नीक न लागे मोहे बसंत,
ना ही धरती का श्रृंगार ही ।
मोरा बसंत तो दूर बसा है,
मैं तो हुई बीमार सी ॥
मोर पिया तो दूर देश हैं,
मोहे कछु ना सोहाए ।
हर पल रहूं मैं उनकी याद में,
हर पल रहूं मैं उनकी याद में,
और नयनन में नीर भरि आए ॥
बौर आम कर अइसन लागे,
जइसे सुखी घास ।
हरियाली और फूली सरसो,
मोहे लगे न खास ॥
चम्पा,गुलाब कर फूल हो या,
या हो कदम्ब की डार ।
ना जानूं मैं इन सबको,
मैं पिया बिना लाचार ॥
गेहूं कर बाली हिल-मिलके,
मोहे बहुत चिढ़ावें ।
रहि-रहि बोली बोले कोयलिया,
और जोड़े त मुस्कावें ॥
पीर उठे है दिल मे मेरे,
जब फागुन की ठंडी बयार चले ।
कभी-कभी ये घटा की बूंदे
जइसे रहि-रहि के आग जले ॥
नीक न लागे मोहे बसंत,
ना ही धरती का श्रृंगार ही ।
मोरा बसंत तो दूर बसा है,
मैं तो हुई बीमार सी ॥
मोरा बसंत तो दूर बसा है,
मैं तो हुई बीमार सी......
मोहन श्रीवास्तव (कवि)
11-02-2014,Tuesday,06:00am,(850)
Pune,M.H.

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