Sunday, 9 February 2014

दौलत

यह कैसी दुनिया है यारों,  कई लोग यहा पर मिलते हैं !
कानून-न्याय और धर्म ,आदमी, हर चीज यहा पर बिकते हैं !!

लोगों की आबरु और ईज्जत ,पल भर मे खरीदे जाते हैं !
जिस्मों के भी सौदागर, हर जगह ही देखे जाते हैं !!

नौकरी -चाकरी और औरत, जो चाहे वो मिलते हैं !
इसके पा जाने से ही, मुर्झाए चेहरे खिलते हैं !!

ये सब चीज तभी मिलते है,जब अपने पास मे दौलत हो !
इसके बिन सब सुना-सुना,घर ,द्वार या औरत हो !!

दौलत से शोहरत मिलती है,दौलत से ही नाम !
दौलत से ही बन जाते है, बिगड़े हुए सब काम !!

वोटों की भी राजनीति ,जो दौलत के सहारे चलती है !
दौलत से कुर्सी मिल जाती,जो कई साल तक चलती है !!

आलिशान कोठिया-बंगले, सजा हुआ आराम महल !
गाड़ी- मोटर-औरत-बिवी,दौलत से ही शीश महल !!

यार-दोस्त उसके ही हैं,जो हो अच्छे पैसे वाला !
शाशन-न्याय उसी का है,जो होवे दौलत वाला !!

दौलत के आ जाने से ही,लोगों की आखें बदल जाती !
जो लोग वे कल तक थे अपने,उनसे बातें करने मे शरम आती !!

इसके लिए ही कई लोग, आपस मे लड़ते रहते है !
दौलत के लिए ही प्राय:,आपस मे लड़ते रहते है !!

सौ बातों की एक बात,अब दौलत का ही जमाना है !
जिसके पास नही है दौलत,वह आदमी नही जनाना है !!

पर इतना तो ध्यान रहे कि, पैसों से शान्ति नही मिलता ।
कागज के फूलों जैसा  ही ,हमारा जीवन नही खिलता॥

मोहन श्रीवास्तव (कवि)

दिनांक-१४/८/१९९१ ,वुद्धवार,रात्रि १०.३५ ,बजे,

एन.टी.पी.सी. दादरी ,गाजियाबाद (उ.प्र.)

Saturday, 1 February 2014

बदनाम गली (ऐसी ही दर्द भरी चित्कारों से)

इतना मत जुल्म ढहावो मुझ पर,
ना मुझ पर इतना अत्याचार करो ।
मैं भी किसी की हूं बेटी,
ना हमसे इतना क्रूर व्यवहार करो ॥

आंटी,अंकल मैं पांव पड़ रही,
मुझ पर इतना ना जुल्म करो ।
जिस्म फरोशी के धंधे के लिये,
नहीं मुझे मजबूर करो ॥

मेरा जीवन तबाह हो जायेगा,
ना ही मुझे कोई अपनायेंगे ।
मेरे घर के परिवार सभी,
जीते जी मर जायेंगे ॥

माँ जीते जी मर जायेगी,
मेरे पापा कहां मुंह दिखायेंगे ।
जब तक जियेंगे लोगों में,
नफरत से देखे जायेंगे ॥

ऐसी ही दर्द भरी चित्कारों से,
वो उन सबसे विनती करती होगी ।
जब कोई अबला या बेटी,
जिस्म फरोशों के जाल मे फसती होगी ॥
जब कोई अबला या बेटी,
जिस्म फरोशों के जाल मे फसती होगी.....

मोहन श्रीवास्तव(कवि)
31-01-2014,Friday,05:00pm,(848)

Pune,M.H.




Sunday, 26 January 2014

विनम्रता को कभी न खोना

मिल तो जाता है अपमान बहुत,
पर सम्मान बहुत मुश्किल से मिलता ।
दुनिया मे दुःख की कमी नहीं,
पर खुशी तो कभी-कभी मिलता ॥

जैसे पेड़ में फल लग जाने से,
वृक्ष और भी झुक जाता ।
फूल भी देखो अपनी डाली में,
कितना प्यारा है मुस्काता ॥

विद्द्या,लक्ष्मी,सम्मान आदि,
ये सब बहुत भाग्य से मिलते हैं ।
जिसको पाकर के हर दिल,
मन ही मन तो खिलते हैं ॥

हम चाहे कितना बढ़ जायें,
पर हमें अहंकार कभी किसी का न हो ।
अहंकार आज तक किसी का चला नहीं,
बस इतिहास को पढ़के तो देखो ॥

विनम्रता को कभी न खोना,
ये मानव की सही पहचान है ।
इससे प्यार और भी मिलता,
और सदा ही मिलता सम्मान है ॥
इससे प्यार और भी मिलता,
और सदा ही मिलता सम्मान है.....

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
25-01-2014,Saturday,11:45am,(841)

Pune,M.H