Sunday, 26 March 2023

कोरोना ने कर दिया

कोरोना ने कर दिया, है सबको बेहाल।
घर घर मे हैं शेरनी, बाहर गले न दाल।।
बाहर गले न दाल,मारे पुलिस है डंडा।
जीना हुआ मुहाल,चले नहि कोई फंडा।।
दें शासन का साथ, जागरुक सब जन होना।
घर में रहना आप, अभी जब तक कोरोना।।

 मोहन श्रीवास्तव

"हमहूं बनब अंगरेजिन" (भोजपुरी)

"हमहूं बनब  अंगरेजिन" (भोजपुरी)

हमहूं बनब  अंगरेजिन, बलम अंग्रेजी सिखाइद......2

 जींस अउर टॉप बलम हम  पहिरब‌इ
 अंगरेजी कट में हम बाल बनव‌उब‌इ
बोली बोलब अंगरेजी
बलम अंग्रेजी सिखाइद......2

ऊंची एड़ी वाली सेंडल हम पहिरब‌इ
नथिया झुमका अउर मांग नहीं भरब‌इ
रूप धरब अंगरेजी
बलम अंग्रेजी सिखाइद......2

डिस्को अउर पाप म्युजिक सुनब‌इ
नये नये अंगरजी दोस्तन से मिलब‌इ
चाल चलब अंगरेजी
बलम अंग्रेजी सिखाइद......2

हाथ जोड़ अब हम नमस्ते न करब‌इ
हाय हेलो बोल बोल बात हम करब‌इ
बाय बाय टाटा अंगरेजी
बलम अंग्रेजी सिखाइद......2

कम्प्यूटर रोबोट से काम करव‌उब‌इ
सास ननदिया से हम नहि डरब‌इ
पूजा करब अंगरेजी
बलम अंग्रेजी सिखाइद......2

सब जानकारी इंटरनेट से लेब‌इ
आनलाईन से हम पढ़ाई करब‌इ
फैसन करब अंगरेजी
बलम अंग्रेजी सिखाइद......2

बेटा अउर बेटी मह नहिं जनमब‌इ
वैग्यानिक विधि से हम सब बनव‌उब‌इ
नाम धरब अंगरेजी
बलम अंग्रेजी सिखाइद......2
कवि मोहन श्रीवास्तव

Tuesday, 21 March 2023

"नववर्ष अपना चैत्र मास में ही मनाओ"


"नववर्ष अपना चैत्र मास में ही मनाओ"


परंपराओं रीति-रिवाजों को निभाओ।

संस्कार भारती को कभी भी न भुलाओ।।

परंपरा व रीति-रिवाजों को निभाओ.....


पश्चिम की सभ्यता का अब छोड़ अनुकरण।

पूरब की संस्कृति को दिल में है बसाओ।।

परंपराओं रीति-रिवाजों को निभाओ.....


परिवार साथ मंदिरों में जाइए सभी।

परोपकार करके दिल से हर्ष लुटाओ।।

परंपराओं रीति-रिवाजों को निभाओ.....


माथे पे रक्त चंदन मौली कलाई में।

गीता रामायण वेद  पढ़ो और पढ़ाओ।।

परंपराओं रीति-रिवाजों को निभाओ....


शास्त्र के भी साथ में ही शस्त्र जरूरी।

दुष्टों व देशद्रोहियों को और दूर भगाओ।।

परंपराओं रीति-रिवाजों को निभाओ.....


जात पात भूल के सनातनी हो एक।

केसरी ध्वजा को साथ मिलके उठाओ।।

परंपराओं रीति-रिवाजों को निभाओ.....


बच्चों को सनातन का संस्कार सिखाओ।

देश के भक्तों का इतिहास बताओ।।

परंपराओं रीति-रिवाजों को निभाओ.....


बेटे व बेटियों में ना कोई भेद हो।

शिक्षा के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम बढ़ाओ।।

परंपराओं रीति-रिवाजों को निभाना.....


हर तीज व त्योहार में सब कोई साथ हो।

नववर्ष अपना चैत्र मास में ही मनाओ।।

नववर्ष अपना चैत्र मास में ही मनाओ।।


परंपराओं रीति-रिवाजों को निभाओ।

संस्कार भारती को कभी भी न भुलाओ।।

परंपराओं रीति-रिवाजों को निभाओ.....

