Wednesday, 18 January 2023

"विजात छंद" (श्री हनुमान स्तुति) जय जय श्री राम

 "विजात छंद"


(श्री हनुमान स्तुति) जय जय श्री राम


लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।

हृदय सियराम की मूरत,सदा श्री राम उच्चारे।।


अतुल बलवान बजरंगी,सभी वेदों के हैं ज्ञाता।

पिता श्री वायु हैं उनके, लला की अंजनी माता।।

सियापति राम के सेवक,सदा संतो को हैं तारे।

लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।।१।।


परम विद्वान रिपु हंता,असुर दल मारने वाले।

मिटाते राम द्रोही को,भजन में विध्न जो डाले।।

भजे हनुमान जी को जो,सभी संकट प्रभो टारे।

लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।।२।।


जहां पर राम कीर्तन हो,वहां हनुमान जी आते।

सुनें प्रभु राम चर्चा को,कथा विश्राम पर जाते।।

अमर हैं देव कलयुग के,स्वयं को राम पर वारे।

लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।।३।।


लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।

हृदय सियराम की मूरत,सदा श्री राम उच्चारे।।


कवि मोहन श्रीवास्तव







"शिव रुद्राष्टकम स्तोत्र" भावानुवाद (भुजंगप्रयात सवैया)

 "शिव रुद्राष्टकम स्तोत्र" भावानुवाद 
(महाभुजंगप्रयात सवैया)
ISS ISS ISS ISS ISS ISS ISS ISS 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

प्रभो आप ब्रम्हांड के हो विधाता,
तुम्हें मैं महादेव माथा नवाऊंँ।
सभी रूप व्यापी तपस्वी यशस्वी,
तुम्हें वेदरूपी रिझाऊँ मनाऊंँ।।
सदा मोह से दूर दातार शंभू,
दिशावस्त्रधारी गुणातीत गाऊँ।
भजूँ आपका नाम दाता पुरारी,
महाकाल भैरौ सदा माथ नाऊँ।।१।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।


निराकार ओंकार के मूल स्वामी,
परे ज्ञान इंद्रीय वाणी प्रभो हो।।
महाकाल के काल स्वामी गुणी हो,
परे आप संसार से भी विभो हो।।२।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

लगे गात गौरीय नागेश जैसे,
करोड़ों प्रभो मीनकेतू लजाये।
गले सर्पमाला जटा शीशगंगा,
सदा माथ पे दूज चंदा सुहाये।।३।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।


हिले कान में कुंडलें दीर्घ नैना,
महादेव हो नीलकंठी दयालू।
गले मुंडमाला सभी के हितैषी,
भजूँ नित्य बाघाम्बरी हे कृपालू।।४।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

करोड़ों विवस्वान को हैं लजाते,
भजूंँ मैं सती के पती शूलधारी।
हरो व्याधि सारे महादेव भोले,
अजन्मा अखंडा प्रचण्डा पुरारी।।५।।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

परे आप स्वामी कला आदि से हो,
सभी सज्जनों को सदा मान देते।
हरो मोहमाया भजे आपको जो,
लुटा हर्ष से ज्ञान सम्मान देते।।६।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

भजे आपको जो नहीं हे कपाली,
जरे ताप में वो नहीं शांति पाये ।
सभी जीव में आपका वास स्वामी,
सदा आप संतुष्ट होना सहाये।।७।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

नहीं जानता योग पूजा पिनाकी,
तुम्हें सर्वदा नाथ माथा नवाऊँ।
बुढ़ापा तथा जन्म के चक्करों के,
दुखों के महादेव मैं पार पाऊंँ।।८।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

किए प्रार्थना विप्र जो शंभु से हैं ,
महादेव संतुष्ट होके सहाए।
करे भक्त जो पाठ रुद्राष्टकम का,
सदा शंभु आशीष वो भक्त पाए।।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।9।।

