Sunday, 22 January 2023

आज जगत में गूंज रहा है

सरसी छंद 
"आज जगत में गूंज रहा है"

आज जगत में गूंज रहा है, जय जय जय श्रीराम।
भव्य भुवन निर्माण हो रहा,अवध पुरी सुखधाम।।

पांच सदी मे सनातनी के,जागे सोये भाग।
आज बुझी है धधक रही थी,सदियों से जो आग।।

मुगल लुटेरे राम भवन का,किये विकट विध्वंस।
लाखों हिन्दू मार काटकर, मिटा दिये थे वंश।।

मंदिर ऊपर मस्जिद गढ़कर, किये लुटेरे काम।
कार सेवकों ने कर डाला, उसका काम तमाम।।

रामभक्त बलिदान हुए जो,नमन करें हम आज।
सत्य सनातन की रक्षा में,सारा राम समाज।।

तंबू मे श्रीराम विराजित, देख दुखित सब लोग।
न्यायालय ने दिया फैसला, तभी बना संयोग।।

ऐसे शासक जन का हम पर,बहुत बड़ा उपकार।
जिनकी मेहनत और लगन से,हमें मिला उपहार।।

भगवा अपना विजय पताका, कलशा घर के द्वार।
दीपों से मन रही दिवाली, घर घर वंदनवार।।

कोटि कोटि सब रामभक्त को,मोहन करे प्रणाम्।
राम नाम के दिये जलाओ,अपने अपने धाम।।

आज जगत में गूंज रहा है, जय जय जय श्रीराम।
भव्य भुवन निर्माण हो रहा,अवध पुरी सुखधाम।।

मोहन श्रीवास्तव

छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य मण्डल में मेरी श्रीमती शोभामोहन श्रीवास्तव जी काव्य पाठ करती हुई