कवि मोहन श्रीवास्तव




वक्ता मंच सेवा रत्न सम्मान

वक्ता मंच सेवा रत्न सम्मान

Monday, 20 March 2023

छन्द : "पञ्चचामर"(श्री दुर्गा ताण्डव स्तोत्र)


छन्द : "पञ्चचामर"
(श्री दुर्गा ताण्डव स्तोत्र)

सवार सिंह चंडिका अतीव क्रुद्ध जो चले।
प्रचण्ड रूप देख पुष्ट दुष्ट धृष्ट हैं जले।।१।।

किरीट शीष नेत्र भाल पाँव साज पैजनी।
शरीर सौम्य गौरवर्ण क्रोध वेग बैगनी।।२।।

प्रसून लाल कंठहार,मध्य अंग मेखला।
सुदीप्त स्वर्ण कर्णफूल, रत्न से भरा गला।।३।।

पलाशरंग ओढ़नी, त्रिशूल हस्त अंबिका।
सुगंध है प्रवाहमान दिव्य देह चंडिका।।४।।

सरोज चक्र खड्ग हस्त, चाप बाण है लिए।
अराति यातुधान मार, मोक्ष धाम है दिए।।५।।

प्रघोर तीव्र बाण छोड़, दैत्य दुर्ग भेदती।
कराल काल मार बाण, शत्रु कान बेंधती।।६।।

त्रिशूल चाप शंख आदि, अस्त्र शस्त्र धारती।।
लिए गदा कटार ढाल, दुष्ट दैत्य मारती।।७।।

समूल दैत्यवंश नष्ट, ढूँढ ढूंँढ के करे,
अराति नाश हेतु मांँ अनेक रूप को धरे ।।८।।

घिरी सदा पिशाचनी, अघोर रौद्र रुप से ।
निशाचरों को मार मार, मंद मंद हैं हँसे।।९।।

दुरात्म रक्तबीज काट, रक्त पात्र में भरे।
कपालिनी समस्त रक्तपान रोष से करे।।१०।।

निशुंभ शुंभ चंड मुंड, आदि यातुधान को।
हते समस्त दैत्य खेल, खेल लेत प्राण को।।११।।

उमा सती शिवा अनेक, नाम एक रूप है।
महान भक्तवत्सला, करालिका स्वरूप है।।१२।।

मुनीन्द्र इन्द्र वा सुरारिवृंद प्रार्थना करें।
सुभक्त संत आदि की, सुसिद्ध याचना करे।१३।।

सुभक्त आर्तनाद से कृपामयी प्रसन्न हो।
मलीनता मिटे समस्त प्राण धन्य धन्य हो।।१४।।

कृपा कटाक्ष मोहना करो सदा प्रियंवदा।
प्रसिद्ध सिद्ध चंडिका रहो सहाय सर्वदा ।।१५।।

कवि मोहन श्रीवास्तव
20.03.2023
महुदा पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़











Friday, 17 March 2023

"श्री काली ताण्डव स्तोत्र" ,छन्द : पञ्चचामर (कवि मोहन श्रीवास्तव )


"श्री काली ताण्डव स्तोत्र"