कवि मोहन श्रीवास्तव





#भिक्षा_यात्रा 🙏🏻


 #भिक्षा_यात्रा 🙏🏻


कृपया सभी सनातनी भाई बहन स्वामी दीपांकर जी की भिक्षा यात्रा में जुडें। 


नहीं मांगते अन्न धन्न दौलत, जगा रहे जाकर हर द्वार।

नाम है स्वामी दीपांकर जी, जोड़ रहे बिखरा परिवार।।1।।

भिक्षा मांग रहा सन्यासी, नगर डगर में लगा पुकार।

सनातनी तुम इक हो जाओ, जाति पाति की तोड़ दीवार।।2।।


देश धर्म के रक्षक बनकर आए युग ऋषि संत महान।

इनको पूर्ण समर्थन देकर ,हम सबको देना है मान।।3।।


हमको ताकत देने आए,सब मिल देना पूरा साथ।

भिक्षा यात्रा सफल बनाने,हिंदू सभी बढ़ाओ हाथ।।4।।


कवियों लिखो गायकों गाओ, स्वयंसेवियों करो प्रचार।

करो प्रकाशित भिक्षा यात्रा , पत्रकार से करूं गुहार।।5।।

कवि मोहन श्रीवास्तव


#भिक्षा_यात्रा जय हो सनातन धर्म की 🚩

पण्डित सुंदर लाल शर्मा

पण्डित सुंदर लाल शर्मा 

(सरसी छंद)


