चाह नही मुझे ऐसी भेंट का, जब राहों में मैं फेंका जाऊं । मैं तो अपनी डाली में मस्त हूं, जहां हंसते हंसते मैं मर जाऊं ॥ ईनाम पुरष्कारों की नही चाह, जब नहीं मिले तो दुःख पाऊं । मैं तो अपनी डाली में मस्त हूं, जहां हंसते हंसते मैं मर जाऊं ॥ चाह मुझे उन अच्छे ईंषानों का, जिनके दिल मैं बस जाऊं । चाह मुझे उन सत्य पथिक का, जिनके चरणों में मैं चढ़ जाऊं ॥ चाह मुझे उन हवाओं का, जब मैं खुशबू उनके संग बिखराऊ । चाह मुझे भगवान के चरणों का, जहां हसते हसते मैं चढ़ जाऊं ॥ मोहन श्रीवास्तव (कवि)
Saturday, 22 August 2020
Thursday, 7 March 2019
‘’पाती सैनिक का पत्नी के नाम’’
( चौपाई छंद )
प्राण पिआरी दिल की रानी | सदा सुहागिन होउ सयानी ||
आज तेरी चिट्ठी क्या आई | याद
मुझे सबकी है सताई ||
वन्दवुं प्रथम बाबा अरु
दादी | सीस झुकाऊँ मातु पिता जी ||
कैसे हैं सब चाचा चाची |
बडकी मैया बड़े पिता जी ||
गुडिया जैसी कैसी बहना | आशिर्वाद उसे भी कहना ||
भैया भाभी चरण मनाऊँ | सिया राम जैसे गुण गाऊँ ||
अनुज कहो कैसा है मेरा | इहां उहां करता क्या फेरा ||
करे पढाई मन से कहना | पढ लिख कर फौजी है बनना ||
चन्ठ भतीजा और भतीजी | कैसी है हम सबकी जीजी ||
प्यारा बेटा प्यारी
बेटी | कैसे गांव गली अरु खेती ||
बड़े दिनों में पाती पाया | पढते पढते आंसू आया ||
मै लिखता सनेह से पाती | भरि
आई लिखते मम छाती ||
पिछली छुट्टी में घर आया | खुशियाँ था भरपूर मनाया ||
माँ के हाथों का वो खाना | आंचल से मुझको दुलराना ||
आती मुझको याद तिहारी | भूल न पाऊँ तुमको प्यारी ||
हर पल रखती ध्यान हमारा |
अपना सब कुछ मुझ पर वारा ||
बात बात में वो इतराना | मंद मंद तेरा मुसुकाना ||
छाई थी तुमपे हरियाली | होठों पे सजती थी लाली ||
करती थी तुम नैन
इशारे | इक दूजे को सदा निहारे ||
जाने का दिन जब था
आया | आँखों ने आंसू छलकाया ||
रो रो मेरी करी
विदाई | वारि बिना जिमि नदी सुहाई ||
वच्चों का रोना
बिलखाना | बापू जल्दी वापस आना ||
गले लगाके मैया रोई | बापू की आँखें थी खोई ||
यूनिट में था जब मै
आया | सबने मिलकर गले लगाया ||
मिलकर सबने बैग थे
खोले | भाभी ने क्या भेजा बोले ||
जो भी था सब मिलके
खाए | आपस में सब खूब हँसाए ||
और सुनाओ प्राण
पिआरी | लगे मोहिनी मोपर डारी ||
जो जो मन्नत बचा
तिहारा | अबकी पूरा करना सारा ||
छोटू का मुंडन है
करना | मन्नत का धागा है बधना ||
सीमा पे अभी युद्ध
की हलचल | रक्षा में रहते हम प्रतिपल ||
सारा भारत परिवार
हमारा | मातृभूमि पे जीवन वारा ||
छुट्टी मिलते ही
आऊँगा | सबकी खुशियाँ लौटाऊंगा ||
छोटू का भी टैंक
खिलौना | बिटिया के गुडिया का गहना ||
और सभी का लीस्ट
बनाया | तेरे झुमके को बनवाया ||
पत्र नही दिल इसको
मानो | बाँहों में मुझको हूँ जानो ||
कभी नही रोना तुम
प्यारी | हर पल है आशिष हमारी ||
