याद आता है हमें अपना देश,
जिस देश को भारत कहते हैं ।
नारियां जहां सीता जैसी,
और पुरुष राम से रहते हैं ॥
उस देश की माटी की खुशुबू,
रह-रह के याद हमे आता ।
जब-जब वो याद है आये हमें,
नयनों मे नीर तो भर आता ॥
भोले-भाले,सीधे-सादे,
वे बहुत ही होते हैं अच्छे ।
इंषानियत जहां है जन-जन में,
और दिल के भी होते सच्चे ॥
माता-पिता,गुरू-गौ का,
वहां सम्मान बहुत ही किया जाता ।
इंषान मात्र की बात ही क्या,
वहां जानवरों को भी प्यार किया जाता ॥
बिभिन्न तरह के धर्म वहां,
और कई तरह के लोग हैं ।
आपस में वे सब भले लड़ें,
पर दुश्मनों के लिये तो बोझ हैं ॥
प्रकृति की अनुपम छटा है न्यारी,
जहां सभी ऋतुओं का होता दर्शन ।
जहां जाड़ा,गर्मी,बरसात सभी,
हर मौसम का होता अवलोकन ॥
दुनिया मे अपने भारत जैसा,
कोई भी ऐसा देश नहीं ।
जगद्गुरू सदा से रहा है ये,
इसमे किसी को हो संदेह नही ॥
जगद्गुरू सदा से रहा है ये,
इसमे किसी को हो संदेह नही.....
मोहन श्रीवास्तव (कवि)
17-02-2014,Monday,01:30pm,(857)
Pune,M.H.



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