त्याग तपस्या के थे मूरत, पंडित सुंदर लाल ।

छत्तीसगढ़ दाई के गोदी, को कर गए निहाल ।।


पंडित जी का महलनुमा घर, चमसुर नामक गाँव ।

धन दौलत की कमी नहीं थी, महानदी की छाँव ।।


खेत सैकड़ों एकड़ जिसमें, आम जाम के बाग ।

पंक्षी तोता मैना कोयल, मिलकर छेड़ें राग ।।


सोन अंगूठी सदा पहनते, सोना जड़ित लिबास ।

घर में रहकर किये पढ़ाई, काशी गुरु से खास ।।


छंदबद्ध कविताएं लिखते, उनका हृदय उदार ।

कई बार वे जेल गए थे, पर ना माने हार ।।


रचे दान लीला पंडित जी, जिसमें गोपी श्याम ।

प्रेम भक्ति का मिश्रण लिखकर, अमर कर गए नाम ।।


अव्वल नंबर के थे जिद्दी, जिद्द ही उनका पंथ ।

रात रात भर जाग जाग कर, लिखे अठारह ग्रंथ ।।


नये नये तकनीकों का वे, करते सदा प्रयोग ।

भब्य जलाशय बाँध बनाकर, करते थे उपयोग ।।


जौ गेहूं को पिसवाते थे, पनचक्की से आप ।

छुआछूत का भेद मिटाने, सहे बहुत संताप ।।


छत्तीसगढ़ में रोपा पद्धति, लाए थे श्रीमान ।

प्रगतिशील खेतिहर का उनको, मिला बड़ा सम्मान ।।


छुआछूत के घोर विरोधी, सब मेंं देखें राम ।

दलित प्रवेश कराए मंदिर, राजिम लोचन धाम ।।


अंग्रेजों ने जलकर थोपा, उसका किये विरोध ।

तब कंडेल गांव में जाकर, लिए उचित प्रतिशोध ।।


वस्तु स्वदेशी अपनाने को, बेचे संपत्ति खेत ।

आखिर मेंं कंगाल हो गए, राष्ट्र धर्म के हेत ।।


अंत समय मेंं दुर्दिन देखे, मगर न टूटे आप ।

हरि का सुमिरन करते करते, भोगे सब दुख ताप ।।


एक ही कुर्ता एक ही धोती, बचा हुआ था पास ।

सिल सिल कर उसे पहनते, जब निकला था श्वाँस ।।


ऋणी रहेगा भारत उनका, छत्तीसगढ़ की शान ।

करता है मोहन पग वंदन, सुंदर लाल महान ।।


त्याग तपस्या के थे मूरत, पंडित सुंदर लाल ।

छत्तीसगढ़ दाई के गोदी, को कर गए निहाल ।।


मोहन श्रीवास्तव


"अष्टपदी छंद" (वर्णिक) "शिव स्तुति" भगत जपत शिव शंकर, अभयंकर हे। अजर अमर अहि हार,जय जय शंभु हरे।।१।। शशिधर विषधर सुंदर, सुख सागर हे। हरि उर बसत गिरीश,जय जय शंभु हरे।।२।। अखिल जगत शिव पूजित, भव तारत हे। हरत जगत सब व्याधि,जय जय शंभु हरे।।३।। पितु गजवदन उमापति,प्रिय लागत हे। रतिपति हति गति देत, जय जय शंभु हरे।।४।। विपत हरत दुख टारत, खल मारत हे। सिर तव चरन नवात,जय जय शंभु हरे।।५।। प्रबल गरल गर धारत, दुःख टारत हे। अहिगन कर फुफकार, जय जय शंभु हरे।।६।। दिनकर हिमकर पावक, तव नैनन हे। विनय करत तव दास, जय जय शंभु हरे।।७।। विमल धवल तव मूरत, खुबसूरत हे। भजन करत दिन रात, जय जय शंभु हरे।।८।। कवि मोहन श्रीवास्तव

"शिव स्तुति" "विजात छंद" ISSS ISSS,ISSS ISSS लगाऊँ ध्यान भोले का, सदा जो राम को ध्याते। हृदय से भावपूरित हो, सदा गुनगान को गाते।। महादानी जटाधारी, जटा में पावनी गंगा। लिए त्रिशूल हाथों में, धरें हैं रूप अड़बंगा। लपेटे कंठ में विषधर, कलाधर माथ पे सोहे। भभूती तन रमा के वो, करोड़ों काम को मोहे।। बजाते नाथ डम डमरू, जिसे सुन पाप कट जाते। लगाऊँ ध्यान भोले का, सदा जो राम को ध्याते।। पहन कटि व्याघ्र की छाला, सवारी बैल की साजे। भवानी संगिनी भी है, सुशोभित अग्र में राजे।। लगे मनमोहिनी जोड़ी, सदा नंदी खड़ा द्वारे। मची है धूम मंदिर में, लगाते भक्त जय कारे ।। करें सब कामना पूरी, भगत जो शिव शरण आते। लगाऊँ ध्यान भोले का, सदा जो राम को ध्याते।। हृदय से भावपूरित हो, सदा गुनगान को गाते।। कवि मोहन श्रीवास्तव

(घनाक्षरी) "शिव वंदना" आदि देव महादेव,जिन्हें सेवें सभी देव, ऐसे भोलेनाथ जी का रूप तो निराला है। क्षण में होते प्रसन्न,भक्तों को करे धन्य, शिव नाम तमस में करता उजाला है।। सीस सोहे चंद्र गंग,भभूति रमाए अंग, पत्नी पार्वती देवी गणपति जी लाला हैं। हरि ध्यान करें हर,जगत की पीड़ा हर, कालों का भी महाकाल वो डमरू वाला है।। कवि मोहन श्रीवास्तव

Tuesday, 6 July 2021

(विधाता छंद)"मुक्तक" ‌चली बेटी विदा होके,घराना रो रहा देखो ।

"मुक्तक"(विधाता छंद)
‌(ISSS  ISSS    ISSS  ISSS)

चली बेटी विदा होके,घराना रो रहा देखो ।
लिपट कर रो रही है माँ,ठिकाना रो रहा देखो ।।
विदाई हो गई जब तो,जिसे पत्थर सभी समझे ।
पिता के नैन सागर का, मुहाना रो रहा देखो ।।

मोहन श्रीवास्तव

(शार्दूलविक्रीडितम् छंद" आया है नववर्ष आज अपना, उल्लास ढेरों यहाँ।

"शार्दूलविक्रीडितम् छंद" 

आया है नववर्ष आज अपना, उल्लास ढेरों यहाँ।
चारों ओर सुगंध वायु बहती, नाचे मयूरा महा।।
बूढ़े बाल युवा सभी मगन हैं, नारी सुता भी सभी।
बैठी कोयल डाल पे विटप के,बोली सुनाती जहाँ।।1।। 

आया चैत्र नवीन शुक्ल प्रथमा, आनंद छाने लगे।
चारों ओर खिले हुए पुहुप है, प्यारे सुहाने लगे।।
धानी पल्लव पेड़ पे सज रहे, सारे दिवाने लगे।
भौरें चूस रहे प्रसून रस को, आमोद पाने लगे।।2।। 

