Tuesday, 6 July 2021

("स्त्रग्धरा छंद" "वर्णिक")"शिव स्तुति""आई बारात द्वारे" हर हर महादेव

("स्त्रग्धरा छंद" "वर्णिक")
"शिव स्तुति"
"आई बारात द्वारे" हर हर महादेव

आई बारात द्वारे, हिम भवन यहाँ, लोग आमोद पायें।
कैलाशी हैं पधारे,डम डम डमरु, साथ में ले बजायें।।
नंदी पे है सवारी, जगतपति महा, शीस मौरा सजाये।
माथे पे चंद्र गंगा, हर हर करती, ध्वनि भारी सुहाये।।1।। 

बोली बोले अनोखे,  हर गण भुतहा, घोर लीला डरायें।
कोई नैना बिना है, मुख श्रवन नहीं, देख सारे परायें।।
ठाढ़े हैं देख बूढ़े, मन मन हंँसते, धीर धारो बतायें।
भोले के ये बराती, भवन मत भगो, व्याहने गौरि आये।।2।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

(उपेंद्रवज्रा छंद,वर्णिक)

(उपेंद्रवज्रा छंद,वर्णिक)

"काली स्तुति"
"महाकराली विकराल काली" 

महाकराली विकराल काली,कटार लेके लड़ने चली है।
निकाल जिव्हा गल मुंडमाला, निशाचरों को हनने चली है।। 

किये सवारी शवयान देखो, किरीटधारी धनु को चलाती।
गदा धरे है कर में भवानी, मलीन पापी दल को जलाती।। 

उदारदानी जय माँ भवानी, हरो सभी के दुःख दर्द सारे।
सिवा तुम्हारे जग में न कोई, रहें सदा ही मइया सहारे।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

वागीश्वरी सम्मान

देश की प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था वक्तामंच मानवता की सेवा और सम्मान के लिए प्रतिबद्ध संस्था है, जिसके द्वारा समाज के विविध विधाओं के सृजनकारों को सम्मानित करने की एक नैष्ठिक परम्परा चलायी जा रही हैं प्रतिभाओं का सम्मान किसी बढ़ते वृक्ष को खाद पानी देने और सेवा करने जैसा परम पावन कृत्य है । समाज में मनुष्यता और शुभता को प्रकाशित करने के लिए वक्तामंच का योगदान अतुलनीय है। वक्तामंच  के सभी समर्पित सेनानियों का शत् शत् वंदन हार्दिक अभिनंदन एवं "वागीश्वरी सम्मान" देने के लिए वक्ता मंच का बहुत बहुत आभार..

(महाभुजंग प्रयात सवैया,वर्णिक)"सती वियोग मे भगवान महादेव जी की दशा का वर्णन""भवानी बिना आज कैलाश सूना"

(महाभुजंग प्रयात सवैया,वर्णिक)
"सती वियोग मे भगवान महादेव जी की दशा का वर्णन"
"भवानी बिना आज कैलाश सूना" 
भवानी बिना आज कैलाश सूना,सती नाम लेके महादेव रोते।
करें याद सारी पुरानी कहानी,जली है सती सोच नैना भिगोते।।
हिया में सदा वो समाई हुई है, प्रिया सोच में नाथ आनंद खोते।
न जागें न सोयें न पीयें न खायें, गणों संग रोते मृगा मोर तोते।।1।। 

जटा जूट का भी नहीं ध्यान कोई, पुरारी लगें ज्यों गवायें हुए हैं।
जहाँ शंभु जाते सती साथ होती, व्यथा भाव यादें सवाये हुए हैं।।
हमेशा सताती उन्हें याद प्यारी, महाशोक कैलाश छाये हुए हैं।
बिना प्राणप्यारी वृथा जिंदगानी, यही सोच बाबा, झंँवाये हुए हैं।।2।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

ई मंच फाउंडेशन की ओर से आयोजित आनलाइन कवि सम्मेलन मे कवरेज करने के लिए दैनिक भास्कर समूह का बहुत बहुत आभार। इस कवि सम्मेलन में मै व मेरी श्रीमती शोभामोहन श्रीवास्तव के साथ कवि श्री सुनिल पांडेय, श्री राकेश अग्रवाल और रोशन अग्रवाल जी ने भाग लिया।https://fb.watch/63gr45vKNQ/

