Saturday, 4 May 2013

विधवा हो गई तो कसूर किसका

जीवन की गाड़ी थम जाती,
और खुशियों का बाग है जल जाता ।
जब किसी बेचारी नारी का,
अपना सुहाग है उजड़ जाता ॥

जीवन साथी था जब तक,
उसका अपना अलग संसार था ।
पर अपना साथी  बिछुड़ते ही,
उस पर तो बज्र प्रहार था ॥

विधवा हो गई तो कुसूर किसका,
जिसका बिधि ने सब कुछ लूट लिया ।
और हम उनसे कभी करते हैं नफरत,
जैसे हमने हो अमृत का घूंट पिया ॥

जो दुःख की अगन मे है जल रही,
उससे बुरा हमारा क्या होगा ।
जो पिया बिना है तड़प रही,
उससे नुकसान हमारा क्या होगा ॥

हमें ऐसे विधवा व बेसहारों को,
हर जगह सम्मान देना होगा ।
जिससे वे और दुःखी न हों,
हमे वही काम करना होगा ॥

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
२४-४-२०१३,बुद्धवार,३.३० दोपहर,

पुणे.महा.



 

निंदक व आलोचक को




हम जिस भी काम को करते हैं,
उनमे श्रद्धा व पूरी ईमानदारी हो ।
आती हैं मुश्किलें तो आने दो,
हम कभी भी इससे दुखियारी न हों ॥

किसी काम को करते हैं तो,
हम हर बार सफल हैं नही होते ।
असफलता कभी जब मिलती है हमें,
तो दुःखी हो करके हम रोते ॥

पर असफलता ही सफलता की है सीढ़ी,
ये अपने दिल मे ध्यान रहे ।
आलोचना से हमे मिलती है शक्ती,
जो कमी हो उसमे सुधार करें ॥

निंदक व आलोचक को,
अपने पास सदा रखें ।
उनकी टीका-टिप्पणियों से,
हम अपने मे और सुधार करें ॥

सच्चे अर्थों मे आलोचक,
वे एक गुरु से कम हैं नही ।
जिनकी बस आदत कमी ढूढ़ना,
तब हम काम हैं करते और सही ॥

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
२२-४-२०१३,सोमवार,१२.१५ बजे,

पुणे,महा.