पाती पढते पढते हलचल
| बाहर झांकी ठहर गया पल ||
सैनिक गाड़ी द्वारे
आई | सहम गई कुछ बोल न पाई ||
देखा इक शव उसमे आया
| जो है तिरंगे में लिपटाया ||
भीड़ बड़ी द्वारे है
मोहन | रुक गइ जैसे सबकी धड़कन ||
पति पहिचानि के
पिटहि छाती | पर धीरज मन में है लाती ||
अजर अमर हो पिया हमारे | जोर जोर जय हिंद पुकारे ||
अजर अमर हो पिया हमारे | जोर जोर जय हिंद पुकारे ||
कवि मोहन श्रीवास्तव
30/03/2019
रचना क्रमांक :- ( 1173 )
Thursday, 22 November 2018
''संसार के आधार हैं वो '' हरिगीतिका छंद ( SSIS SSIS S SIS SSI S )
"संसार के आधार हैं वो"
हरिगीतिका छंद ( SSIS SSIS S SIS SSI S )
संसार के आधार हैं वो , ज्ञान के भंडार हैं |
आकाश में पाताल में , वो शांत पारावार हैं ||
ब्रह्माण्ड में हैं व्याप्त सारे ,वेद के वो सार हैं |
औतार लेके तारते हैं , मोक्ष के ही द्वार हैं ||
सारे जहाँ में वो समाये , बात ये भी मानिये |
पाते सुखों को ध्या रहे जो , वो सभी में जानिये || .
जो जान के अंजान होते , नाम लेते हैं नहीं |
वो क्लेष पाते हैं सदा ही ,बात ये मानो सही ||
ब्रह्मा विष्णू वो ही त्रिधामा , देवता ये एक हैं |
जो भी करे हैं ध्यान पूजा , ईश सारे एक हैं ||
लेते उन्हीं का नाम सारे , जान या अंजान में |
पाते कृपा हैं नाथ के वो , हों किसी भी स्थान में ||
प्यारे दुलारे जीव सारे ,नाथ को जो मानते |
माता पिता के रूप जैसे ,बालकों को पालते ||
जो छोड़ के सारा जमाना , आपको ही ध्यानते |
इच्छा सभी की पूर्ण होती , आप ही हैं साधते ||
कवि मोहन श्रीवास्तव
रचना क्रमांक ;- ( 1126 )
23 . 11 . 2018
Monday, 19 November 2018
"राम जी का नाम लेके"गीतिका छंद ( SISS SISS SISS SIS )
"राम जी का नाम लेके"
गीतिका छंद ( SISS SISS SISS SIS )
राम जी का नाम लेके , काम सारे कीजिये |
जागते सोते सदा ही , नाम प्यारे लीजिये ||
राम ही प्यारे सभी को ,राम ही हैं तारते |
राम ही हैं प्राण देते , राम ही संहारते ||
राम छंदातीत हैं तो , राम प्यारे मीत हैं |
राम कालातीत हैं तो , राम मेरे गीत हैं ||
राम ही सारा जहाँ हैं , राम ही ब्रह्माण्ड हैं |
राम ही दाता विधाता , वो सवेरे चाँद हैं ||
राम जी का काम ही है ,प्राणियों को तारना |
हार के भी जीत देते , ये सदा ही मानना ||
हो धनी या हो भिखारी , रंक राजा और हो |
राम की पाते कृपा ही , या कसाई चोर हो ||
राम को जो जान लेते , दास हैं वो राम के |
काटते बाधा सभी के , आसरे जो राम के ||
राम जी संसार के हैं , बाप सारे जानिये |
ध्यान सेवा राम का हो , राम को ही मानिये ||
राम जी का नाम लेके , काम सारे कीजिये |
जागते सोते सदा ही , नाम प्यारे लीजिये ||
कवि मोहन श्रीवास्तव
रचना क्रमांक :- (११२५ )
Wednesday, 14 November 2018
''हे वीर तुम रणधीर हो'' ( मधुमालती छंद )
"हे वीर तुम रणधीर हो"
