जब कोई कली को देखते हैं भौरे ,
रह रह के आशिकी वो करते ,
और इक-दूजे से शर्माते हैं ।।
वो कली भी होती है प्रसन्न ,
कि उसके इतने दिवाने है ।
कोई कहाँ का है और कैसा है ,
कोई कितने तो अन्जाने है ।।
कोई करते हैं ईशारे, वे देख बेचारे ,
बड़ी आश लगाये उस पर ।
जब कभी मुस्का दे कली या बातें कर ली ,
तो लगे बिजली ही गिरा है कभी रह रह कर ।।
दिल बेकरार हो जाता है ,
जब कभी अपनों से ओझल हो जाती है ।
देखे हैं सब तो सुनहरे सपने,
जब वो हौले से कभी मुस्काती है ।।
जब कोई कली को देखते हैं भौरे ,
तो आशिक सब बन जाते है ।
रह रह के आशिकी वो करते ,
और इक दूजे से शर्माते हैं ।।
मोहन श्रीवास्तव (कवि)
22-03-2014,05:00AM,(864),
Saturday ,In pune- Bilaspur expss train between Wardha To Nagpur
(M.H)
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