जहां भी जाता हूं मैं, हमें ठोकरें मिला करता ।
मेरे नसीब में ये, सिलसिला चला करता ॥
जहां भी जाता हुं मैं....
मैं जिसे भी अपना कहूं, वो होता नही हमारा है ।
मेरे तो नाव को,मिलता नही किनारा है ॥
जहां भी जाता हूं मैं....
हजारों गम के थपेड़े, सहे हैं हमने ।
हमें तो जख्मों को सहने, की जैसे आदत है ॥
जहां भी जाता हूं मैं....
कभी खुशी हमे मिलता,तो हमको डर लगता ।
मेरी खुशी तो ये,गम में बदल जो जाता है ॥
जहां भी जाता हुं मैं....
हमें तो फूलों की बागों में, फूल नही मिलता ।
वहां भी कांटा ही कांटा,नजर तो आता है ॥
जहां भी जाता हूं मैं....
हमें शिकवा-शिकायत,नही जमाने से ।
किन्हीं दुआवों से,ये गम तो गुजर जो जाता है ॥
मेरे नसीब में ये, सिलसिला चला करता ॥
मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
26-01-2001,friday,7:50pm,(444),
thoppur,dharmpuri,tamilnadu.
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