( मधुमालती छंद )
हे वीर तुम रणधीर हो |
चलते रहो रणवीर हो ||
माँ भारती के हीर हो |
रिपु के लिये यमतीर हो ||
भुज बंध पर अभिमान हो |
बस जीत ही अरमान हो ||
हित देश बस यह प्राण हो ||
निज वतन पर बलिदान हो ||
जयचंद दल पहचान हो |
उनकी जगह शमसान हो ||
बलवंत तुम गुणवान हो |
अरि वक्ष लहू लोहान हो ||
माँ भारती के लाल हो |
तुम दुश्मनों के काल हो ||
हम सभी के तुम ढाल हो |
रण में सदा बेताल हो ||
अरि लहू की नित प्यास हो |
श्री विजय की बस आस हो ||
धैर्य सदा तव पास हो |
माँ भारती के दास हो ||
जय हिन्द की ललकार हो |
सदा वैरियों पे प्रहार हो ||
निज हाथ में औजार हो |
दिन रात ही जयकार हो ||
हे वीर तुम रणधीर हो |
चलते रहो रणवीर हो ||
माँ भारती के हीर हो |
रिपु के लिये यमतीर हो ||
कवि मोहन श्रीवास्तव
रचना क्रमांक :- ( 1124 )
Wednesday, 31 October 2018
"आज पुकार रहे हम केशव"
मत्तगयंद छंद ( SII SII SII SII SII SII SII SS )
"आज पुकार रहे हम केशव"
आज पुकार रहे हम केशव , जाय छुपे कह हो सुख धामा |
काज सवांरहु हे मनमोहन , आज पड़ा तुमसे बड़ कामा ||
जाय रही अब लाज महाजन , आकर लाज रखो अभिरामा |
दीनदुखी हम स्वामि सखा तुम , नाथ तुम्ही मम पूरणकामा || 1 ||
जाय छुड़ाय दियो गजराज कु , ग्राह्य धरा पद था सुरधामा |
तारि दियो तुम गौतम नारि कु , पाहन थी पहुची पति धामा ||
चीर बढ़ाय दियो द्रुपदी कर , लाज बची तबहीं गुणधामा ||
मान कियो धन दानहु देकर , दीन दुखी फटहाल सुदामा || 2 ||
तारि दियो जिमि गीध अजामिल , नृसिंह रूप लिए अवतारा |
प्राण बचाय दियो प्रह्लाद कु , जाय उहां हिरण्याकश्यपु मारा ||
काज कियो नरसी कर माधव , भात भराय दियो सुख सारा ||
बालक ध्रुव करा तप साधन , लोक दियो खुश हो ध्रुव तारा || 3 ||
आनि पिलाय दयो बिष राजन , नाथ मिरा कर प्राण बचायो |
बेर जुठे शबरी घर खाकर , दीनन को तुम मान बढ़ायो ||
गाय सके नहि वेद पुरानन , नाथ कृपा जितनी बरसायो |
काज सवारहु श्याम पिया मम , आज तुम्ही पर आस लगायो ||
काज सवारहु श्याम पिया मम , आज तुम्ही पर आस लगायो || 4 ||
कवि मोहन श्रीवास्तव
रचना क्रमांक ;- ( 1123 )
Sunday, 21 October 2018
"भिन्न भिन्न ढेरों पंथ "
भिन्न भिन्न ढेरों पंथ , लिखे जा रहे हैं ग्रन्थ
सब उसी परमेश का ही ध्यान करते |
परमेश जो है एक , उसके रूप अनेक
निज मति सब कोई गुणगान करते ||
यह है हमारा देव , वह है तुम्हारा देव
जहाँ तहाँ सभी जन इसी पे हैं लड़ते |
एक ही ईश्वर जान , सब उसकी संतान।
फिर क्यूँ आपस में लड़ लड़ मरते ||
फिर क्यूँ आपस में लड़ लड़ मरते ||
कवि मोहन श्रीवास्तव
Tuesday, 9 October 2018
"महादेव शंभो पुकारा करेंगे "
भुजंग प्रयात छंद ( ISS ISS ISS ISS )
महादेव शंभो पुकारा करेंगे |
तुम्हारे बिना ना गुजारा करेंगे ||
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......