साहित्य सृजन संस्थान का आभार

वक्ता मंच का आभार

साहित्य सृजन संस्थान का बहुत बहुत आभार

वक्ता मंच और साहित्य सृजन संस्थान

Saturday, 21 January 2023

श्री राम तांडव स्तोत्र" भावानुवाद

 "श्री राम तांडव स्तोत्र" भावानुवाद

छन्द : पञ्चचामर




जटा समूह युक्त भाल दीर्घ है महामना,

अमर्ष लाल नेत्र से जटा बिखेर के विभो।

प्रचण्ड वेग के प्रहार रौद्र रूप काल सा, 

अराति छिन्न भिन्न झुण्ड मध्य शोभते प्रभो।।१।। 


विशाल सैन्य वानराधिराज युक्त उग्र हैं,

महान अस्त्र शस्त्र सज्य चाप त्रोण बाण हैं।

प्रचण्ड दैत्य सैन्य अग्निरूप राम सिन्धु हैं, 

अराति आर्तभाव याचना लगात त्राण हैं ।।२।। 


भुजा विशाल कंप ओष्ठ गात वृक्ष छाल है,

विदीर्ण शत्रु देह की महान कामना करें।।

प्रघोर रोष व्याप्त है सिया हरे दशानना,

धरे प्रचण्ड रूप राम दैत्य प्राण को हरे।।३।। 


अधर्मवृद्धि कामना करे कुमार्ग दैत्य ने,

कुकर्मनाश हेतु बाण श्रीनिवास छोड़ते।

हठी पयोधि सेतु बांध पार सैन्य को किये,

प्रमत्त यातुधान गर्व राघवेन्द्र तोड़ते।।४।। 


कटार खड्ग पाश आदि यातुधान धारते,

पटी हुई वसुंधरा विभत्स हाड़ मांँस से।

घिरे प्रभो कपीश झुण्ड रक्त से नहा रहे,

विदीर्ण दैत्य देह से पटी मही विनाश से।।५।। 


विशालदंष्ट्र कुंभकर्ण आदि वीर बाँकुरे,

अजेय दैत्य मेघनाद आदि रक्षते जिसे।

अभेद्य दुर्ग स्वर्ण लंक दिव्य अस्त्र से विंधे,

पहाड़ धूलि के समान राम क्रोध से पिसे।।६।। 


प्रसिद्ध सिद्ध चारणों व योगिराज आदि से,

सदैव भक्तवृंद के सुपुज्य आप हैं विभो।

शरीर शीश छिन्न-भिन्न भूमि में दशानना,

अराति सैन्य सर्वनाश आपने किया प्रभो।।७।। 


कराल रूप युक्त आप उग्र चाप धार के,

पड़े कपीश रीछ मोह में सभी अधार को।

बिभिषणादि से किये विचार शत्रुनाश को,

भजूं सदैव उर्मिलापती कनीष्ठ भ्रात को।।८।। 


ध्वजा कटार कुंत धार दास शत्रु सैन्य के,

विराट रौद्र रूप देख यत्र तत्र भागते।

विनाश प्राप्त हो रहे प्रघोर घोर युद्ध में,

अजेय राम रूप देख शत्रु प्राण त्यागते।।९।। 


प्रभा महान युक्त सर्व पुष्ट तुष्ट हैं किये,

विकार आदि से विरक्त भक्त कष्ट काटते।

कपीश सैन्य नाथ जी अधर्मनाश के लिए ,

परोपकार सृष्टि हेतु दिव्य देह धारते।।१०।। 


कटार खड्ग शूल भिंदिपाल तीर फावड़ा ,

कुठार आदि अस्त्र से प्रचण्ड दैत्य को हते।

विशाल चाप के दहाड़ शत्रु कान बेधते,

धरा अनंत प्राणहीन दैत्य देह से पटे।।११।। 


उदार देव हो प्रसन्न मोहना मनाय है,

समस्त दुर्गुणादि नष्ट को करो महाप्रभो।

भजो सप्रेम भाव से सभी दयालु राम को,

प्रह्लाद आदि दैत्यवृंद इंद्र पूज्य हे विभो।।१२।।

कवि मोहन श्रीवास्तव 

इति श्री भागवतानंद गुरुणा विरचिते श्री राघवेंद्र चरिते इंद्रादि देवगणैः कृतम श्री राम ताण्डव स्तोत्रम सम्पूर्णम।




Wednesday, 18 January 2023

"विजात छंद" (श्री हनुमान स्तुति) जय जय श्री राम

 "विजात छंद"


(श्री हनुमान स्तुति) जय जय श्री राम


लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।

हृदय सियराम की मूरत,सदा श्री राम उच्चारे।।


अतुल बलवान बजरंगी,सभी वेदों के हैं ज्ञाता।

पिता श्री वायु हैं उनके, लला की अंजनी माता।।

सियापति राम के सेवक,सदा संतो को हैं तारे।

लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।।१।।


परम विद्वान रिपु हंता,असुर दल मारने वाले।

मिटाते राम द्रोही को,भजन में विध्न जो डाले।।

भजे हनुमान जी को जो,सभी संकट प्रभो टारे।

लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।।२।।


जहां पर राम कीर्तन हो,वहां हनुमान जी आते।

सुनें प्रभु राम चर्चा को,कथा विश्राम पर जाते।।

अमर हैं देव कलयुग के,स्वयं को राम पर वारे।

लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।।३।।


लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।

हृदय सियराम की मूरत,सदा श्री राम उच्चारे।।


कवि मोहन श्रीवास्तव







"शिव रुद्राष्टकम स्तोत्र" भावानुवाद (भुजंगप्रयात सवैया)

 "शिव रुद्राष्टकम स्तोत्र" भावानुवाद 
(महाभुजंगप्रयात सवैया)
ISS ISS ISS ISS ISS ISS ISS ISS 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

प्रभो आप ब्रम्हांड के हो विधाता,
तुम्हें मैं महादेव माथा नवाऊंँ।
सभी रूप व्यापी तपस्वी यशस्वी,
तुम्हें वेदरूपी रिझाऊँ मनाऊंँ।।
सदा मोह से दूर दातार शंभू,
दिशावस्त्रधारी गुणातीत गाऊँ।
भजूँ आपका नाम दाता पुरारी,
महाकाल भैरौ सदा माथ नाऊँ।।१।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।