छन्द : पञ्चचामर

महान रौद्र रूप धार ,क्रोधयुक्त कालिका,

करे निनाद जोर जोर, तीव्र वेग से चली।

करे प्रघोर अट्टहास, लेत सांस रोष से,

मशान भूमि  में निवास, हुई बड़ी उतावली।।1।।


लिए कटार खड्ग हाथ, लाhusल लाल नेत्र हैं ।

निकाल जीभ को विशाल,सर्व अस्त्र धारती।।

चली अपार शक्ति श्रोत, पापनाशिनी चली ।

सुकंठ धार मुण्डमाल, क्रोध से पुकारती ।।2।।


मुखारविन्द मुक्तकेश, क्रोध में सनी हुई ।

बलात् शत्रु शीष काट, उग्र रूप धारती ।।

प्रचंड खंड दुष्ट दण्ड, दाँत पीसती हुई ।

अराति सर्वनाश त्रास, क्लेश को निवारती ।। 3।।


त्रिशूल शंख चक्र हाथ, दुष्ट म्लेक्ष मारती,

किरीट सीस दिव्य धार , क्रोध से दहाड़ती,

लिए विशाल चाप बाण, हाथ में गदा लिए,

अनेक अस्त्र शस्त्र साज, रौद्र जीभ काढ़ती।।4।।


सवार मातु लाश यान, तीव्र वेग से चली,

प्रसून रक्त वर्ण हार, कंठ में मनोहरा।

बलात शत्रु काट सीस, से धरा है पाटती,

रक्तयुक्त ओष्ठ चाट , देख दुष्ट है डरा।।5।।


गिरीश पुत्रि शंभु कंत, नाथ की सुहागिनी,

सती उमा शिवा स्वरूप, भक्त पाप जारती।

शरीर वर्ण श्वेत श्याम, दिव्य नीलिमा लिए,

हँसीमुखी त्रिनेत्र भाल,संत क्लेष हारती।।6।।


स्वरूप दिव्य देख देख, यातुधान भागते,

सुजान संत भक्त लोग, पे कृपा विखेरती।

अपार है अगाध सिंधु, मातु की दयालुता,

भरोस जो करे सुभक्त, हर्ष वो उड़ेलती।।7।।


कभी भुला न मातु दास, ये अशीष चाहता,

करो न दूर पांव आप, द्वार पे पड़ा रहूं ।

कृपा करो सदैव देवि, सर्व लोक धारिणी,

पड़ूं न लोभ काम आदि, भक्ति में रमा रहूं।।8।।


कवि मोहन श्रीवास्तव



महुदा, झीट, पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़

17.03.2023


Thursday, 16 March 2023

"जय महाकाली स्तुति"छन्द : पञ्चचामर

"जय महाकाली  स्तुति"

छन्द : पञ्चचामर

लिए कटार खड्ग हाथ,  लाल लाल नेत्र हैं ।
निकाल जीभ को विशाल,सर्व अस्त्र धारती।।
चली अपार शक्ति श्रोत, पापनाशिनी चली ।
सुकंठ धार मुण्डमाल, क्रोध से पुकारती ।। 
मुखारविन्द मुक्तकेश, क्रोध में सनी हुई ।
बलात् शत्रु शीष काट, उग्र रूप धारती ।।
प्रचंड खंड दुष्ट दंड, दाँत पीसती हुई ।
अराति सर्वनाश त्रास, क्लेश को निवारती ।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

Tuesday, 14 March 2023

"मनुज सवैया" बेटी की विदाई

"मनुज सवैया"
सात सगण और भगण (२४ वर्ण)
IIS IIS IIS IIS, IIS IIS IIS SII 
पितु मातु सगा सब छोड़ चली, बिटिया मइके घर से रोकर।
बहना भुज में भरके लिपटी, भइया बस अश्रु बहे खोकर।।
बिलखाय रही मइया कहके, गुड़िया न लगे तुझको ठोकर।
पितु अश्रु निरंतर रोकत हैं, जिमि प्राण उड़े तन से ओकर।।१।।

सब सून हुआ घर आंगन है, चिड़िया पशु जीव सभी चाकर।
मुरुझाय रही बगिया दुख से, गुड़िया कर बोल नहीं पाकर।।
वृष धेनु नहीं चरते तृण हैं, नहि कांव करे कउआ आकर।
पथ गांव गली सब सून भई, बिटिया दुख देय गई जाकर।।२।।
कवि मोहन श्रीवास्तव
Mahuda jheet patan durg Chhattisgarh
14.03.2023