हरी ध्यान बाबा तुम्ही हो लगाते |
सभी के दुखों को सदा हो मिटाते ||
जटा शीश गंगा तुम्ही हो समाते |
दुखी लोग जो हैं गले से लगाते ||
बिहाने बिहाने उचारा करेंगे |
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......
भवानी करे ध्यान बाबा तुम्हारी |
इसी हेतु वो है तुम्हारी पियारी ||
अर्ध चंद सोहे गले सांप माला |
गणेशा व् कार्तिक दोनों उजाला ||
सुबो शाम भोले निहारा करेंगे |
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......
जटाजूट माथे सुहाना लगे है |
भभूती रमाये दिवाना लगे है ||
मदारी ,अनाड़ी ,कहे हैं पुरारी |
सदा लाज राखो तुम्ही त्रीपुरारी ||
सभी को आधारे उबारा करेंगे ||
महादेव शंभो पुकारा करेंगे |
तुम्हारे बिना ना गुजारा करेंगे ||
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......
कवि मोहन श्रीवास्तव
http://kavyapushpanjali.blogspot.com/2018/10/blog-post_9.html
http://kavyapushpanjali.blogspot.com/2018/10/blog-post_9.html
रचना क्रमांक ;-( 1112 )
04/10/2018
Friday, 5 October 2018
"जब याद करें तब आँख भरे "
तोटक छंद
( I I S I I S I I S I I S )
जबसे तुमको हम ध्याय रहे ,
( I I S I I S I I S I I S )
जबसे तुमको हम ध्याय रहे ,
तब से जग मोह समान लगे |
हर जीव बिना तुम होत दुखी ,
सब ओर जहान मसान लगे ||
अब नाथ दया कर दो हमपे ,
सब छोड़ तुम्हे नित ध्यान करें |
बस आस तुम्ही पर हो गहरा ,
जब याद करें तब आंख भरें ||
धन दौलत की अब चाह नहीं ,
कहता जग क्या परवाह नही |
जन मानस जान सके न तुम्हें ,
तुम सागर हो तव थाह नही ||
हमसे यदि हो गलती फिर भी ,
तब नाथ हमें तुम माफ़ करो |
मन में अभिमान जगे जब भी ,
अपराध क्षमा दिल साफ करो ||
हम दीन दुखी असहाय सुनो ,
तुम आदि अनादि अनंत पिया |
जग पे उपकार तुम्ही करते ,
तुमसे बढ़के न कहीं रसिया ||
जबसे तुमको हम ध्याय रहे ,
तब से जग मोह समान लगे |
हर जीव बिना तुम होत दुखी ,
सब ओर जहान मसान लगे ||
कवि मोहन श्रीवास्तव
http://kavyapushpanjali.blogspot.com/2018/10/blog-post.html
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Wednesday, 26 September 2018
Tuesday, 11 September 2018
Thursday, 30 August 2018
"चारों तरफ तामसी, प्रबृति का बोलबाला "
चारों तरफ तामसी, प्रबृति का बोलबाला
असुर समान इंसान आज हो रहे |
जीवहत्या नशाखोरी , पापकर्म , बेईमानी
बुरे कर्मों का बीज सब जगह बो रहे ||
नारियों पे अत्याचार, रोज होते बलात्कार
बेटियों को गर्भ में ही आज लोग खो रहे |
पाप कर्म देख देख, और कुरूप वेष
सीधे सादे इंसानों के दिल तो आज रो रहे ||
कवि मोहन श्रीवास्तव
Friday, 24 August 2018
"कालिका कराल काल, गले नर मुण्डमाल "
कालिका कराल काल, गले नर मुण्डमाल
करती रुधिर पान और अट्हास है |
जिव्हा ज्वलिनी ज्वाल, नयना हैं लाल लाल
शत्रुओं का प्रतिपल करती विनाश है ||
भक्तों की करती जय, पापियों की करे क्षय
रक्तबीज जैसों से बुझाती निज प्यास है |