(मंदारमाला छंद,वर्णिक)'जीवन झूठा मृत्यु सत्य है'

(मंदारमाला छंद,वर्णिक)
'जीवन झूठा मृत्यु सत्य है'

"आया बुलावा पिया के यहां से" 

आया बुलावा पिया के यहां से, सभी छोड़ देखो चली जा रही।
डोली सजाई गई बांस की है, सभी रो रहे आप मुस्का रही।।
लपेटी हुई लाल साड़ी लजीली, सितारा जड़ी वो पिया भा रही।
पीछे उदासी भरे लोग जाते, सजी खूब डोली दुखी ढा रही।।1।। 

माता पिता और रोये सहेली, सभी प्रीत वाले, दुःखी याद में।
संसार वाला पिया रो रहा है, छुपाते हुए अश्रु को बाद में।।
सूने पड़े गांव के गैल सारे, सभी व्यस्त तेरे ही संवाद में।।
यादें पुरानी तुम्हें चाहते जो, पुकारा करें वे सभी नाद में।।2।। 

डोली रूकाई गई घाट पे है, चिता काठ पे है लिटाई गई।
दावाग्नि प्यारे सगा ने लगाये, लिए प्यार सच्चे पिया की भई।।
हाड़ा जले काठ की आग जैसे, जले चामड़ी घास जैसे जई।
प्यारी दुलारी पिया से मिली है, भुला नेह नाते पुराने कई।।3।। 

मोहन श्रीवास्तव

गंगोदक सवैया(राधा रानी का कृष्ण वियोग)

(गंगोदक सवैया, वर्णिक छंद)
(राधारानी का कृष्ण वियोग)

"रो रही राधिका" 

रो रही राधिका श्याम की याद में, और कोई उसे है सुहाता नहीं।
है बनी बाँवरी चैन खो के लली, हास उल्लास आनंद भाता नहीं।।
अर्कजा तीर बैठी हुई सोचती, क्यों पिया पत्र संदेश आता नहीं।
प्रात से साँझ होती प्रतीक्षा घनी, आ रहे श्याम कोई बताता नहीं।।1।। 

होश खोये हुए नैन खोजे पिया, केश फैले घने नैन आँसू भरे।
भूख लागे नहीं प्यास जागे नहीं, जेठ से ताप में प्रेयसी यूँ जरे।।
नींद आती नहीं याद जाती नहीं, भोर होते नदी तीर जाया करे।
वेदना अंग में है समाई हुई, श्याम संदेश दे कौन पीड़ा हरे।।2।। 

गीत प्यारे सुहाने सुनी जो कभी, बाँसुरी श्याम की याद आती रही।, 
हाथ में हाथ लेके चली साथ जो, प्रेम सारा पिया पे लुटाती रही।।
बोलती ठोलती हैं सखी आज तो, नैन नीचे किये वो लजाती रही।
मौन साधे हुए बैन से नैन से, नित्य आँसू बहा के बुलाती रही।।3।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

पर्यावरण मित्र सम्मान

आदरणीय राजेश पराते जी के कुशल नेतृत्व एवं कर्मठ सहयोगी आदरणीय शुभम साहू जी व वक्ता मंच के सभी पदाधिकारियों को नमन । जो मानवता की सेवा के लिए सदा समर्पित हैं। हमारे समाज को आज ऐसे ही मार्गदर्शी संस्थाओं की आवश्यकता है ।जो समाज को मानव कल्याण के लिए प्रेरित कर सके ।

वक्ता मंच अपने महान कर्मों के माध्यम से समाज मे सकारात्मक परिवर्तन सेवा व सम्मान करके अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर रही है ।ऐसे महान उद्देश्य वाली निःस्वार्थ सेवा भावी संस्था के सानिध्य मे हम स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
 पौध रोपण के हमारे लघु प्रयास को "पर्यावरण मित्र सम्मान"  से पुरष्कृत कर बल देने के लिए   वक्तामंच आपका हार्दिक आभार।

