आ गए हैं देखो रितु राज बसंत,
मौसम ने ली अंगड़ाई ।
हरे-भरे ये बाग-बगीचे,
धरा पे छाई तरुणाई ॥
खुश होके देखो नाचे मयुरा,
कोयल राग अलापे ।
कामदेव छा गये हैं सब पर,
मन मे सबके व्यापे ॥
पशु-पक्षी,या नर-मादा,
सब रहि-रहि के इतराए ।
आपस मे जिन्हें प्यार किसी से,
वो नयन से नयन लड़ाएं ॥
मदमस्त आम बौरा करके,
प्रेम का रस टपकाए ।
चम्पा-चमेली को देख-देख,
गुलाब का जी ललचाए ॥
प्रेम का रंग चढ़ा है सबमें,
पिली-लाल-गुलाबी ।
धानी-हरी,नीले रंग से,
आखें हुई शराबी ॥
आ गए हैं देखो रितु राज बसंत,
मौसम ने ली अंगड़ाई ।
हरे-भरे ये बाग-बगीचे,
धरा पे छाई तरुणाई ॥
हरे-भरे ये बाग-बगीचे,
धरा पे छाई तरुणाई.....
मोहन श्रीवास्तव (कवि)
11-2-2014,Tuesday,02:00pm,(851)
Pune,M.H.
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