Thursday, 5 September 2013

गौ माँ तब रुदन करती होगी

खुश रहो लाल मेरे तुम सब,
ना तुमसे कोई शिकायत है ।
वे हमे जीते जी हलाल कर रहे हैं,
पर ये सबके लिये तो कयामत है ॥

मैं माँ हूं,मैने माँ का अदा किया फर्ज,
मै तुम सब को दूध पिलाती थी ।
मेरे मल-मूत्र से होता था घर शुद्ध,
और तुम्हारे घर की शोभा बढ़ाती थी ॥

कभी जब संकट आता था,तुम सब पर,
तब मै सारे संकट हर लेती थी ।
जब कभी बुरा दिन आता था,
तो मै साथ तुम्हारा देती थी ॥

आज जब मै बूढ़ी, लाचार हो गई,
तो इन कसाइयों ने हमको खरीद लिया ।
चंद रुपयों की लालच मे,
तुमने मां को अपने बेच दिया ॥

मै मर रही हूं तो मुझे मरने दो,
मुझे इसका कोई अफसोस नही ।
तुम सब खुश रहना मेरे लाल,
ये मां का सदा आशिष यही ॥

अभी संकल्प तुम सब को करना होगा,
कि हम गौ मां को अपने बचायेंगे ।
नही लाल वो दिन दूर नहीं,
जब ये तुम पर भी जुल्म ढहायेंगे ॥

ऐसी ही करुण पुकारों से,
गौ माँ तब रुदन करती होगी ।
जब तेजधार हथियारों से ,
वो जीते जी कटती होगी ॥
वो जीते जी कटती होगी....

मोहन श्रीवास्तव (कवि)

www.kavyapushpanjali.blogspot.com
friday,3am,06-09-2013,(747),
pune,maharashtra.




Wednesday, 4 September 2013

गुरू महिमा


गुरू से बड़ा नहि हरि है,
गुरु से बड़ा नहि शिव है !
गुरु से बड़ा नहि ब्रह्मा है,
गुरु से बड़ा नही जीव है !!

सब मे उसी का नूर समाया,
घट-घट मे उसी का वास है !
भटके हुए को राह दिखाता,
जन-जन मे उसी का निवास है !!

अंधों के लिए आंखे है वह,
तो बहरों के लिए कान है !
बे-सहारों का सहारा है वो,
और मुर्दों के लिए तो जान है !!

सुंदरता का मूरत है गुरु,
और वो सबसे अति सुंदर है !
वो नही किसी मंदिर-मस्जिद मे,
वो तो दिल के अंदर है !!

सभी ग्रहों का राजा है गुरु,
सभी धर्मों का संगम है !
अंधेरे मे उजाला है गुरु,
वो हर पल तेरे संग मे है !!

उसका कोई रूप नही है,
पर वो सभी रुपों मे मिलता है !
कली नही है,फ़िर भी वो,
फ़ूलों कि तरह खिलता है !!

अग्यान मिटाता है पल मे,
वह ग्यान सिखाता है हमको !
वह जलमे,नभमे,ना थल मे
पर उनका भेद बताता है हमको !!

जाति-पाति से दूर है वो ,
ना हि उसका कोइ नाम है !
मानवता हि जाति उसका,
वो ही अल्लाह,नानक ,श्रीराम है !! 


पंख नही है उसको मगर,
पक्षियों की तरह वो उड़ता है !
पंगु है ना उसके पैर,
पर हर जगह वो बिचरा करता है !!

आदि नही,ना उसका अंत,
पर वह शुरू से आखिर तक मे है !
वह अनादि है और अनंत,
पर वह इन सब के मध्य मे है !!

नेत्र बंद हैं उसके मगर,
पर वह सभी को देखता रहता है !
अभिमान से नही मिलता है वह,
वह श्रद्धा से सभी को मिलता है !!

दुख के सागर मे रह कर वह,
सुख सागर मे गोता लगाता है !
नींद मे डूबे हुए लोगों को,
अपनी ग्यान से उन्हें जगाता है !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
रचना का दिनांक-०८/१०/२०००,रविवार,सुबह ५ बजे
चंद्रपुर(महाराष्ट्र)