🌹🌹🙏🙏🙏🌹
मोहन श्रीवास्तव

मंदारमाला छंद वर्णिक

(मंदार माला छंद "वर्णिक") 

"ध्याऊँ भजूँ राम के नाम को मैं" 

ध्याऊँ भजूँ राम के नाम को  मै, हिया और कोई नहीं नाम है ।
गाऊँ बना गीत मैं राम जी के, नहीं गीत कोई बिना राम है।
छाये सभी में समाये सभी में, बिना राम के ना कोई धाम है।
सौदा हमारा सभी है अधूरा, बिना राम कोई नहीं दाम है।।1।। 

आकाश पाताल पृथ्वी सभी में, दिखे जो जहाँ भी नजारे वही ।
शीतांशु आदित्य नक्षत्र तारे, बनाते वही हैं उझारे वही ।।
ब्रह्मा महादेव लक्ष्मीविलासी, सभी जीव के तो सहारे वही।
ब्रह्मांड के ये सभी काज भक्तो, बिगाड़े वही हैं सवाँरे वही ।।2।। 

माता पिता पुत्र भाई सगे हैं, सखा कंत प्यारे सभी नाथ है।
ऐसा नहीं ठाँव कोई कहीं भी, जहाँ आप स्वामी नहीं साथ हैं।।
है जीव सारे खिलौने तुम्हारे, झुकाये सभी ने तुम्हें माथ हैं।
गाना गवाना जगाना सुलाना, हँसाना रुलाना प्रभो हाथ हैं।।3।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्यमंडल की 24सवीं काव्य गोष्ठी

विगत रविवार को आचार्य इंजीनियर श्री अमरनाथ त्यागी जी और श्री सुनील पांडेय जी के कुशल मंच संचालन में छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्यमंडल द्वारा आयोजित आन लाइन विशेष काव्यगोष्ठी का ऐतिहासिक आयोजन किया गया।जिसकी विशेषता यह रही कि यह छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य मंडल की 24सौंवी काव्यगोष्ठी थी। जिसमें मेरी श्रीमती  शोभामोहन श्रीवास्तव जी के साथ मुझे भी भाग लेने का अवसर मिला।

Saturday, 1 May 2021

स्त्रग्धरा छंद" "वर्णिक" "शिव स्तुति"


("स्त्रग्धरा छंद" "वर्णिक)
"शिव स्तुति"
"आई बारात द्वारे" 

आई बारात द्वारे, हिम भवन यहाँ, लोग आमोद पायें।
कैलाशी हैं पधारे,डम डम डमरु, साथ में ले बजायें।।
नंदी पे है सवारी, जगतपति महा, शीस मौरा सजाये।
माथे पे चंद्र गंगा, हर हर करती, ध्वनि भारी सुहाये।।1।। 

बोली बोले अनोखे,  हर गण भुतहा, घोर लीला डरायें।
कोई नैना बिना है, मुख श्रवन नहीं, देख सारे परायें।।
ठाढ़े हैं देख बूढ़े, मन मन में हंँसते, धीर धारो बतायें।
भोले के ये बराती, भवन मत भगो, व्याहने गौरि आये।।2।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव












Thursday, 7 March 2019

‘’पाती सैनिक का पत्नी के नाम’’


( चौपाई छंद )

