चाह नही मुझे ऐसी भेंट का, जब राहों में मैं फेंका जाऊं । मैं तो अपनी डाली में मस्त हूं, जहां हंसते हंसते मैं मर जाऊं ॥ ईनाम पुरष्कारों की नही चाह, जब नहीं मिले तो दुःख पाऊं । मैं तो अपनी डाली में मस्त हूं, जहां हंसते हंसते मैं मर जाऊं ॥ चाह मुझे उन अच्छे ईंषानों का, जिनके दिल मैं बस जाऊं । चाह मुझे उन सत्य पथिक का, जिनके चरणों में मैं चढ़ जाऊं ॥ चाह मुझे उन हवाओं का, जब मैं खुशबू उनके संग बिखराऊ । चाह मुझे भगवान के चरणों का, जहां हसते हसते मैं चढ़ जाऊं ॥ मोहन श्रीवास्तव (कवि)
Monday, 19 February 2024
ना होना कभी निराश
गजल (अपनी किस्मत में तो हम)
रायपुर दर्शन
छत्तीसगढ़ी गीत
"रायपुर दर्शन"
(ए जी दिल त हमर घबराथे)
ए जी दिल त हमर घबराथ हे.....2
मोला कउनउ शहर घुमा दे....2
अब ना नोनी के बाबू कछु सोहाथ हे.....
मोला कउनउ जगह घुमा दे.....
ए जी दिल त हमर ......
लोगन से सुने हबे,रायपुर शहर नाम ....2
जहाँ लगथ हे सुघर बजार...2
उहाँ बड़-बड़ बिल्डिंग अउर मॉल हे....
मोला ओही जगह घुमा दे .....
ए जी जियरा हमार..
मालों में मॉल हाबे,सिटी मॉल हे....2
अम्बुजा,मैग्नेटो बड़ा जोरदार हे.....2
उहाँ तरह-तरह के रोजी-रोजगार हे....
मोला ओही जगह घुमा दे .....
ए जी जियरा हमार..
रायपुर रजधानी हमर छत्तीसगढ़ के शान हे..2
हमन छत्तीस गढ़िया हौं बड़ अभिमान हे....2
जहाँ बड़ तेजी से होथ त विकास हे....
मोला ओही जगह घुमा दे .....
ए जी जियरा हमार..
महादेव घाट जाके जल हम चढाबो....2
महामाया मंदिर क दर्शन करबो....2
जहां बंजारी माई क पावन धाम हे.....
मोला ओही जगह घुमा दे .....
ए जी जियरा हमार..
एयर पोर्ट ,स्टेडियम ,एनर्जी पार्क हे.....2
पंडित रवि शंकर विश्वविद्यालय महान हे....2
जहां रायपुर स्टेशन शानदार हे.....
मोला ओही जगह घुमा दे .....
ए जी जियरा हमार..
गुरु घासी दास संग्रहालय भवन में......2
छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य मण्डल के आंगन मे..2
जहां साहित्यकारन क जुरथ त समाज हे...
मोला ओही जगह घुमा दे .....
ए जी जियरा हमार..
रायपुर क टूरा-टूरी बड़ इतराथे......2
दुचक्का पे बइठके भाव बड़ खाथे..2
उमन इंगरेजी में का -का गोठियाथे .....
मोला ओही जगह घुमा दे .....
ए जी जियरा हमार..
नवां- नवां फैशन से बिजुरी गिराथे.....2
दिन में त भीड़-भाड़ ,रात जगमगाथे ....2
जहां सबोजन बस्तर के करथ त सम्मान हे....
मोला ओही जगह घुमा दे .....
ए जी जियरा हमार..
नवां रजधानी-शहर हम घुमबो....2
जलेबी-बालूशाही-गुलाब जामुन हम खाबो....2
जहां मिलथे सबो श्रृंगार हे......
मोला ओही जगह घुमा दे .....
ए जी जियरा हमार..
जी भर के घुमबो हम रायपुर शहर मा....2
फिर हम लउटबो अपने गांव ला....2
जहां दिल में त मोहन क याद हे.....
मोला ओही जगह घुमा दे .....
ए जी जियरा हमार..
