Monday, 29 July 2013

जानम यूं इतराना ठीक नही



अंगड़ाई लेके मुस्कराकर,
फ़िर दिल का जलाना ठीक नही !
आहें भरना और इतराना ,
बिजली का गिराना ठीक नही !!

नागिन कि तरह चलना-फ़िरना ,
राहों मे ऐसे ठीक नही !
आंखो के नुकिले काजल से ,
मदिरा का पिलाना ठीक नही !!

हंस-हस के बातों को करके,
फ़िर मन को चुराना ठीक नही !
सर पर से सरकते दुपट्टे से,
धड़कन को बढ़ाना ठीक नही !!

बालों का सावन की घटा जैसे,
हवा मे लहराना ठीक नही !
अंग-अंग हो झलकते तो ऐसे,
कपड़ों का पहनना ठीक नही !!

गैरों से हो मिलना -जुलना ,
फ़िर अपनों से शर्माना ठीक नही !
फूलों कि खुशबू को देकर,
फ़िर कांटो का चुभाना ठीक नही !!

मदमस्त जवानी को पाकर ,
बुढ़ापे को भुलाना ठीक नही !
उजाले से भरी इन रातों मे,
दिन का बिसराना ठीक नही !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक- १३/०७/२००० ,वॄहस्पतिवार ,रात - ११.५५ बजे ,

चंद्रपुर (महाराष्ट्र)

Sunday, 28 July 2013

वोटों के लिये ये सरकारें

जब तक कानून, सख्त नहीं होंगे,
और ना ही कठोर सजा होगी ।
कुछ लोगों की, जान ही क्या,
कई जान, कुरबान होंगी ॥

वोटों के लिये, ये सरकारें,
कड़े कानून, नही हैं बना पाती ।
आम जनता मर, रही है आज,
और सरकार, मन ही मन मुस्काती ॥

या हो हिंदू या, हो मुस्लिम,
या किसी धर्म,मजहब के हों ।
सब के लिये हो, एक कानून,
चाहे वो किसी राज्यों के, सरहद के हों ॥

हम भारत में, रहते हैं तो,
हम सब ,हैं भाई-भाई ।
ईंसानियत धर्म है, भारत का,
ना हिंसा,क्रूरता, और कुटिलाई ॥

एक नहीं यहां, दो-दो कानून,
इसलिये निर्दोष, हैं मारे जाते ।
अपराधी घुमते, सरे आम,
और निर्दोष को, सजा दिलाए जाते ॥

बीते इतिहास से, हम सीखें,
और आपस में, लड़ना बन्द करें ।
किसी भी तरह का, हिंसा न करें,
कुदरत के न्याय से, तो हम डरें ॥

कोई भी यहां, अमर है नही,
सबको तो वहां, पर जाना है ।
इसलिये जितना दिन, हम यहां पे हैं,
सबको प्यार से, गले लगाना है ॥

सरकारी कानून से, भले हम न डरें,
पर कुदरत के कानून से, हमें डरना ही है ।
यदि बुरा कर्म, कर रहे आज हम,
तो कल उसका, सजा भुगतना ही है ॥

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
28-07-2013,sunday,12:10pm,

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