Friday, 27 February 2015

कैंसर रोग भयानक है


रोग तो बहुत है दुनिया में ,
पर कैंसर रोग तो भयानक है ।
तत्काल उपचार यदि नहीं हुआ  ,
तो मौत की निश्चित आहट है ।।


सर्दी खाँसी की तरह फैल रहा यह रोग,
जो प्राण पे संकट बन कर आता ।
इसकी सही दवा नहीं होने से ,
रोगी मौत के मुंह में समा जाता ।।


लगभग 280 तरह के ,
कैंसर का प्रकार है हुआ करता ।
तेजी से फैलते  हैं इसके किटाणु ,
और कभी देरी से भी पता चलता ।।


कीमोथेरेपी व रेडियोथेरेपी से ही जादा ,
इसका उपचार किया जाता ।
यदि सफल रहा इसका प्रयोग ,
तब रोगी का आयु है बढ़ जाता ।।


कीमोथेरेपी के प्रयोग से ,
रोगी के बाल हैं झड़ जाते ।


शरीर के जो भी अच्छे तत्व हैं ,
इसके दुष्प्रभाव से नहीं है बच पाते ।।


खास बात इसका है मित्रों ,
कि यह छुआ छूत का रोग नहीं ।
रोगी से कीजिए भरपूर प्यार ,
और ईश्वर पे हो बिश्वाश सही ।।


इस रोग से बचना है तो ,
धूम्रपान - तम्बाकू का निषेध करें ।
हरी साग-सब्जी व फलों का ,
बहुतायत में प्रयोग करें ।।


योग्य व अनुभवी डाक्टरों का मिलना ,
इस रोग के लिये बहुत जरुरी है ।
नहीं तो पैसे भी बहाना व जान गवाना ,
ये हम सब की बस  मजबूरी है ।।


कैंसर के महंगे व लंबे ईलाज में ,
पैसे भी खर्च बहुत होते ।
इतने पर भी सगे -संबंधी , किसी अनहोनी से ,
सोच -सोच के हैं रोते ।।
इतने पर भी सगे -संबंधी , किसी अनहोनी से ,
सोच -सोच के हैं रोते ............


मोहन श्रीवास्तव (कवि)
10-02-2015, Tuesday,05:00AM,
Mahaveer Nagar ,Raipur (C.G)
(919)

Thursday, 29 January 2015

बस याद तुम्हारी ही है हमें


जहां भी देखूँ तुम ही तुम हो,
आती जाती इन श्वाशों में । 
तुम हर पल याद आती हमें ,
तुम अपने सुनहरे वादों में ॥ 

पायल की झनक जब कभी सुनता हूँ ,
लगता है तुम  आ रही हो ।
चूड़ी की खनक जब भी  सुनता ,
मानो तुम मुझे बुला रही हो ॥ 

जब कहीं बोल सुनता हूँ ,तुम जैसा,
मेरे धड़कन हैं बढ़ जाते । 
तश्वीर तुम्हारा जब मैं देखूँ ,
नयनों में नीर हैं  आते ॥ 

ये दोनों अनमोल रत्न ,
मेरे लिए तुम्हारी दो आँखे हैं । 
दोनों ही तुम्हारी तरह हैं ये ,
और इनके मजबूत ईरादे हैं ॥ 

न आश रहा ,न चाह रहा ,
ना ही कोई तो किनारा है । 
बस यादें तुम्हारी ही हैं हमें ,
जो देती हमें सहारा हैं ॥ 
बस यादें तुम्हारी ही हैं हमें ,
जो देती हमें सहारा हैं.. . . 

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
 (912)
7AM,Tuesday,Mahaveer Nagar,
Raipur (C.G) (912)
Mob.9009791406  

Tuesday, 20 January 2015

शोक संदेश ( आखिर कैन्सर से एक और जिन्दगी हार गई )

प्रिय मित्रों ,
आखिर कैन्सर से एक और जिन्दगी हार गई
मुझे अत्यंत दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है की मेरी धर्मपत्नी श्रीमती विभा श्रीवास्तवा का कैन्सर के कारण मात्र 2 माह 12 दिन की बिमारी में दिनांक 12-01-2015 को स्वर्गवाश हो गया। वे अपने पिछे एक पुत्र सौरभ (B.E Civil अंतिम वर्ष )व एक पुत्री समीक्षा( B.E , EEE प्रथम वर्ष) छोड़ गई हैं । 