आई है नवरात्रि पावन महा, माँ को सभी पूजते।
घंटा शंख बजे सदा भवन में,चारों दिशा गूँजते।।
ज्वारा दीपक नीर युक्त कलशा, माता मनायें सभी।
काटे विघ्न सुखी करें जगत को,जो रोग से जूझते।।3।। 

मोहन श्रीवास्तव

(मेनका छंद वर्णिक)"हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे"

(मेनका छंद वर्णिक)

"हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे" 

हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे।
आपसी व्यौहार वाले, दूर से ही हैं भगें।। 

रोग है संसार छाया, है दवाओं की कमी।
काल गालों मे समाते, लोग चारों ओर ही ।।
मौत की चारों दिशा से, आ रहे संदेश है।
हैं डरे से लोग भारी, जो अभी भी शेष हैं ।।
नेह-नाते और पैसा, पास होके भी ठगें।
हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे।।1।। 

सावधानी से रहो जी, गेह में ही लाक हो।
दूर से ही हाथ जोड़ो, नाक पे ही मास्क हो।।
साबुनों से हाथ धोयें, स्वच्छता का ध्यान हो।
गर्म पानी भाप लेके, नित्य काढ़ा पान हो।।
बात सारी जानके भी, लोग जो भी ना जगें।
हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे।।2।। 

चेत जाओ देख लीला, जो रचाए राम जी।
अक्ल आई हो कहीं तो, लो उसी का नाम जी ।।
खेल खेला काल ने तो, पात से काँपे सभी।
और ज्यादा रौद्र होगी, जो नहीं चेते अभी।।
छोड़ सारी व्यर्थ बातें, राम चर्चा में पगें ।
हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे।।3।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

(प्रमाणिका छंद वर्णिक) प्रणाम राम आपको

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  "प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।"
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("प्रमाणिका छंद"वर्णिक)
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लिए कमान चाप को।बुझाव आप ताप को।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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हरो समस्त पाप को। प्रणाम राम आपको।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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रमूँ महान नाम में। रहूँ कृपालु धाम में।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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समान शीत घाम में। रहूँ भरोस राम में ।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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प्रसून में पराग हैं। सितार चारु राग हैं।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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सुवास आप बाग हैं। मनोज नाश आग हैं।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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सरोज नेत्र सोहते। मुखारविन्द मोहते।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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विरक्त पंथ जोहते। समस्त दुष्ट को हते।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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जटा सजाय माथ में। सिया सदैव साथ में।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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विकास नाश हाथ में। सभी समाय नाथ में।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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अखंड हो निवासते। त्रिलोक को उजासते।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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प्रचंड दैत्य नाशते। उदार मंद हाँसते।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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कवि मोहन श्रीवास्तव
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सृष्टि करे प्रतिकार है

"सृष्टि करे प्रतिकार है" 

धरती पर बढ़ गया आजकल, इतना पापाचार है।
पाप परायणता के कारण, सृष्टि करे प्रतिकार है।। 

पापों के फल को जाने बिन, जानबूझ कर पाप करें।
फिर अपनी गलती मानें बिन, पीछे बगुला जाप करें।।
धन पाने की विकट चाह में, भ्रात खून का प्यासा है।
छोटे से जीवन में पालें, अमर हेतु अभिलाषा है।।
मद्यपान कर कच्छ मच्छ ये, सारे दुष्टाहार हैं।
पाप परायणता के कारण, सृष्टि करे प्रतिकार है।।1।। 

दे गायों को नरक यातना, सब जीवों को मार रहे।
साधू संतो की हत्या कर, पागल से उन्माद बहे।।
देव मंदिरों की प्रतिमा को, खंड-खंड कर तोड़ रहे।
मात पिता की सेवा करने, से अपना मुख मोड़ रहे।।
ऐसों का ही श्राप मिला है, तब तो हाहाकार है।।
पाप परायणता के कारण, सृष्टि करे प्रतिकार है।। 
2।। 

करें कटाई नित पेड़ों की, जंगल सभी उजाड़ रहे।
दोहन करते नित्य भूमि का, पर्वत सीना फाड़ रहे।।
नदी तलाबों को अपने हित,धीरे धीरे पाट दिये।
सत्य सनातन को सदियों से, टुकड़े-टुकड़े बाट दिये।।
छोड़ बुराई करो भलाई, करती समय पुकार है।
पाप परायणता के कारण, सृष्टि करे प्रतिकार है।।3।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

