मुझे लालच नही किसी सम्मान-मान का,
जब नहीं मिले तो दिल जलता ।
मैं तो अपनी डाली मे मस्त हो,
मर जाना ही पसंद करता ॥
ऐसे मखमली सेज का क्या करना,
जहां बेदर्दी से मसला जाता ।
मै तो अपनी डाली मे मस्त हो ,
मर जाना ही पसंद करता ॥
ऐसी भेंट मे जाना पसंद नहीं है हमें,
जब राहों मे मैं कुचला जाता ।
मै तो अपनी डाली मे मस्त हो ,
मर जाना ही पसंद करता ॥
सदा सत्य पे चलने वालों के तो,
हम चरणों में झुक जाते हैं ।
पर असत्य मार्ग वालों को तो,
हम कांटे ही कांटे चुभाते हैं ॥
भगवान के श्री चरणों में हम,
श्रद्धा से शीश नवाते हैं ।
देश प्रेम है जिनको भी,
वे मेरे दिल मे बस जाते हैं ॥
मैं चाहता सदा नेक इंसानों को,
जिनका दिल गंगा जल जैसा रहता ।
उनकी अमृत धारा मे मैं,
खुशबू बनके बहा करता ॥
उनकी अमृत धारा मे मैं,
खुशबू बनके बहा करता.....
मोहन श्रीवास्तव (कवि)
12-02-2014,Wednesday,10:00am,(852)
Pune,M.H.
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