Thursday, 20 October 2011

कामचोर


आलसी बन के बैठे रहे तो,
कामचोर कहलावोगे!
बस कुत्तों की तरह दुम को हिलावो,
तो भोजन तो भर पेट तो पावोगे!!

कामचोर की ये आदत,
बचपन से ही तुम्हे पड़ी हुई!
पहले अकल मे छोटे थे तुम,
आज अकल है बड़ी हुई!!

मां-बाप की कमाई पर पले-बढ़े,
अब ससुराल की कमाई खाते हो!
पत्नी के घर मे आते ही,
तुम उसके तलवे चाटते हो!!

तुम्हे बस अपने पेट से मतलब,
और किसी बात की परवाह नही!
बस खाना-पहनना चाहिए तुम्हे,
और किसी की चाह नही!!

अरे ये जीना भी कोइ जीना है,
जब सब कामचोर तुम्हे बुलाने लगे!
राहों मे चलते हुए तुम्हे,
रह-रह के कोई चिढ़ाने लगे!!

अब आलस-प्रमाद को दूर भगा,
अपने बल तुम काम करो!
जिसमे सम्मान तुम्हारा नही जाने पाए,
यह अपने दिल मे ध्यान धरो!!

मोहन श्रीवास्तव
दिनांक-२०/११/२०००, सोमवार, सुबह-०४.४५ बजे,
वाराणसी(उ.प्र)

Wednesday, 19 October 2011

यदि हम सरकारी दुकान के मालिक होते

यदि हम सरकारी दुकान के मालिक होते
तो हम अपनी खूब तिजोरी भरते !
उन अधिकारियों को भी खुश  रखके,
हम अपना खाना पूर्ती करते !!

शक्कर-राशन -तेल को हम ,
सरकारी दरों पर उठाते !
बाटने से पहले उन्हे हम बाज़ार मे बेचते,
बाकी कार्ड धारकों को अंगूठा दिखाते !!

वस्तुओं के लिए जब हो हल्ला मचता,
तब थोड़ा उनमे भी बांट हम देते !
एक किलो शक्कर के लिए,उन्हे,
घंटों लाइन मे खड़े हम करते !!

इस तरह से वे सब थक जाते,
फ़िर दुबारा आने का नाम नही लेते !
हम तब उनके राशन -तेल को,
उची दरों मे बाजार मे बेच देते !!

अधिकारियों से मिल-जुल करके,
फ़िर हम जनता का राशन पचा लेते !
ऐसे हराम के पैसों से,
हम अपनी उंची हवेली बना लेते !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-१३/११/२०००,सोमवार-.५५ बजे,
चंद्रपुर(महाराष्ट्र)



हम भी कभी थे ट्रैफ़िक पुलिस मे

हम भी कभी थे ट्रैफ़िक पुलिस मे,
जब हम कई तरह से पैसा कमाते थे !
साहब लोगों को खुश करके रखते,
और लोगों पर रोब जमाते थे !!

चलान की पुस्तक हाथ मे लेकर,
हम वाहनों की चेकिंग करते थे !
पुलिस-कोर्ट का भय दिखलाकर,
हम उनसे अपनी जेबें भरते थे !!

आमतौर पर जादा तर वाहन और चालक मे,
कुछ कुछ कमियां रहती ही हैं !
कभी टैक्स है तो इंश्योरेन्स नही,
कभी लाइसेन्स की मजबूरियां रहती ही हैं !!

इन्ही सब बातों का लाभ उठाकर,
हम उनसे मनमानी रकमें वसुलते थे !
वाहन चेकिंग का पखवारा हफ़्ता-दिन का नही,
हम बारह महिनों ही चेकिंग करते थे !!

इन सबके साथ-साथ हम,
फ़ुटपाथ वालों पे भी रोब जमाते थे !
उन दुकानदारों को भय दिखलाकर,
हम उनसे भी पैसा कमाते थे !!

उन वाहन मालिकों से महिना लेते,
जिनके वाहन अपने एरिया मे चलते थे !
बाकी औरों दुपहियों को,
अपने भय के पास मे जकड़ लेते थे !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-१३/११/२००० ,सोमवार रात - .१५ बजे,

चंद्रपुर(महाराष्ट्र)