निराकार ओंकार के मूल स्वामी,
परे ज्ञान इंद्रीय वाणी प्रभो हो।।
महाकाल के काल स्वामी गुणी हो,
परे आप संसार से भी विभो हो।।२।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

लगे गात गौरीय नागेश जैसे,
करोड़ों प्रभो मीनकेतू लजाये।
गले सर्पमाला जटा शीशगंगा,
सदा माथ पे दूज चंदा सुहाये।।३।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।


हिले कान में कुंडलें दीर्घ नैना,
महादेव हो नीलकंठी दयालू।
गले मुंडमाला सभी के हितैषी,
भजूँ नित्य बाघाम्बरी हे कृपालू।।४।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

करोड़ों विवस्वान को हैं लजाते,
भजूंँ मैं सती के पती शूलधारी।
हरो व्याधि सारे महादेव भोले,
अजन्मा अखंडा प्रचण्डा पुरारी।।५।।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

परे आप स्वामी कला आदि से हो,
सभी सज्जनों को सदा मान देते।
हरो मोहमाया भजे आपको जो,
लुटा हर्ष से ज्ञान सम्मान देते।।६।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

भजे आपको जो नहीं हे कपाली,
जरे ताप में वो नहीं शांति पाये ।
सभी जीव में आपका वास स्वामी,
सदा आप संतुष्ट होना सहाये।।७।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

नहीं जानता योग पूजा पिनाकी,
तुम्हें सर्वदा नाथ माथा नवाऊँ।
बुढ़ापा तथा जन्म के चक्करों के,
दुखों के महादेव मैं पार पाऊंँ।।८।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

किए प्रार्थना विप्र जो शंभु से हैं ,
महादेव संतुष्ट होके सहाए।
करे भक्त जो पाठ रुद्राष्टकम का,
सदा शंभु आशीष वो भक्त पाए।।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।9।।

कवि मोहन श्रीवास्तव





#भिक्षा_यात्रा 🙏🏻


 #भिक्षा_यात्रा 🙏🏻


कृपया सभी सनातनी भाई बहन स्वामी दीपांकर जी की भिक्षा यात्रा में जुडें। 


नहीं मांगते अन्न धन्न दौलत, जगा रहे जाकर हर द्वार।

नाम है स्वामी दीपांकर जी, जोड़ रहे बिखरा परिवार।।1।।

भिक्षा मांग रहा सन्यासी, नगर डगर में लगा पुकार।

सनातनी तुम इक हो जाओ, जाति पाति की तोड़ दीवार।।2।।


देश धर्म के रक्षक बनकर आए युग ऋषि संत महान।

इनको पूर्ण समर्थन देकर ,हम सबको देना है मान।।3।।


हमको ताकत देने आए,सब मिल देना पूरा साथ।

भिक्षा यात्रा सफल बनाने,हिंदू सभी बढ़ाओ हाथ।।4।।


कवियों लिखो गायकों गाओ, स्वयंसेवियों करो प्रचार।

करो प्रकाशित भिक्षा यात्रा , पत्रकार से करूं गुहार।।5।।

कवि मोहन श्रीवास्तव


#भिक्षा_यात्रा जय हो सनातन धर्म की 🚩

पण्डित सुंदर लाल शर्मा

पण्डित सुंदर लाल शर्मा 

(सरसी छंद)