(मेनका छंद) है पधारी ग्यानदेवी

"है पधारी ग्यान देवी"
(मेनका छंद "वर्णिक")

है पधारी ग्यान देवी, हाथ में वीणा धरे।
ग्यान का भंडार देके, भक्त की पीड़ा हरे।। 

हंस पे बैठी हुई है,  हाथ पोथी धार के।
श्वेत साड़ी है लपेटे, मोहिनी को डार के।। 

आसनी राजीव की है, कंठमाला मंजरी।
दे रही आशीष माता, जो पसारे अंजुरी।। 

लेखनी कोई उठाये, चेतना आलोक में।
दौड़ के आती विधाता, लोक से भू लोक में।। 

छोड़ के जो ईश चर्चा, व्यर्थ की बातें लिखे।
तो दुःखी होके विधात्री, क्रोध में जाती दिखे।। 

है पधारी ग्यान देवी, हाथ में वीणा धरे।
ग्यान का भंडार दे के, भक्त की पीड़ा हरे।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

("स्त्रग्धरा छंद" "वर्णिक")"शिव स्तुति""आई बारात द्वारे" हर हर महादेव

("स्त्रग्धरा छंद" "वर्णिक")
"शिव स्तुति"
"आई बारात द्वारे" हर हर महादेव

आई बारात द्वारे, हिम भवन यहाँ, लोग आमोद पायें।
कैलाशी हैं पधारे,डम डम डमरु, साथ में ले बजायें।।
नंदी पे है सवारी, जगतपति महा, शीस मौरा सजाये।
माथे पे चंद्र गंगा, हर हर करती, ध्वनि भारी सुहाये।।1।। 

बोली बोले अनोखे,  हर गण भुतहा, घोर लीला डरायें।
कोई नैना बिना है, मुख श्रवन नहीं, देख सारे परायें।।
ठाढ़े हैं देख बूढ़े, मन मन हंँसते, धीर धारो बतायें।
भोले के ये बराती, भवन मत भगो, व्याहने गौरि आये।।2।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

(उपेंद्रवज्रा छंद,वर्णिक)

(उपेंद्रवज्रा छंद,वर्णिक)

"काली स्तुति"
"महाकराली विकराल काली" 

महाकराली विकराल काली,कटार लेके लड़ने चली है।
निकाल जिव्हा गल मुंडमाला, निशाचरों को हनने चली है।। 

किये सवारी शवयान देखो, किरीटधारी धनु को चलाती।
गदा धरे है कर में भवानी, मलीन पापी दल को जलाती।। 

उदारदानी जय माँ भवानी, हरो सभी के दुःख दर्द सारे।
सिवा तुम्हारे जग में न कोई, रहें सदा ही मइया सहारे।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

वागीश्वरी सम्मान

देश की प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था वक्तामंच मानवता की सेवा और सम्मान के लिए प्रतिबद्ध संस्था है, जिसके द्वारा समाज के विविध विधाओं के सृजनकारों को सम्मानित करने की एक नैष्ठिक परम्परा चलायी जा रही हैं प्रतिभाओं का सम्मान किसी बढ़ते वृक्ष को खाद पानी देने और सेवा करने जैसा परम पावन कृत्य है । समाज में मनुष्यता और शुभता को प्रकाशित करने के लिए वक्तामंच का योगदान अतुलनीय है। वक्तामंच  के सभी समर्पित सेनानियों का शत् शत् वंदन हार्दिक अभिनंदन एवं "वागीश्वरी सम्मान" देने के लिए वक्ता मंच का बहुत बहुत आभार..

