याद आता है मुझे वो वेलेन्टाइन डे का बेलन,
जब मैं सब कुछ छोड़ के भागा था ।
बेलन मेरे पीछे-पीछे,
बेलन मेरे पीछे-पीछे,
और मै तो आगे-आगे था ॥
एक बार की बात है मित्रों,
उस दिन वेलेन्टाइन डे ही था ।
एक रुपसी युवती ने ,
मुझे बहुत ही प्रपोज किया ॥
मैं भी उसकी बातों मे आकर,
सोचा मै भी थोड़ा दिल अपना भी बहला लूं ।
वेलेन्टाइन डे पर कुछ मै भी,
उससे प्यार की बातें कर लूं ॥
बात जब पक्की हुई हमारी,
हम दोनों प्यार से थोड़ी दूर गये ।
वो मदमस्त बहारों का था मौसम,
जहां झील के पास हम बैठे थे ॥
प्यार भरी बातें उसने की,
अपने बीते इतिहास की ।
मैने भी अपना कहानी किया बया,
और हुआ हास-परिहास भी ॥
जब ये बात पता चली मेरी गृहमंत्री जी को,
तब वे बेलन लेके दौड़ पड़ी ।
दुर्गा से काली बनकर के,
मेरे ऊपर वे टूट पड़ीं ॥
फिर क्या कहूं अपनी कहानी मित्रों,
मुझ पर बेलन पर बेलन पड़ते जाते थे ।
मैं जान बचा के भाग रहा,
पर वे प्रहार को करते जाते थे ॥
उस दिन के बेलन से पड़ी मार को,
मैं आज तक भूल नहीं पाया हूं ।
जब-जब वेलन्टाइन डे आता मित्रों,
जब-जब वेलन्टाइन डे आता मित्रों,
तब-तब मैं मुर्झा जाता हूं ॥
जब-जब वेलन्टाइन डे आता मित्रों,
तब-तब मैं मुर्झा जाता हूं......
मोहन श्रीवास्तव (कवि)
15-02-2014,Sunday,12:30pm,(856)
Pune,M.H.
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