प्राण पिआरी दिल की रानी  | सदा सुहागिन होउ सयानी   ||
आज तेरी चिट्ठी क्या आई   |  याद मुझे सबकी है सताई  ||
वन्दवुं प्रथम बाबा अरु दादी | सीस झुकाऊँ मातु पिता जी  ||
कैसे हैं सब चाचा चाची     | बडकी मैया बड़े पिता जी   ||
गुडिया जैसी कैसी बहना    | आशिर्वाद उसे भी कहना    ||
भैया भाभी चरण मनाऊँ    | सिया राम जैसे गुण गाऊँ   ||
अनुज कहो कैसा है मेरा    | इहां उहां करता क्या फेरा    ||
करे पढाई मन से कहना    | पढ लिख कर फौजी है बनना ||
चन्ठ भतीजा और भतीजी   | कैसी है हम सबकी जीजी    ||
प्यारा बेटा प्यारी बेटी      | कैसे गांव गली अरु खेती     ||
बड़े दिनों में पाती पाया    | पढते पढते आंसू आया       ||
मै लिखता सनेह से पाती   | भरि आई लिखते मम छाती  ||
पिछली छुट्टी में घर आया  | खुशियाँ था भरपूर मनाया    ||
माँ के हाथों का वो खाना  | आंचल से मुझको दुलराना    ||
आती मुझको याद तिहारी  | भूल न पाऊँ तुमको प्यारी    ||
हर पल रखती ध्यान हमारा | अपना सब कुछ मुझ पर वारा ||
बात बात में वो इतराना    | मंद मंद तेरा मुसुकाना      ||
छाई थी तुमपे हरियाली    | होठों पे सजती थी लाली     ||
करती थी तुम नैन इशारे   | इक दूजे को सदा निहारे    ||
जाने का दिन जब था आया | आँखों ने आंसू छलकाया    ||
रो रो मेरी करी विदाई      | वारि बिना जिमि नदी सुहाई ||
वच्चों का रोना बिलखाना   | बापू जल्दी वापस आना     ||
गले लगाके मैया रोई      | बापू की आँखें थी खोई      ||
यूनिट में था जब मै आया  | सबने मिलकर गले लगाया   ||
मिलकर सबने बैग थे खोले  | भाभी ने क्या भेजा बोले    ||
जो भी था सब मिलके खाए  | आपस में सब खूब हँसाए   ||
और सुनाओ प्राण पिआरी    | लगे मोहिनी मोपर डारी    ||
जो जो मन्नत बचा तिहारा   | अबकी पूरा करना सारा    ||
छोटू का मुंडन है करना      | मन्नत का धागा है बधना  ||
सीमा पे अभी युद्ध की हलचल | रक्षा में रहते हम प्रतिपल  ||
सारा भारत परिवार हमारा    | मातृभूमि पे जीवन वारा    ||
छुट्टी मिलते ही आऊँगा      | सबकी खुशियाँ लौटाऊंगा    ||
छोटू का भी टैंक खिलौना    | बिटिया के गुडिया का गहना ||
और सभी का लीस्ट बनाया  | तेरे झुमके को बनवाया     ||
पत्र नही दिल इसको मानो  | बाँहों में मुझको हूँ जानो    ||
कभी नही रोना तुम प्यारी  | हर पल है आशिष हमारी    ||
पाती पढते पढते हलचल   | बाहर झांकी ठहर गया पल   ||
सैनिक गाड़ी द्वारे आई    | सहम गई कुछ बोल न पाई  ||
देखा इक शव उसमे आया  | जो है तिरंगे में लिपटाया    ||
भीड़ बड़ी द्वारे है मोहन     | रुक गइ जैसे सबकी धड़कन ||
पति पहिचानि के पिटहि छाती | पर धीरज मन में है लाती  ||
अजर अमर  हो पिया हमारे   | जोर जोर जय हिंद पुकारे  ||
अजर अमर  हो पिया हमारे   | जोर जोर जय हिंद पुकारे  ||

कवि मोहन श्रीवास्तव

30/03/2019
रचना क्रमांक :- ( 1173 )

           



Thursday, 22 November 2018

''संसार के आधार हैं वो '' हरिगीतिका छंद ( SSIS SSIS S SIS SSI S )


"संसार के आधार  हैं वो"
 हरिगीतिका छंद ( SSIS SSIS S  SIS SSI S )


संसार के आधार  हैं वो , ज्ञान के भंडार हैं | 
आकाश में पाताल  में , वो शांत पारावार हैं || 
ब्रह्माण्ड में हैं व्याप्त  सारे ,वेद के वो सार हैं  | 
औतार लेके तारते हैं , मोक्ष के ही द्वार हैं || 

सारे  जहाँ में वो समाये , बात ये भी मानिये | 
पाते सुखों को ध्या रहे जो , वो सभी में जानिये || . 
जो जान के अंजान होते , नाम लेते हैं नहीं | 
वो क्लेष पाते हैं सदा ही ,बात ये मानो सही || 

