Sunday, 18 August 2013

यह मुस्काता हुआ अपना भारत

यह मुस्काता हुआ अपना भारत ,
जो कि सारे जहां मे न्यारा है !
विभिन्नता मे बसी एकता ,
यह हम सब का बहुत दुलारा है !!

प्यार भरे इसके आंगन मे ,
कई तरह के संगीत बजते रहते  !
सब अलग- अलग अपनी पसंद के ,
मधुर गीत सुनते रहते !!

सभी धर्मों का संगम है यहां ,
जिसमे सब नहा के पवित्र हो जाते है !
प्यार से जो कोई देखे हमे ,
हम उनके मित्र बन जाते हैं !!

कई जातियां रहती है जहां,
जिनके रश्मों - रिवाज अनोखे हैं !
प्रेम भरा है यहा के कण -कण मे,
जहां प्यार के कई झरोखे हैं !!

मेहमानों को भगवान सा आदर कर ,
उन्हे हम दिल से सम्मानित करते है !
पर कोई बुरी नज़र डाले हम पर ,
उन्हे हम दिल से अपमानित करते हैं !!

मोहन श्रीवास्तव  (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक -२७/०३/२००० , सोमवार ,सुबह १०.१० बजे,

चंद्रपुर (महाराष्ट्र)

Saturday, 17 August 2013

पर आज शिक्षा एक व्यवसाय हो गया है

भ्रष्टाचार का ज़हरीला अंकुर ,
अब स्कूलों से शुरू हो जाता है !
जहां डोनेशन के माध्यम से,
 रुपया कमाया जाता है !!

निः स्वार्थ भाव से पहले,
स्कूल बनाए जाते थे !
बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो,
इस लिए पढ़ाए जाते थे !!

पर आज शिक्षा एक व्यवसाय हो गया है,
जहा पैसे ही कमाना मकशद है !
जहा तरह-तरह के स्कूल फ़ीस,
व ट्युशन करने की आदत है !!

दाखिला लेने के पहले,
बच्चो के प्रोग्रेस रिपोर्ट पर ध्यान नही जाते !
वे पैसे कितना दे सकते है,
उनकी पाकेट पर नज़र रखे जाते !!

पर कुछ-कुछ स्कूल अभी भी है,
जो डोनेशन से कोसों दूर है!
व कई योग्य शिक्षको को ,
अपने शिक्षक होने पे गुरुर है !!

भ्रष्टाचार के ऐसे स्कूलों पर,
जल्द ही रोक लगाना होगा!
नही कल के हर भारत वासी पे,
भ्रष्टाचार का सेहरा बंधा होगा !! 

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-०२/०७/२००४ , शुक्रवार,शाम- ०४.०५ बजे ,
राप्तीसागर एक्स्प्रेस, वारंगल-विजयवाडा रे. स्टे. के बीच मे

Friday, 16 August 2013

कजरी (सखी सावन क, अइसन बहार बा)

सखी सावन , अइसन बहार बा,
जिया बेकरार, बा ना...
सखी रिमझिम , अइसन बरसात बा,
जिया बेकरार, बा ना....
सखी सावन , अइसन.......

झुला पड़ा, चारों ओर
नाचे मोर, चहुं ओर
लागत प्रेम, डोर
दिल में होत, बा अजोर
सखी मन , हमार तो, पतंग भा..
जिया बेकरार, बा ना....
सखी सावन , अइसन.......

घटा घेरे, घनघोर।
पानी बरसे, बड़ा जोर
देखो पपिहा, करे शोर
दादुर बोले, जोर-जोर
सखी रहि-रहि के, बिजुरी चमकात बा...
जिया बेकरार, बा ना....
सखी सावन , अइसन.......

चारों ओर बा, हरियाली
खुश हो रहल, बा माली
कहीं होत बा, बोआई
कहीं धान , रोपाई
सखी हिल-मिल के, गीत गवात बा...
जिया बेकरार, बा ना....
सखी सावन , अइसन.......


जेके पिया हैं, परदेश
ओके सावन, लागे जेठ
ना ही सजते, उनके केश
ना ही बढ़ियां, सा बेष
सखी बिरहिनि के, सावन , सोहात बा....
जिया बेकरार, बा ना...

सखी सावन , अइसन बहार बा,
जिया बेकरार, बा ना...
सखी रिमझिम , अइसन बरसात बा,
जिया बेकरार, बा ना....
सखी सावन , अइसन.......

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavypushpanjali.blogspot.com
07-08-2013,wednesday,7.35pm,
pune,m.h.