Sunday, 5 March 2023

महादेव की होली, मत्तगयंद सवैया। कवि मोहन श्रीवास्तव

खेल रहे शिव नाथ हिमालय, संग भुजंग सभी गण होली।
भांग धतूर हलाहल पीकर , शंभु निकाल रहे बहु बोली।।।।
खूब मनाय रहीं गिरिजा पर, बाउर आज भए त्रिपुरारी।
हासत रोवत गावत नाचत, भागि रहे चहु ओर दुआरी।।1।।
बाल गणेश उमा सह कार्तिक, तीनहु लोग मनाय रहे हैं।
शांत रहो हुड़दंग करो जनि, पाहुन वे मुसुकाय रहे हैं।।
मांगत  भांग धतूर सदाशिव, मातु उमा समुझाय रही हैं।
घूंघट में गुझिया भजिया पति , स्नेह समेत खिलाय रही हैं।।2।।
नाग करें फुफकार दनादन, प्रेत पिशाच महागण नाचें।
रंग अबीर उड़ाय रहे नभ, शंभु कथा मुख से निज बांचे।।
गंग हुई मनमुग्ध दशा लखि, प्राणपिया बउराय गए हैं।
मोद तरंग उड़ेल रही सिर, चंद्र प्रभा बिखराय रहे हैं ।।
कवि मोहन श्रीवास्तव

Saturday, 4 March 2023

"शिव होली उत्सव"(मत्तगयंद सवैया )



"शिव होली उत्सव"

(मत्तगयंद सवैया )


खेल रहे शिव नाथ हिमालय, संग भुजंग महा गण होली।

भांग धतूर हलाहल पीकर , शंभु निकाल रहे बहु बोली।।

खूब मनाय रहीं गिरिजा पर, बाउर आज भए त्रिपुरारी।

हासत रोवत गावत नाचत, भागि रहे चहु ओर दुआरी।।1।।

बाल गणेश उमा सह कार्तिक, तीनहु लोग मनाय रहे हैं।

शांत रहो हुड़दंग करो जनि, पाहुन वे मुसुकाय रहे हैं।।

मांगत भांग धतूर सदाशिव, मातु उमा समुझाय रही हैं।

घूंघट में गुझिया भजिया पति , स्नेह समेत खिलाय रही हैं।।2।।

नाग करें फुफकार दनादन, प्रेत पिशाच महागण नाचें।

रंग अबीर उड़ाय रहे नभ, शंभु कथा मुख से निज बांचे।।

गंग हुई मनमुग्ध दशा लखि, प्राणपिया बउराय गए हैं।

मोद तरंग उड़ेल रही सिर, चंद्र प्रभा बिखराय रहे हैं ।।

कवि मोहन श्रीवास्तव

ufra jheet patan durg Chhattisgarh

1.3.2023



Thursday, 2 March 2023

"लक्ष्मी अष्टपदी"

१११ १११ ११ २११, ११ २११२ 
१११ १११ ११ २१, ११११ २१ १२ 
अन धन जन सुखदायिनि, वरदायिनि हे।
शतदल पुहुप विराज, जय जय विष्णु प्रिये।।1।।


सुर नर मुनि जन गावत, नित ध्यावत हे।
भगतन नित सुख देत,जय जय विष्णु प्रिये।।2।।


बनत चुगद तव वाहन, सब लोक फिरे।
करत अधम धन नाश,जय जय विष्णु प्रिये।।3।।


हरि चरणन नित सेवत, सुख लेवत हैं।
करत जगत उपकार,जय जय विष्णु प्रिये।।4।।


गणपति तव सुत दत्तक, भव रक्षक हैं।
प्रथम करत जन ध्यान,जय जय विष्णु प्रिये।।5।।


सकल कलह दुःख भागत, धन आवत हे।
निशि दिन कर गुणगान,जय जय विष्णु प्रिये।।6।।


हरि प्रिय सहज उदारिन, जग धारिनि हे।
कर धर निज तलवार,जय जय विष्णु प्रिये।।7।।


अरज करत यह मोहन , धन वैभव दे।
कर नहि सकत बखान,जय जय विष्णु प्रिये।।8।।


कवि मोहन श्रीवास्तव



12.30 बजे
उफरा झीट पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़ 

Saturday, 25 February 2023

होगी जब उनसे मुलाकात मेरी

होगी जब उनसे मुलाकात मेरी, दो दिल खुशियों से यूं भर जाएंगे।

उनके स्वागत में फूल कलियां क्या, अपने पलकों को हम बिछाएंगे।। 

होगी जब उनसे........

अब तक जो गम सहे जुदाई के, उन्हें हम दोनों भूल जाएंगे।

होंगी बातें सभी इशारों में, वो पल कैसे भी ठहर जाएंगे।।

होगी जब उनसे............