''लिए थे फेरे सात थे हमने ,और किए थे कस्मे वादे।साथ जिएंगे ,साथ मरेंगे ,यही थे अपने ईरादे ॥ 
पर वो चली गई इस दुनिया से ,हम रह गए अकेले । 
बस यादें उनकी शेष हैं अब,जो लगते बड़े अलबेले ॥ 
बस यादें उनकी शेष हैं अब,जो लगते बड़े अलबेले ॥ 

मित्रों, मेरी अब तक की लिखी 900 रचनाएँ इनके लिए ही समर्पित हैं । 

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
रायपुर (छ. गढ़) 
mob-9009791406

Wednesday, 7 January 2015

सपनों के तारे उनके जमीं पे हैं आ गए

सपनों के तारे उनके जमीं पे हैं आ गए,
जिनके सहारे कभी थे वे मुस्कुरा रहे ।
हर हाल मे तो बस उन्हें जीना कुबूल था,
पर आज वो तो कैंसर से देखो हैं लड रहे ॥

पल भर मे उनकी खुशियों को जैसे लग गया नजर,
फूलों से आंख मे ,गम के आंसू जो आ गए ।
कहते थे दुःख के बाद सुख आता है जरुर,
पर आज उनकी जींदगी मे अंधेरे ही छा गए ॥

सब कुछ तो लुट चुका था, लुटने को कुछ न था,
पर आज अपनी जींदगी देखो लुटा रहे ।
कभी पेंसिल से जो लिखे थे,अरमानों का कोई खत,
पर आज अपने हाथों से उसे हैं मिटा रहे ॥

गुलशन में उनकी कलियां आने लगे थे अब,
वो भी अपने मेहनत पे थे इतरा रहे ।
पर सहसा अचानक कोई तूफान आ गया,
वो तो सोच-सोच के बस आसू बहा रहे ॥

तूफान तो आये थे उनके गुलशन मे बहुत से,
पर सह लिये थे वो सब हसते हुए।
मगर ये तूफान आया है जाने किधर से,
पर वो सह रहे हैं सब कुछ सहमे हुए ॥

 सपनों के तारे उनके जमीं पे हैं आ गए,
जिनके सहारे कभी थे वे मुस्कुरा रहे ।
हर हाल मे तो बस उन्हें जीना कुबूल था,
पर आज वो तो कैंसर से देखो हैं लड रहे ॥

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
9009791406 



३१-१२-२०१४. बुद्धवार,
कमला नेहरु कैंसर संस्थान इलाहाबाद(उ. प्र.)

Wednesday, 31 December 2014

मंगलमय हो यह नूतन वर्ष

नया दिन व नये वर्ष का,
आओ दिल से हम स्वागत कर लें ।
बीते वर्ष को अलविदा बोलकर,
आवो नये वर्ष की खुशियां भर लें ॥

यह हम सब का सौभाग्य ही है,
जो हम इस दिन का आनंद ले रहे हैं ।
परम पिता परमेश्वर की कृपा से,
जो हम सब इसमे शामिल हो रहे हैं ॥

सुख-समृद्धि से भरा रहे,
यह भारत वर्ष हमारा ।
नई-नई खुशियां दे हमको,
नया साल यह प्यारा ॥

मंगलमय हो यह नुतन वर्ष,
और सदा घर खुशियों से भरा रहे ।
कभी दुःख ना सताए किसी चीज का,
और धन-बैभव से खजाना भरा रहे ॥

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
09009791406


18-12-2000,monday,5:15pm,,
chandrapur,maharashtra.


Thursday, 13 November 2014

कभी किसी के रंग-रूप पर मत जावो

मत हंसी उड़ावो कभी उनका,
कल इनके अच्छे दिन भी आयेंगे ।
अभी दुःख के आंसू निकल रहे,
कल सुख के बहार भी आयेंगे ॥

काले कोयले की खदान से,
हीरा भी उसी से निकलता है ।
जो कि अंधकार मे उजाला बनकर,
सबको आलोकित करता है ॥

वर्तमान देखकर कभी किसी का,
भूल के मत परिहास करो ।
भविष्य सुनहरा जानकर उसका,
उसे कभी मत निराश करो ॥

सुख-दुःख तो ये लगे रहते,
कल दुःख का बादल छंट जायेगा ।
सुर्यास्त आज हो रहा है तो क्या,
कल नया सवेरा आयेगा ॥

किसी के रंग-रूप पर मत जावो,
उसके गुण का तो सम्मान करो ।
कभी किसी का वर्तमान देखकर,
भविष्य़ का मत उपहास करो ॥
कभी किसी का वर्तमान देखकर,
भविष्य़ का मत उपहास करो......

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
21-01-2014,Tuesday,11:30pm,(836)
Pune,M.H
www.kavyapushpanjali.blogspot.in