ए जी जियरा हमर घबराथ हे.....2
मोला कउनउ शहर घुमा दे....2
अब ना नोनी के बाबू कछु सोहाथ हे.....
मोला कउनउ जगह घुमा दे.....
ए जी जियरा हमार.......
मोहन श्रीवास्तव (कवि )
14-03-2015,02:30A.M,(927)
Saturday,Mahaveer nagar,Raypur (C.G)
उत्तर प्रदेश दर्शन
गजल (इन खुबसूरत पावों को,जमीं पे न उतारिए)
गजल
(इन खुबसूरत पावों को,जमीं पे न उतारिए)
इन खुबसूरत पावों को,जमीं पे न उतारिए ।
कहीँ लग न जाए घाव,इन्हें मत उतारिए ।।
इन खूबसूरत पावों को..........
यहां पत्थरो के साथ में,कंकड़ व् धूल हैं ।
कही लग न जाए दाग,इन्हें मत उतारिए ।।
इन खूबसूरत पावों को..........
यहां हर तरफ सुलगती,धधकती सी आग है ।
कहीँ जल न जाए पांव ,इन्हें मत उतारिए ।।
इन खूबसूरत पावों को..........
यहां बर्फ भी बहुत,कड़ाके की सर्द है ।
कहीँ जम न जाए पांव,इन्हें मत उतारिए ।।
इन खूबसूरत पावों को..........
मेहंदी रचे इन पावों को,मेरे दिल में उतारिए ।
कहीँ लग न जाए घाव,इन्हें मत उतारिए ।।
इन खुबसूरत पावों को,जमीं पे न उतारिए ।
कहीँ लग न जाए घाव,इन्हें मत उतारिए ।।
मोहन श्रीवास्तव (कवि)
14-09-2014, 08:45 P.M, (874),
Bahri,Sidhi(M.P)
छंद:- बसन्त तिलका "सरस्वती वंदना"
छंद:- बसन्त तिलका
"सरस्वती वंदना"
लाला ललाल ललला, ललला ललाला सरस्वती वंदना
वागीश्वरी विनय मैं, करता तुम्हारी।
बैठी मराल पर हो, जननी उदारी।।
हे ब्रह्मदेव गृहणी, गुण ज्ञान धारी।
विद्या तथा विनय दो,शुभ लाभ कारी।।१।।
है कंठ में स्फटिक की, शुचि दिव्य माला।।
हो श्वेत वस्त्र पहनी , मुख में उजाला।।
धारे किताब कर में , शुभ कर्ण बाला।
माथा किरीट मणि है, छवि है निराला।।२।।
लेके सितार कर में, विमला बजाती।
पाजेब साज पग में, करुणा लुटाती।।
भौंहें विशाल दृग के, जग को लुभाए।
दाती पुकार सुनके, झट दौड़ आए।।३।।
दो ज्ञान बुद्धि मुझको, विपदा निवारो।
मां लेखनी सफल हो, दुख क्लेश टारो।।
दाती दयालु रहके,भव से उबारो।
हे शांत चित्त मइया, सब पाप जारो।।४।।
है आश मातु तुमपे, बनना सहारा।
कोई नहीं जगत में, यह बेसहारा।।
जानूं न ध्यान करना, लिखना न आता।
ना ज्ञान राग सुर का, लय में न गाता।।५।।
देवी कृपालु रहना, यह है भिखारी।
दो भक्ति शक्ति अपनी, बनके अधारी।।
मैं गीत नित्य रचके, तुमको सुनाऊं।
मां भक्ति भाव हिय में, रख गीत गाऊं।।६।।
मोहन श्रीवास्तव
खुश्बू विहार कालोनी अमलेश्वर दुर्ग छत्तीसगढ़
१७.०२.२०२४, शनिवार, १२.५० दोपहर
Wednesday, 10 January 2024
हे मुरली मनोहर श्याम।
हे मुरली मनोहर श्याम।
हे मुरली मनोहर श्याम।
प्रभु आओ, प्रभु आओ…
मेरे बिगड़े बनाने काम।।
प्रभु आओ, प्रभु आओ….
मेरी नैया डोल रही है, बीच भँवर में आओ।
एक भरोसा मुझको तुमपर, आकर लाज बचाओ।।
मुझे जग से नहीं है काम….