त्याग तपस्या के थे मूरत, पंडित सुंदर लाल ।

छत्तीसगढ़ दाई के गोदी, को कर गए निहाल ।।


पंडित जी का महलनुमा घर, चमसुर नामक गाँव ।

धन दौलत की कमी नहीं थी, महानदी की छाँव ।।


खेत सैकड़ों एकड़ जिसमें, आम जाम के बाग ।

पंक्षी तोता मैना कोयल, मिलकर छेड़ें राग ।।


सोन अंगूठी सदा पहनते, सोना जड़ित लिबास ।

घर में रहकर किये पढ़ाई, काशी गुरु से खास ।।


छंदबद्ध कविताएं लिखते, उनका हृदय उदार ।

कई बार वे जेल गए थे, पर ना माने हार ।।


रचे दान लीला पंडित जी, जिसमें गोपी श्याम ।

प्रेम भक्ति का मिश्रण लिखकर, अमर कर गए नाम ।।


अव्वल नंबर के थे जिद्दी, जिद्द ही उनका पंथ ।

रात रात भर जाग जाग कर, लिखे अठारह ग्रंथ ।।


नये नये तकनीकों का वे, करते सदा प्रयोग ।

भब्य जलाशय बाँध बनाकर, करते थे उपयोग ।।


जौ गेहूं को पिसवाते थे, पनचक्की से आप ।

छुआछूत का भेद मिटाने, सहे बहुत संताप ।।


छत्तीसगढ़ में रोपा पद्धति, लाए थे श्रीमान ।

प्रगतिशील खेतिहर का उनको, मिला बड़ा सम्मान ।।


छुआछूत के घोर विरोधी, सब मेंं देखें राम ।

दलित प्रवेश कराए मंदिर, राजिम लोचन धाम ।।


अंग्रेजों ने जलकर थोपा, उसका किये विरोध ।

तब कंडेल गांव में जाकर, लिए उचित प्रतिशोध ।।


वस्तु स्वदेशी अपनाने को, बेचे संपत्ति खेत ।

आखिर मेंं कंगाल हो गए, राष्ट्र धर्म के हेत ।।


अंत समय मेंं दुर्दिन देखे, मगर न टूटे आप ।

हरि का सुमिरन करते करते, भोगे सब दुख ताप ।।


एक ही कुर्ता एक ही धोती, बचा हुआ था पास ।

सिल सिल कर उसे पहनते, जब निकला था श्वाँस ।।


ऋणी रहेगा भारत उनका, छत्तीसगढ़ की शान ।

करता है मोहन पग वंदन, सुंदर लाल महान ।।


त्याग तपस्या के थे मूरत, पंडित सुंदर लाल ।

छत्तीसगढ़ दाई के गोदी, को कर गए निहाल ।।


मोहन श्रीवास्तव


"अष्टपदी छंद" (वर्णिक) "शिव स्तुति" भगत जपत शिव शंकर, अभयंकर हे। अजर अमर अहि हार,जय जय शंभु हरे।।१।। शशिधर विषधर सुंदर, सुख सागर हे। हरि उर बसत गिरीश,जय जय शंभु हरे।।२।। अखिल जगत शिव पूजित, भव तारत हे। हरत जगत सब व्याधि,जय जय शंभु हरे।।३।। पितु गजवदन उमापति,प्रिय लागत हे। रतिपति हति गति देत, जय जय शंभु हरे।।४।। विपत हरत दुख टारत, खल मारत हे। सिर तव चरन नवात,जय जय शंभु हरे।।५।। प्रबल गरल गर धारत, दुःख टारत हे। अहिगन कर फुफकार, जय जय शंभु हरे।।६।। दिनकर हिमकर पावक, तव नैनन हे। विनय करत तव दास, जय जय शंभु हरे।।७।। विमल धवल तव मूरत, खुबसूरत हे। भजन करत दिन रात, जय जय शंभु हरे।।८।। कवि मोहन श्रीवास्तव

"शिव स्तुति" "विजात छंद" ISSS ISSS,ISSS ISSS लगाऊँ ध्यान भोले का, सदा जो राम को ध्याते। हृदय से भावपूरित हो, सदा गुनगान को गाते।। महादानी जटाधारी, जटा में पावनी गंगा। लिए त्रिशूल हाथों में, धरें हैं रूप अड़बंगा। लपेटे कंठ में विषधर, कलाधर माथ पे सोहे। भभूती तन रमा के वो, करोड़ों काम को मोहे।। बजाते नाथ डम डमरू, जिसे सुन पाप कट जाते। लगाऊँ ध्यान भोले का, सदा जो राम को ध्याते।। पहन कटि व्याघ्र की छाला, सवारी बैल की साजे। भवानी संगिनी भी है, सुशोभित अग्र में राजे।। लगे मनमोहिनी जोड़ी, सदा नंदी खड़ा द्वारे। मची है धूम मंदिर में, लगाते भक्त जय कारे ।। करें सब कामना पूरी, भगत जो शिव शरण आते। लगाऊँ ध्यान भोले का, सदा जो राम को ध्याते।। हृदय से भावपूरित हो, सदा गुनगान को गाते।। कवि मोहन श्रीवास्तव