भक्तों के लिए है ढाल, वैरियों के लिए काल
महाकाली हमको तो तुमपे ही आस है ||
कवि मोहन श्रीवास्तव
Friday, 17 August 2018
"हे अजातशत्रु अटल बिहारी जी "
"युग पुरुष अटल जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि"
हे अजातशत्रु अटल बिहारी जी
हे अजातशत्रु अटल बिहारी जी
शत शत बार नमन तुमको |
भारत माता के सच्चे सपूत
बारम्बार नमन तुमको ||
अपने शासन काल के दिनों में
तुमने जो करके दिखलाया था |
आजादी से अब तक ना कोई
ऐसा तो कर पाया था ||
सत्य अहिंसा भाई चारे की
नीति पे चलने वाले थे |
कटुता -शत्रुता भुला करके
सबको साथ में लेके चलने वाले थे ||
हे युगपुरुष तुम चले गए
छोड़ के इस भवसागर को |
अब प्रेम अमृत से कौन भरेगा
भारत माता के गागर को ||
आशीष तुम्हारा हम सबको
सदा सदा ही मिलता रहे |
भारत माता के अनमोल पुष्प
तू जनमानस में खिला रहे ||
भारत माता का अनमोल पुष्प
तू जनमानस में खिला रहे ||
कवि मोहन श्रीवास्तव
Tuesday, 14 August 2018
Monday, 13 August 2018
Tuesday, 7 August 2018
Saturday, 4 August 2018
"ऐसी करतूतों से गुलामी के आसार हैं "
"ऐसी करतूतों से गुलामी के आसार हैं "
काक जैसे कांव कांव ,स्वान जैसे भांव -भांव ,
गिद्ध जैसे संसद में करें ब्यवहार हैं |
कुर्सी के नशे में चूर , जिम्मेदारियों से दूर ,
टांग खिंचने में और बड़े होशियार हैं ||
देश हित बात छोड़ , करें स्वार्थ गठजोड़ ,
ऐसे नेता भारत माता के लिए भार हैं ||
वोटों के तो ये हैं ठग , देख रहा सारा जग ,
ऐसी करतूतों से गुलामी के आसार हैं ||
मोहन श्रीवास्तव ( कवि )
Tuesday, 17 July 2018
"तुमको निहारूं श्याम"
"आप सभी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभ कामनाएं"
तुमको निहारूं श्याम , दिन - रात सुबो शाम ,
तुमको निहारूं श्याम , दिन - रात सुबो शाम ,
जिंदगी तो तेरी ही कहानी अब लगती |
मूरतिया प्यारी तेरी , देखूं बस घड़ी घड़ी ,
तेरी हर बात ही , सुहानी अब लगती ||
गाल है गुलाबी तेरे , नैन हैं शराबी तेरे ,
मस्त रहूं मै तो , मस्तानी अब लगती |
दरशन की है आस , बुझती नहीं है प्यास ,
मीरा जैसी मै भी तो दिवानी अब लगती ||१ ||
कानो के कुंडल तेरे , कटि करधनी घेरे ,
सुंदर श्रृंगार कर जग को रिझा रहे ।
बांसुरी की छेड़ तान ,नेह भरी मुस्कान ,
नारी ब्रजवासिनी को बावरी बना रहे ।
ग्वाल बाल जन संग ,गोपी संग रास रंग ,
मेरे हरि लीला कर , सुख को लुटा रहे ।
सब के जीवन धन , रहे कर मनहरन ,
किसी को रूठा रहे तो किसी को मना रहे ।।२।
कानो के कुंडल तेरे , कटि करधनी घेरे ,
सुंदर श्रृंगार कर जग को रिझा रहे ।
बांसुरी की छेड़ तान ,नेह भरी मुस्कान ,
नारी ब्रजवासिनी को बावरी बना रहे ।
ग्वाल बाल जन संग ,गोपी संग रास रंग ,
मेरे हरि लीला कर , सुख को लुटा रहे ।
सब के जीवन धन , रहे कर मनहरन ,
किसी को रूठा रहे तो किसी को मना रहे ।।२।
मोहन श्रीवास्तव ( कवि )
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