प्रभु आओ, प्रभु आओ….
हे मुरली मनोहर श्याम
मेरे बिगड़े बनाने काम…
प्रभु आओ, प्रभु आओ…
मुझको कोई पंथ ना सूझे, तेरा एक सहारा।
ले चल मुझको दूर यहाँ से, अब नहीं यहाँ गुजारा।।
मैं लूँगा तुम्हारा नाम….
प्रभु आओ, प्रभु आओ…
हे मुरली मनोहर श्याम।
प्रभु आओ प्रभु आओ….
मेरे बिगड़े बनाने काम…
प्रभु आओ, प्रभु आओ…
सब अपराध क्षमा करके , अपना लो गोकुल वाले।
तेरी लीला बहुत सुना हूँ, तुम हो बड़े निराले।।
मुझे ले जाने निज धाम…
प्रभु आओ, प्रभु आओ…
हे मुरली मनोहर श्याम।
प्रभु आओ प्रभु आओ….
मेरे बिगड़े बनाने काम…
प्रभु आओ, प्रभु आओ…
मेरी बुद्धि थोड़ी सी है, हूँ जन्मों का पापी।
पातक के उद्धारक तुम हो, जग में परम प्रतापी।।
मैं दुनिया में बदनाम…..
प्रभु आओ, प्रभु आओ…
हे मुरली मनोहर श्याम।
प्रभु आओ प्रभु आओ….
मेरे बिगड़े बनाने काम…
प्रभु आओ, प्रभु आओ…
कवि मोहन श्रीवास्तव
15/04/91
Sunday, 1 October 2023
(शार्दूल विक्रीडित छंद)जय दुर्गे मां "देवी स्तुति"
Wednesday, 6 September 2023
"कलाधर छंद"(श्रीकृष्ण जन्म)अर्ध रात्रि भाद्र मास
Monday, 4 September 2023
आदि गुरू शंकराचार्य जी द्वारा रचित "गुरु अष्टकम" का भावानुवाद
आदि गुरू शंकराचार्य जी द्वारा रचित
"गुरु अष्टकम" का भावानुवाद
"महाभुजंग प्रयात सवैया"
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भले आपका गात हो रम्य चारू, प्रिया आपकी भी ललामा लगे है।
यशोकीर्ति चारों दिशा में बढ़े या, धनानादिकें मेरु जैसे पगे हैं।
सभी हो प्रिया पुत्र पौत्रादि द्रव्या, स्वसा भ्रातृ या गेह सारे सगे हैं।
हिया में न आचार्य के पांव पूजेँ , सभी व्यर्थ जानो सभी व्यर्थ जानो।।1।।
सभी वेद वेदांग जिह्वाग्र पे हों, रचें श्रेष्ठ काव्यादि गद्यादि को हैं।
मिले देश देशांतरों में प्रतिष्ठा ,चलें वें सदाचार के मार्ग पे हैं।।
यशोगान होता रहे नित्य चाहे, करें मान सम्राट आ व्यक्ति द्वारे।
हिया में न आचार्य के पांव पूजेँ , सभी व्यर्थ जानो सभी व्यर्थ जानो।।2।।
भलाई तथा दान जो भी करूं मैं, यशोकीर्ति हो व्याप्त चारों दिशाएं ।
सभी वस्तुएं लोक की जो गुणी हैं, सदा हाथ मेरे सभी वो सुहाएं।।
प्रिया हो ललामा धनानादि या हो, सभी वस्तुओं से हटे ध्यान मेरा।
हिया में न आचार्य के पांव पूजेँ , सभी व्यर्थ जानो सभी व्यर्थ जानो।।3।।
सभी ध्यान पूजा मिले सिद्धि सारे , विरागी बनूं मैं नहीं ये लुभाएं।
तजूं मोह शाला अरण्यादि का मैं, परे मैं रहूं दूर ना ये रिझाएं।।
स्वतः कामना नष्ट सारे हमारे, सभी व्यर्थ हैं ये बिना ये गुरू के।
हिया में न आचार्य के पांव पूजेँ , सभी व्यर्थ जानो सभी व्यर्थ जानो।।4।।
कवि मोहन श्रीवास्तव
दरबार मोखली, पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़
14.04.2023


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