चूड़ियां खनखनाएंगी मेरी, कंगन मेरे तो गुनगुनाएंगे।

धड़कनें बाँसुरी सी गायेंगी, दो वदन प्यार में नहाएंगे।।

होगी जब उनसे..........

माथे पे बूंदे कुछ पसीने की, चाँदनी जैसे झिलमिलाएंगे।

मेरे बिखरे हुए से लट होंगे, हर अदा से उन्हें रिझाएंगे।।

होगी जब उनसे........

पायल पावों में छनछनायेंगी, झुमके मेरे तो खिल खिलाएंगे।

सांसे दोनों की बस ये बोलेंगी, हम कभी दूर नहीं जाएंगे।।

होगी जब उनसे........

रातें होंगी मेरी दीवाली सी,दिन तो होली का हम मनाएंगे।

भोर होते ही फूलों की खुशबू, शाम दीपों से जगमगाएंगे।।

 होगी जब उनसे मुलाकात मेरी.........


कवि मोहन श्रीवास्तव

Friday, 24 February 2023

हमे गर्व बहुत उन पर,वे पिता हमारे हैं"

"हमे गर्व बहुत  उन पर,वे पिता हमारे हैं"


हम सबके प्यारे हैं, इस जहां से न्यारे हैं ।

हमें गर्व बहुत उन पर,वे पिता हमारे हैं ॥



जब गर्भ में मैं आया,माँ तो खुश थी मेरी ।

पर पिता के दिल को तो, खुशियों ने घेरी॥


उन्हें खुशी मिली भारी, जब जनम हुआ मेरा।

जब रोता था मैं कभी, उन्हें दर्द ने तब घेरा।।


जब पापा हमनें बोला,तो पिता बहुत थे प्रसन्न।

माँ से कहते तब वो,मैं आज हो गया धन्य ॥


जब मैं नन्हा सा था,वे मुझे कंधे पे बिठाते थे।

थपकी देके मुझको, सीने पे सुलाते थे ॥


जब बड़ा हुआ मैं तो, मुझे विद्द्यालय  भेजा ।

शिक्षक से कहा उनने,इसे अच्छी शिक्षा देना ॥


हम सबके लिए कपड़े,, वे नए दिलाते थे ।

रिश्ते नातों का,निज फर्ज निभाते थे ॥


हम सब अच्छा पढ़ लें,सब काम किया करते ।

हमें सुख मे रखकर के, वे दुःख को सहा करते ॥


हो घर-परिवार सुखी,बस चाह सदा उनकी ।

मैं कितना भी दुःख झेलूं,पर हो परिवार सुखी ॥


पढ़ लिख कर योग्य बना, मेरा व्याह रचाए थे।

इक नई-नवेली दुल्हन,मेरे लिये तो लाये थे ॥


पर पापा कांप गए,बेटी की बिदाई में ।

जो हर पल ध्यान रखती, पापा की दवाई में।।


हर बाप का ये सपना,मेरा बेटा सहारा बने ।

दो गज के कफन से वो,मेरे शव को तो ढक दे ॥


मेरी अर्थी उठा करके,मुझे कंधा तो दे-दे ।

मेरे अन्त क्रिया को वो,अच्छे से तो कर दे ॥


मैं बिदा हो रहा हूं, निज फर्ज निभाया है ।

तुम सब खुश रहना,अब बाप पराया है ॥


अपनी माँ का ख्याल रखना,मेरी प्राणों से प्यारी का ।

दुःख-सुख जो साथ सहे,मेरी दिल की दुलारी का ॥


वे हम सबके प्यारे हैं,वे इस जहां से न्यारे हैं ।

हमें गर्व बहुत उन पर,वे पिता हमारे हैं ॥


मोहन श्रीवास्तव 


16-03-2013,02:00AM,Sunday,(862)



Wednesday, 22 February 2023

"शिव स्तुति""अश्वधाटी छंद"


"शिव स्तुति"

"अश्वधाटी छंद"

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आए त्रिलोचन रमाए भभूत तन भाए ललाट शशि हो।

खाए धतूर हर पिए हलाहल बनाए श्मशान घर हो।।

ध्याए सियापति बढ़ाए जटा सिख लुभाए सुजान मन हो।

खेएँ तरी शिव मिटाए सभी दुःख दिलाएं महान सुख हो।।


धारे त्रिशूल मतवारे भुजंग जयकारे करें सब जने। 

जारे अनंग रखवारे चराचर अधारे व्यथा सब हने।।

न्यारे वही जग अधारे सदाशिव पुकारे उद्धार करने।

प्यारे गिरीश जग तारे तुम्ही व  पधारे बियाधि हरने।।2।।


धारी किरीट शशि वारी उमा उजियारी महान छवि हो।

भारी महेश सुखकारी सुजान दुखहारी महान कवि हो।।

तारी भुलोक मदनारी लजात करतारी महान रवि हो।

हारी उमा हिय पियारि लगे शिव पुरारी महान हवि हो।।3।।

जारी सती तन पियारी महेश सुकुमारी पिता हवन में।

प्यारी उमा गिरि कुमारी गणेश महतारी बसे भवन में।।

धारी कपर्दक उदारी सुरेश अवतारी फिरे भुवन में।

घोरी विलक्षण सवारी बना वृष  पुरारी रहें अवन में।।4।।


दानी शिरोमणि शिवानी सुजान पति बानी कहे रसभरी।

ध्यानी गिरीश वरदानी जटाधर दिवानी लगे गिरि परी।।

ज्ञानी महाप्रभु सयानी उमा सह मशानी रटे नित हरी।

भीनी सुगंध हर धानी उमा पट कहानी सती शिव खरी।।5।।

कवि मोहन श्रीवास्तव 

रचना क्रमांक:- 1308

Rewised 20.02.2023

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Sunday, 19 February 2023

"ऋतुओं का राजा बहकने लगा है"

"ऋतुओं का राजा बहकने लगा है" 
झुकी आम डाली लगी बौर वाली, 
महुआ का आँगन महकने लगा है ।
चहूँ ओर भरने फूलों से दामन,
ऋतुओं का राजा बहकने लगा है ।। 

कोयल कुहुक कर पपिहे से बोली,
मयूरा का तन मन चहकने लगा है ।
मदमस्त सरसों पिली लजीली,
गुलाबों पे भँवरा भटकने लगा है ।। 

धानी चुँदरिया धरती ने ओढ़ी,
गगन मुसकुरा आज तकने लगा है ।
भँवरों की टोली रिझाने गुलों को,
मिलन गीत गाकर उचकने लगा है ।। 

फगुनाया मौसम महकी बयारें,
तन के अगन मन दहकने लगा है ।
जिन्हें प्यार वाली छुअन मिल न पाई,
मन आज उनका कसकने लगा है ।। 

गदराई टेसू पलासों की डाली,
पिया रस बसंती के चखने लगा है ।
भजन छोड़कर अब मिलन गीत गाते ,
कवि मन हमारा धधकने लगा है ।। 

खुशबू लुटाती पवन बह रही है,
चेहरा सभी का दमकने लगा है ।
बहारों की रौनक जिधर देखो मोहन,
मुहब्बत में जर्रा चमकने लगा है ।। 

झुकी आम डाली लगी बौर वाली.... 

मोहन श्रीवास्तव

"कुंडलिया"ऐसे ग्रंथों को पढें

"कुंडलिया"

ऐसे ग्रंथों को पढें, जो सिखलाते प्यार।
जिसमें हिंसा द्वेष हो,वो सब हैं बेकार।।
वो सब हैं बेकार, बनाते जो उन्मादी।
होता बंठाधार,विवादी और प्रमादी।।
जिससे फैले द्वंद, पढ़ें हम उनको कैसे।
उनपे हो प्रतिबंध, जहर जो बोए ऐसे।।

कवि मोहन श्रीवास्तव

Thursday, 16 February 2023

यमुनाष्टकम" हिंदी भावानुवाद आदिगुरु शंकराचार्य जी द्वारा रचित छंद - पञ्चचामर

"यमुनाष्टकम" हिंदी भावानुवाद 

आदिगुरु शंकराचार्य जी द्वारा रचित

छंद - पञ्चचामर

लिए सदैव कृष्णचंद्र गात अंगनीलिमा,

त्रिलोक शोक हारिणी जलौघ रम्यधारिणी।

तृणादि के समान स्वर्गलोक तुच्छ जानके,

निकुंजपुंज गूँज गूँज पार गर्वहारिणी।।

खिले शरीरकंज दृष्टिपात स्नान जो करे।

मनोविकार दास के कलिंदनंदिनी हरे।।१।। 


मलापहारि नीर के समूह से सुशोभती,

महानपापनाशिनी सदैव मुक्तिदायिनी।।

सुरम्य नंदलाल अंगस्पर्श युक्तराग से,

नवीन प्रेमयुक्त भक्तमंडली हितायनी।।

खिले शरीरकंज दृष्टिपात स्नान जो करे।

मनोविकार दास के कलिंदनंदिनी हरे।।२।। 


सुहावनी तरंग संग अंग के हिलोर से,

समस्त पाप जीव के पखारती विहारिणी।

नवीन माधुरी सुभक्त चातकादिवृंद को,

कगार पास भक्तरूप हंसवंश तारिणी।।३।। 


सभी सदैव पूजते कगार पास जो रहे,

सुभक्त पूर्णकाम में अमोघसिद्धियाँ भरे।

खिले शरीरकंज दृष्टिपात स्नान जो करे।

मनोविकार दास के कलिंदनंदिनी हरे।।४।। 


विहाररास वेदना थकान हेतु तीर पे,

समीर मंद मंद गंध संग में प्रवाहिणी।

गुणादिगान शब्द से न रम्यनीर हो सके,

प्रवाह संग जो करे सदा धरा सुपावनी।।

खिले शरीरकंज दृष्टिपात स्नान जो करे।

मनोविकार दास के कलिंदनंदिनी हरे।।५।। 


तरंग संग बालुकामयी लगे कगार से,

सदैव मध्यभाग कृष्णचंद्र रंग शोभती।

समान शीतकाल चंद्ररश्मि दिव्यमंजरी,

समस्त विश्व तुष्ट चारुवारि जीव लोभती।।

खिले शरीरकंज दृष्टिपात स्नान जो करे।

मनोविकार दास के कलिंदनंदिनी हरे।।६।। 


करे सुरम्य राधिका किलोल अंगराग से,

दयानिधान कृष्ण अंगस्पर्श वारि भीतरी।

अलभ्य अन्य के लिए जिसे सदैव भोगती,

सदा प्रवाह मात्र धूम सप्तसिंधु सुन्दरी।।

खिले शरीरकंज दृष्टिपात स्नान जो करे।

मनोविकार दास के कलिंदनंदिनी हरे।।७।। 


गिरे दयानिधान अंगराग वारि में घुले,

प्रभा बढ़े स्वकीय अंगस्नान जो करें सखी।

गुँथी लटें सुरम्य चंचलीषु राधिका प्रिये,

सदैव चंपकादि हार सा लगे गला सुखी।।८।। 


सदैव स्नान नित्य कृष्णदास नारदादि भी,

करे दयालु भानुजा कृपासुपात्र पे करे।

खिले शरीरकंज दृष्टिपात स्नान जो करे।

मनोविकार दास के कलिंदनंदिनी हरे।।९।। 


खिले लता अधीश्वरी कगार पे सुहावनी,

सुरम्य रम्यवाटिका सदैव कृष्ण खेल से।

कदम्बपुष्प के पराग से सफेद हो रही,

उबार विश्व सिन्धु हो मनुष्य स्नान मेल से।।१०।। 

खिले शरीरकंज दृष्टिपात स्नान जो करे।

मनोविकार दास के कलिंदनंदिनी हरे।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव


सेमरी पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़

06.02.2023

12.10 दोपहर

Wednesday, 15 February 2023

राष्ट्र जागृति लहर


राष्ट्र जागृति लहर, आई अब घर-घर

हर हिंदू खड़ा हुआ लेकर मशाल है।

झूठे इतिहास पर, मुगलों के त्रास पर

निडर होके आज वो करता सवाल है।।

बोल बम हर हर, राम जी की जय कर

देश के विरोधियों को करता बेहाल है।

सेकुलर थरथर, कांप रहे देखकर

खून में सनातनी के जब से उबाल है।।

कवि मोहन श्रीवास्तव