ।

धर्म जातियों से हटकर,

गरीबों का पहचान, किया जाये ॥



भर रहे तिजोरी, अपना ये,

इनपे मंहगाई से, फर्क नही पड़ता ।

मर रहा, आम आदमी है यहां,

उनके हित की, बात कौन करता ॥

मर रहा, आम आदमी है यहां,

उनके हित की, बात कौन करता......



मोहन श्रीवास्तव (कवि)

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20-07-2013,saturday,3am,

pune,maharashtra.

गजल (खुबसुरत अदा की हो तुम मल्लिका )

खुबसुरत अदा की, तुम हो मल्लिका,

मेरे हर सांस में, तुम समाई हुई ।

मेरी सपनों की, तुम हो शहजादी या ,

कोई परी, गगन से आई हुई ॥

खुबसुरत अदा की......



मैने देखा जब से, मैं खो गया,

धड़कनें मेरे दिल की, बढ़ी जा रही ।

हो रहा है न जानूं, मैं क्या सथिया,

हर अदा तेरी, मुझसे पढ़ी जा रही ॥

खुबसुरत अदा की......



इस जहां,हर जगह और दीवार में,

बस तुम ही तुम तो, नजर आ रही ।

चेहरे पे हल्की, मुस्कान छाई हुई,

बिजली हमपे है, लगता गिरी जा रही ॥

खुबसुरत अदा की......



मैं तो बेचैन सा तो, हुआ जा रहा,

चैन मेरे तो दिल को, नहीं मिल रहा ।

तेरे रंग,रूप,मुस्कान, और बोली से,

मेरे मन में, गुलाब का फूल खिल रहा ॥



खुबसुरत अदा की, तुम हो मल्लिका,

मेरे हर सांस में, तुम समाई हुई ।

मेरी सपनों की, तुम हो शहजादी या ,

कोई परी, गगन से आई हुई ॥

खुबसुरत अदा की......



मोहन श्रीवास्तव (कवि)

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20-07-2013,saturday,11pm,

pune,maharashtra.





बनना है तो चन्दन सा बनों

बनना है तो, चन्दन सा बनों,

ना बनना, कुल्हाड़ी सा ।

बोलो तो सत्य व, मधुर बोलो,

ना असत्य कभी, वाणी का ॥



चन्दन को काटता, है कुल्हाड़ी,

पर चन्दन का उसे, खुशबू लगता ।

कुल्हाड़ी तो आग में, पीटा जाता,

पर चन्दन तो, मस्तक पे सजता ॥



बनना है तो, दीपक बनना,

जो खुद जल कर, प्रकाश को है देता ।

साथ करो, सज्जनों का सदा,

नहीं तो दुर्जन तो, दु:ख ही देगा ॥



किसी तरह का हिंसा,

ये धर्म नहीं, ये पाप है ।

पाप का सजा, मिलता है हमें,

पर करते हैं, और हम पाप हैं ॥



कभी दुसरों के, दुःख को,

उनको अपने, जैसा ही जानों ।

खुशी मिलेगा, इससे तुम्हें,

यह सत्य बचन, मेरा मानों ॥



अहंकार,अभिमान, को तज कर,

मन को अच्छे, कामों में लगावो ।

बद्दुआ नहीं लो, कभी किसी का,

दुआ सदा ही पावो ॥

बद्दुआ नहीं लो, कभी किसी का,

दुआ सदा ही पावो.......



मोहन श्रीवास्तव (कवि)

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21-07-2013,sunday,11pm,

pune,maharashtra.

जीभ

शरीर के अंग सभी, महत्व पूर्ण हैं,

पर उनमे जीभ तो, बहुत महान है ।

अच्छा-बुरा, बोलती है ये,

और स्वाद की, करती पहचान है ॥



बत्तीस दातों के, बीच बसी ये,

और सबसे ये, कोमल है ।

जब भी, बोलता है प्राणी,

तो इसकी जरुरत, पल-पल है ॥



संसार मे हमारा, ये पहचान बनाती,

कि हम हैं कितने अच्छे ।

दिल हो हमारा, यदि काला,

पर ये है बनाती, हमें है सच्चे ॥



कभी-कभी तो, इसके कारण,

ईंषान बदनाम है हो जाता ।

पर कभी-कभी तो, इसके कारण,

ईंषान सम्मान है, पा जाता ॥



पर इसके पिछे, शायद ये मन,

जिससे ये सब करवाते ।

अच्छी बात पे, इतराती है ये,

पर बुरी बात पे, शर्माती ॥



यदि जीभ मिला है, हमको तो,

हम इससे, अच्छी बातें ही करें ।

भगवान नाम की चर्चा से,

इसे और पवित्र करें ॥



ये क्या करती,कैसे रहती,

कोई समझ नही पाए ।

हम सब इसके, हैं गुलाम,

ये कभी भी कुछ है करवाए ॥

हम सब इसके, हैं गुलाम,

ये कभी भी कुछ है करवाए.....



मोहन श्रीवास्तव (कवि)

www.kavyapushpanjali.blogspot.com

22-07-2013,monday,10:30pm,

pune,maharashtra.