ब्रह्मा विष्णू वो ही त्रिधामा , देवता ये एक हैं | 
जो भी करे हैं ध्यान पूजा , ईश सारे एक हैं || 
लेते उन्हीं का नाम सारे , जान या अंजान में | 
पाते कृपा हैं नाथ के वो , हों किसी भी स्थान में || 

प्यारे दुलारे जीव सारे ,नाथ को जो मानते | 
माता पिता के रूप जैसे ,बालकों को पालते || 
जो छोड़ के सारा जमाना  , आपको ही ध्यानते | 
इच्छा सभी की पूर्ण होती  , आप ही  हैं साधते || 



कवि मोहन श्रीवास्तव 
रचना क्रमांक ;- ( 1126 )
23 . 11 . 2018 


Monday, 19 November 2018

"राम जी का नाम लेके"गीतिका छंद ( SISS SISS SISS SIS )


"राम जी का नाम लेके"
गीतिका छंद ( SISS  SISS   SISS SIS )


राम जी का नाम लेके , काम सारे कीजिये | 
जागते सोते सदा ही , नाम प्यारे लीजिये || 
राम ही  प्यारे सभी को ,राम ही हैं  तारते  | 
राम ही हैं प्राण देते ,    राम ही संहारते     || 

राम छंदातीत हैं तो ,    राम प्यारे मीत हैं  |  
राम कालातीत हैं तो ,    राम मेरे  गीत हैं || 
राम ही सारा जहाँ हैं ,  राम ही ब्रह्माण्ड हैं | 
राम ही दाता विधाता ,    वो सवेरे चाँद हैं || 

राम जी का काम ही है ,प्राणियों को तारना | 
हार के भी जीत देते ,   ये सदा ही मानना  || 
हो धनी या हो भिखारी  , रंक राजा और हो | 
राम की पाते कृपा ही  ,  या कसाई चोर हो || 

राम को जो जान लेते ,    दास हैं वो राम के  | 
काटते बाधा सभी के  ,    आसरे जो राम के  || 
राम जी संसार के हैं ,      बाप सारे जानिये   | 
ध्यान सेवा राम का हो , राम को ही मानिये ||

राम जी का नाम लेके , काम सारे कीजिये | 
जागते सोते सदा ही , नाम प्यारे लीजिये || 


कवि  मोहन श्रीवास्तव 
रचना क्रमांक :- (११२५ ) 


Wednesday, 14 November 2018

''हे वीर तुम रणधीर हो'' ( मधुमालती छंद )

"हे वीर तुम रणधीर हो"
( मधुमालती छंद )

हे वीर तुम रणधीर हो | 
चलते रहो  रणवीर हो || 
माँ भारती के हीर हो  | 
रिपु के लिये यमतीर हो || 

भुज बंध पर अभिमान हो | 
बस जीत ही अरमान हो || 
हित देश बस यह प्राण हो || 
निज वतन पर बलिदान हो || 

जयचंद दल पहचान हो | 
उनकी जगह शमसान हो || 
बलवंत तुम गुणवान हो  | 
अरि वक्ष लहू लोहान हो || 

माँ भारती के लाल हो | 
तुम दुश्मनों के काल हो || 
हम सभी के तुम ढाल हो | 
रण में सदा बेताल हो || 

अरि लहू की नित प्यास हो | 
श्री विजय की बस आस हो || 
धैर्य सदा तव पास हो | 
माँ भारती के दास हो || 

जय हिन्द की ललकार हो | 
सदा वैरियों पे प्रहार हो || 
निज हाथ में औजार हो | 
दिन रात ही जयकार हो || 
हे वीर तुम रणधीर हो | 
चलते रहो  रणवीर हो || 
माँ भारती के हीर हो  | 
रिपु के लिये यमतीर हो || 


कवि  मोहन श्रीवास्तव 

रचना क्रमांक :- ( 1124 )

Wednesday, 31 October 2018

"आज पुकार रहे हम केशव"


मत्तगयंद छंद ( SII SII SII SII SII SII SII SS )