(महाभुजंग प्रयात सवैया,वर्णिक)"सती वियोग मे भगवान महादेव जी की दशा का वर्णन""भवानी बिना आज कैलाश सूना"

(महाभुजंग प्रयात सवैया,वर्णिक)
"सती वियोग मे भगवान महादेव जी की दशा का वर्णन"
"भवानी बिना आज कैलाश सूना" 
भवानी बिना आज कैलाश सूना,सती नाम लेके महादेव रोते।
करें याद सारी पुरानी कहानी,जली है सती सोच नैना भिगोते।।
हिया में सदा वो समाई हुई है, प्रिया सोच में नाथ आनंद खोते।
न जागें न सोयें न पीयें न खायें, गणों संग रोते मृगा मोर तोते।।1।। 

जटा जूट का भी नहीं ध्यान कोई, पुरारी लगें ज्यों गवायें हुए हैं।
जहाँ शंभु जाते सती साथ होती, व्यथा भाव यादें सवाये हुए हैं।।
हमेशा सताती उन्हें याद प्यारी, महाशोक कैलाश छाये हुए हैं।
बिना प्राणप्यारी वृथा जिंदगानी, यही सोच बाबा, झंँवाये हुए हैं।।2।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

ई मंच फाउंडेशन की ओर से आयोजित आनलाइन कवि सम्मेलन मे कवरेज करने के लिए दैनिक भास्कर समूह का बहुत बहुत आभार। इस कवि सम्मेलन में मै व मेरी श्रीमती शोभामोहन श्रीवास्तव के साथ कवि श्री सुनिल पांडेय, श्री राकेश अग्रवाल और रोशन अग्रवाल जी ने भाग लिया।https://fb.watch/63gr45vKNQ/

(मंदारमाला छंद,वर्णिक)'जीवन झूठा मृत्यु सत्य है'

(मंदारमाला छंद,वर्णिक)
'जीवन झूठा मृत्यु सत्य है'

"आया बुलावा पिया के यहां से" 

आया बुलावा पिया के यहां से, सभी छोड़ देखो चली जा रही।
डोली सजाई गई बांस की है, सभी रो रहे आप मुस्का रही।।
लपेटी हुई लाल साड़ी लजीली, सितारा जड़ी वो पिया भा रही।
पीछे उदासी भरे लोग जाते, सजी खूब डोली दुखी ढा रही।।1।। 

माता पिता और रोये सहेली, सभी प्रीत वाले, दुःखी याद में।
संसार वाला पिया रो रहा है, छुपाते हुए अश्रु को बाद में।।
सूने पड़े गांव के गैल सारे, सभी व्यस्त तेरे ही संवाद में।।
यादें पुरानी तुम्हें चाहते जो, पुकारा करें वे सभी नाद में।।2।। 

डोली रूकाई गई घाट पे है, चिता काठ पे है लिटाई गई।
दावाग्नि प्यारे सगा ने लगाये, लिए प्यार सच्चे पिया की भई।।
हाड़ा जले काठ की आग जैसे, जले चामड़ी घास जैसे जई।
प्यारी दुलारी पिया से मिली है, भुला नेह नाते पुराने कई।।3।। 

मोहन श्रीवास्तव

गंगोदक सवैया(राधा रानी का कृष्ण वियोग)

(गंगोदक सवैया, वर्णिक छंद)
(राधारानी का कृष्ण वियोग)

"रो रही राधिका" 

रो रही राधिका श्याम की याद में, और कोई उसे है सुहाता नहीं।
है बनी बाँवरी चैन खो के लली, हास उल्लास आनंद भाता नहीं।।
अर्कजा तीर बैठी हुई सोचती, क्यों पिया पत्र संदेश आता नहीं।
प्रात से साँझ होती प्रतीक्षा घनी, आ रहे श्याम कोई बताता नहीं।।1।। 

होश खोये हुए नैन खोजे पिया, केश फैले घने नैन आँसू भरे।
भूख लागे नहीं प्यास जागे नहीं, जेठ से ताप में प्रेयसी यूँ जरे।।
नींद आती नहीं याद जाती नहीं, भोर होते नदी तीर जाया करे।
वेदना अंग में है समाई हुई, श्याम संदेश दे कौन पीड़ा हरे।।2।। 

गीत प्यारे सुहाने सुनी जो कभी, बाँसुरी श्याम की याद आती रही।, 
हाथ में हाथ लेके चली साथ जो, प्रेम सारा पिया पे लुटाती रही।।
बोलती ठोलती हैं सखी आज तो, नैन नीचे किये वो लजाती रही।
मौन साधे हुए बैन से नैन से, नित्य आँसू बहा के बुलाती रही।।3।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव