Monday, 19 February 2024

बसंत ऋतु (बिन साजन कैसा बसंत)

नीक लागे मोहे बसंत,
ना ही धरती का श्रृंगार ही
मोरा बसंत तो दूर बसा है,
मैं तो हुई बीमार सी

मोर पिया तो दूर देश हैं,
मोहे कछु ना सोहाए
हर पल रहूं मैं उनकी याद में,
और नयनन में नीर भरि आए

बौर आम कर अइसन लागे,
जइसे सुखी घास
हरियाली और फूली सरसो,
मोहे लगे खास

चम्पा,गुलाब कर फूल हो या,
या हो कदम्ब की डार
ना जानूं मैं इन सबको,
मैं पिया बिना लाचार

गेहूं कर बाली हिल-मिलके,
मोहे बहुत चिढ़ावें
रहि-रहि बोली बोले कोयलिया,
और जोड़े मुस्कावें

पीर उठे है दिल मे मेरे,
जब फागुन की ठंडी बयार चले
कभी-कभी ये घटा की बूंदे
जइसे रहि-रहि के आग जले

नीक लागे मोहे बसंत,
ना ही धरती का श्रृंगार ही
मोरा बसंत तो दूर बसा है,
मैं तो हुई बीमार सी
मोरा बसंत तो दूर बसा है,
मैं तो हुई बीमार सी......

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
11-02-2014,Tuesday,06:00am,(850)

Pune,M.H.




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