"आज पुकार रहे हम केशव"

आज पुकार रहे हम केशव , जाय छुपे कह हो  सुख      धामा | 
काज सवांरहु हे मनमोहन , आज पड़ा तुमसे बड़ कामा        || 
जाय रही अब लाज महाजन , आकर लाज रखो अभिरामा    | 
दीनदुखी हम स्वामि सखा तुम , नाथ तुम्ही मम पूरणकामा  || 1 || 

जाय छुड़ाय दियो गजराज कु , ग्राह्य धरा पद था  सुरधामा  | 
तारि दियो तुम गौतम नारि कु , पाहन थी पहुची पति धामा || 
चीर बढ़ाय दियो द्रुपदी  कर , लाज बची तबहीं गुणधामा      || 
मान कियो धन दानहु देकर , दीन दुखी फटहाल सुदामा || 2 || 

तारि दियो जिमि गीध अजामिल , नृसिंह रूप लिए अवतारा  | 
प्राण बचाय दियो प्रह्लाद कु , जाय उहां हिरण्याकश्यपु मारा || 
काज कियो नरसी कर माधव , भात  भराय दियो सुख सारा   || 
बालक ध्रुव करा तप साधन , लोक दियो खुश हो ध्रुव तारा   ||  3 || 

आनि पिलाय दयो बिष राजन , नाथ मिरा कर प्राण बचायो   |
बेर जुठे शबरी घर खाकर , दीनन को तुम मान   बढ़ायो       || 
गाय सके नहि वेद पुरानन , नाथ कृपा   जितनी       बरसायो | 
काज सवारहु श्याम पिया मम , आज तुम्ही पर आस लगायो ||  
काज सवारहु श्याम पिया मम , आज तुम्ही पर आस लगायो || 4 || 



कवि मोहन श्रीवास्तव 
रचना क्रमांक ;- ( 1123 )





Sunday, 21 October 2018

"भिन्न भिन्न ढेरों पंथ "

भिन्न भिन्न ढेरों पंथ , लिखे जा रहे हैं ग्रन्थ 
सब उसी परमेश का ही ध्यान करते | 
परमेश जो है एक , उसके रूप अनेक 
निज मति सब कोई गुणगान करते || 
यह है हमारा देव , वह है तुम्हारा देव 
जहाँ तहाँ सभी जन इसी पे हैं लड़ते | 
एक ही ईश्वर जान , सब उसकी संतान। 
फिर क्यूँ आपस में लड़ लड़ मरते || 
फिर क्यूँ आपस में लड़ लड़ मरते || 


कवि  मोहन श्रीवास्तव 

Tuesday, 9 October 2018

"महादेव शंभो पुकारा करेंगे "

भुजंग प्रयात छंद ( ISS  ISS  ISS ISS )


महादेव शंभो पुकारा करेंगे |
तुम्हारे बिना ना गुजारा करेंगे ||
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......

हरी ध्यान बाबा तुम्ही हो लगाते |
सभी के दुखों को सदा हो मिटाते ||
जटा शीश  गंगा तुम्ही हो समाते  |
दुखी लोग जो हैं गले से लगाते ||
बिहाने बिहाने उचारा करेंगे |
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......

भवानी करे ध्यान बाबा तुम्हारी |
इसी हेतु वो है तुम्हारी पियारी ||
अर्ध चंद सोहे गले सांप माला |
गणेशा व् कार्तिक दोनों उजाला ||
सुबो शाम भोले निहारा करेंगे |
 महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......

जटाजूट माथे सुहाना लगे है |
भभूती रमाये दिवाना लगे है ||
मदारी ,अनाड़ी ,कहे हैं पुरारी |
सदा लाज राखो तुम्ही त्रीपुरारी ||
सभी को आधारे उबारा करेंगे ||

महादेव शंभो पुकारा करेंगे |
तुम्हारे बिना ना गुजारा करेंगे ||
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......

कवि मोहन श्रीवास्तव 
 http://kavyapushpanjali.blogspot.com/2018/10/blog-post_9.html


रचना क्रमांक ;-( 1112 )
04/10/2018