(घनाक्षरी) "शिव वंदना" आदि देव महादेव,जिन्हें सेवें सभी देव, ऐसे भोलेनाथ जी का रूप तो निराला है। क्षण में होते प्रसन्न,भक्तों को करे धन्य, शिव नाम तमस में करता उजाला है।। सीस सोहे चंद्र गंग,भभूति रमाए अंग, पत्नी पार्वती देवी गणपति जी लाला हैं। हरि ध्यान करें हर,जगत की पीड़ा हर, कालों का भी महाकाल वो डमरू वाला है।। कवि मोहन श्रीवास्तव

Tuesday, 6 July 2021

(विधाता छंद)"मुक्तक" ‌चली बेटी विदा होके,घराना रो रहा देखो ।

"मुक्तक"(विधाता छंद)
‌(ISSS  ISSS    ISSS  ISSS)

चली बेटी विदा होके,घराना रो रहा देखो ।
लिपट कर रो रही है माँ,ठिकाना रो रहा देखो ।।
विदाई हो गई जब तो,जिसे पत्थर सभी समझे ।
पिता के नैन सागर का, मुहाना रो रहा देखो ।।

मोहन श्रीवास्तव

(शार्दूलविक्रीडितम् छंद" आया है नववर्ष आज अपना, उल्लास ढेरों यहाँ।

"शार्दूलविक्रीडितम् छंद" 

आया है नववर्ष आज अपना, उल्लास ढेरों यहाँ।
चारों ओर सुगंध वायु बहती, नाचे मयूरा महा।।
बूढ़े बाल युवा सभी मगन हैं, नारी सुता भी सभी।
बैठी कोयल डाल पे विटप के,बोली सुनाती जहाँ।।1।। 

आया चैत्र नवीन शुक्ल प्रथमा, आनंद छाने लगे।
चारों ओर खिले हुए पुहुप है, प्यारे सुहाने लगे।।
धानी पल्लव पेड़ पे सज रहे, सारे दिवाने लगे।
भौरें चूस रहे प्रसून रस को, आमोद पाने लगे।।2।। 

आई है नवरात्रि पावन महा, माँ को सभी पूजते।
घंटा शंख बजे सदा भवन में,चारों दिशा गूँजते।।
ज्वारा दीपक नीर युक्त कलशा, माता मनायें सभी।
काटे विघ्न सुखी करें जगत को,जो रोग से जूझते।।3।। 

मोहन श्रीवास्तव

(मेनका छंद वर्णिक)"हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे"

(मेनका छंद वर्णिक)

"हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे" 

हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे।
आपसी व्यौहार वाले, दूर से ही हैं भगें।। 

रोग है संसार छाया, है दवाओं की कमी।
काल गालों मे समाते, लोग चारों ओर ही ।।
मौत की चारों दिशा से, आ रहे संदेश है।
हैं डरे से लोग भारी, जो अभी भी शेष हैं ।।
नेह-नाते और पैसा, पास होके भी ठगें।
हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे।।1।। 

सावधानी से रहो जी, गेह में ही लाक हो।
दूर से ही हाथ जोड़ो, नाक पे ही मास्क हो।।
साबुनों से हाथ धोयें, स्वच्छता का ध्यान हो।
गर्म पानी भाप लेके, नित्य काढ़ा पान हो।।
बात सारी जानके भी, लोग जो भी ना जगें।
हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे।।2।। 

