नारियों का शान होता है घूंघट,
जो सबको दिवाना बनाता है ।
जब तक दिखता नहीं मुखड़ा,
तब तक कल्पना बहुत ही कराता है ॥
मुखड़ा तो चाँद जैसा होगा,
आखें होंगी मृगनयनी से ।
होठों का रंग गुलाबी सा,
भौहें तो होंगी नुकिली से ॥
कानों में लटकते होंगे झुमके,
सिर पे बेंदी तो होगा ।
नाक मे पहनी होगी नथिया,
और माथ पे बिन्दी तो होगा ॥
जब तक उसे वो देख न ले,
दिल में कई सवाल तो आता हैं ।
घूंघट होता है ऐसा ही,
जो सभी दिलों को भाता हैं ॥
स्त्री का लाज होता है घूंघट,
इसे मिलता है सम्मान बहुत ।
घूंघट तो दिल की धड़कन है,
जिसे अपने पर है अभिमान बहुत ॥
घूंघट तो दिल की धड़कन है,
जिसे अपने पर है अभिमान बहुत....
मोहन श्रीवास्तव (कवि)
24-01-2014.Friday,05:00pm,(839)
Pune,M.H
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