Tuesday, 13 March 2012

जिंदगी जो कई रंग की है,


जिंदगी जो कई रंग की है,
जो पल-पल बदल ये रही है !
कभी खुशियों की बरसात इसमे,
कभी दुख के अगन मे जल रही है !!
जींदगी जो कई.........

कभी मायुशी और है उदासी,
कभी चेहरे पे मुस्कान आती !
पानी की बुलबुले की तरह ही,
जिन्दगी भी ठहर ना है पाती !!
जींदगी जो कई.............

हार मिलती कभी जींदगी मे,
पर जीत की आश है हम लगाए !
सूनी सी हो असल जींदगी जब,
तो मांग सपनों से हैं हम सजाए !!
जींदगी जो कई.....................

कभी रोना,कभी हसना यहां,
गाड़ी जीवन की चलती जा रही है !
जीने की आश बढ़ रही है हमारी,
जींदगी तो ढलती जा रही है !!
जींदगी जो कई..................

जींदगी एक जंग की तरह है,
जिसमे संघर्ष चलता ही रहता !
आश सब है लगाते जनम से,
ईंषान चाहत मे मरता ही रहता !!

जींदगी जो कई रंग की है,
जो पल-पल बदल ये रही है !
कभी खुशियों की बरसात इसमे,
कभी दुख के अगन मे जल रही है !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com

//१९९९,चन्द्रपुर महा.

बच्चे जो भगवान रूप हैं

रिमझिम-रिमझिम बारिस आई,
बच्चे खेलें सारे !
जान-बुझकर गिले होते,
वो तो सबके दुलारे !!

पैर फ़िसलकर गिरते हैं वो,
हंसी -ठहाका करते !
उनकी ओतली -तोतली बोली,
सभी का मन है हरते !!

बच्चे जो भगवान रूप हैं,
भेद-भाव नही इनमे !
इनके लिए तो सभी बराबर,
राग-द्वेश नही इनमे !!

शिक्षा लेनी है तो इनसे ले लो,
हम क्युं आपस मे हैं लड़ते !
प्यार -मुहब्बत छोड़ के क्युं हम,
झगड़े की राह पकड़ते !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
२६//१९९९, शनिवार,
रात्रि ९.१५ बजे,

चन्द्रपुर महा.

देवी मां स्तुति( हे मा मेरी करुणा मई)

हे मा मेरी करुणा मई,आशिष पाना चाहते !
हम दीन-हीन गरीब हैं,चरणों मे आना चाहते !!
हे मा मेरी.............

तुम हो जगत की मातु मा,हम बाल सब तुम्हारे हैं !
रखवाली करती हो मातु तुम,हम भक्त तेरे प्यारे हैं !!
हे मा मेरी...............

कोई नही अपना है मा,सिर्फ़ तुझ पर आश है !
तेरी दया की दृष्टि पर ,अपना तो मा विश्वाश है !!
हे मा मेरी..................

जो पास मे है मा मेरे,सब कुछ तुम्हारा ही तो है !
तू एक है,तेरे रूप अनेक,तू कई नामों से विख्यात है !!
हे मा मेरी.......................

तेरा ध्यान तो आता नही,मोहन तो मा अन्जान है !
अपराध को कर दो छमा,हम बाल सब नादान हैं !!

हे मा मेरी करुणा मई,आशिष पाना चाहते !
हम दीन-हीन गरीब हैं, चरणों मे आना चाहते !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com

२८//१९९९,चन्द्रपुर महा.