चेत जाओ देख लीला, जो रचाए राम जी।
अक्ल आई हो कहीं तो, लो उसी का नाम जी ।।
खेल खेला काल ने तो, पात से काँपे सभी।
और ज्यादा रौद्र होगी, जो नहीं चेते अभी।।
छोड़ सारी व्यर्थ बातें, राम चर्चा में पगें ।
हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे।।3।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

(प्रमाणिका छंद वर्णिक) प्रणाम राम आपको

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  "प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।"
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("प्रमाणिका छंद"वर्णिक)
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लिए कमान चाप को।बुझाव आप ताप को।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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हरो समस्त पाप को। प्रणाम राम आपको।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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रमूँ महान नाम में। रहूँ कृपालु धाम में।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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समान शीत घाम में। रहूँ भरोस राम में ।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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प्रसून में पराग हैं। सितार चारु राग हैं।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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सुवास आप बाग हैं। मनोज नाश आग हैं।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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सरोज नेत्र सोहते। मुखारविन्द मोहते।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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विरक्त पंथ जोहते। समस्त दुष्ट को हते।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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जटा सजाय माथ में। सिया सदैव साथ में।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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विकास नाश हाथ में। सभी समाय नाथ में।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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अखंड हो निवासते। त्रिलोक को उजासते।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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प्रचंड दैत्य नाशते। उदार मंद हाँसते।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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कवि मोहन श्रीवास्तव
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सृष्टि करे प्रतिकार है

"सृष्टि करे प्रतिकार है" 

धरती पर बढ़ गया आजकल, इतना पापाचार है।
पाप परायणता के कारण, सृष्टि करे प्रतिकार है।। 

पापों के फल को जाने बिन, जानबूझ कर पाप करें।
फिर अपनी गलती मानें बिन, पीछे बगुला जाप करें।।
धन पाने की विकट चाह में, भ्रात खून का प्यासा है।
छोटे से जीवन में पालें, अमर हेतु अभिलाषा है।।
मद्यपान कर कच्छ मच्छ ये, सारे दुष्टाहार हैं।
पाप परायणता के कारण, सृष्टि करे प्रतिकार है।।1।। 

दे गायों को नरक यातना, सब जीवों को मार रहे।
साधू संतो की हत्या कर, पागल से उन्माद बहे।।
देव मंदिरों की प्रतिमा को, खंड-खंड कर तोड़ रहे।
मात पिता की सेवा करने, से अपना मुख मोड़ रहे।।
ऐसों का ही श्राप मिला है, तब तो हाहाकार है।।
पाप परायणता के कारण, सृष्टि करे प्रतिकार है।। 
2।। 

करें कटाई नित पेड़ों की, जंगल सभी उजाड़ रहे।
दोहन करते नित्य भूमि का, पर्वत सीना फाड़ रहे।।
नदी तलाबों को अपने हित,धीरे धीरे पाट दिये।
सत्य सनातन को सदियों से, टुकड़े-टुकड़े बाट दिये।।
छोड़ बुराई करो भलाई, करती समय पुकार है।
पाप परायणता के कारण, सृष्टि करे प्रतिकार है।।3।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

(मेनका छंद) है पधारी ग्यानदेवी

"है पधारी ग्यान देवी"
(मेनका छंद "वर्णिक")

है पधारी ग्यान देवी, हाथ में वीणा धरे।
ग्यान का भंडार देके, भक्त की पीड़ा हरे।। 

हंस पे बैठी हुई है,  हाथ पोथी धार के।
श्वेत साड़ी है लपेटे, मोहिनी को डार के।। 

आसनी राजीव की है, कंठमाला मंजरी।
दे रही आशीष माता, जो पसारे अंजुरी।। 

लेखनी कोई उठाये, चेतना आलोक में।
दौड़ के आती विधाता, लोक से भू लोक में।। 

छोड़ के जो ईश चर्चा, व्यर्थ की बातें लिखे।
तो दुःखी होके विधात्री, क्रोध में जाती दिखे।। 

है पधारी ग्यान देवी, हाथ में वीणा धरे।
ग्यान का भंडार दे के, भक्त की पीड़ा हरे।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव