Sunday, 22 January 2023

मेरी गृह लक्ष्मी कवयित्री शोभामोहन श्रीवास्तव

मेरी गृह लक्ष्मी कवयित्री शोभामोहन श्रीवास्तव जी के साथ 

पुरानी यादें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में कवि सम्मेलन झीट गांव पाटन दुर्ग में मेरी श्रीमती शोभामोहन जी और कवि संजीव ठाकुर जी के साथ

"पुरानी यादें"
छत्तीसगढ़ के यशस्वी मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल जी के साथ एक कवि सम्मेलन में कवि आदरणीय संजीव ठाकुर जी, धर्मपत्नी कवयित्री शोभामोहन जी के साथ मैं और तत्कालीन सरपंच आदरणीय धर्मेंद्र कौशिक जी ग्राम झीट पाटन दुर्ग।

अवध में राम जी आए (विजात छंद)

"श्री राम भजन"
(विजात छंद) 
जय जय श्री राम 
अवध में राम जी आये, महा आनंद छाया है।
जली शुभज्योति नगरी भर, महल भी जगमगाया है।।

मधुर शहनाई की गुँजन,नगरवासी सुयश गाये।
अवध नगरी सजी सुंदर, ध्वजा तोरण हैं  लहराये।।
नए परिधान आभूषण, सभी ने दिव्य पाया है।
अवध में राम जी आये, महा आनंद छाया है।
जली शुभज्योति  नगरी भर, महल भी जगमगाया है।।१।।

खुशी में मग्न सब मइया, लिपट कर रो रही भारी।
बहा आंसू खुशी की सब, मिले रघुवर से नर नारी।।
खुशी से हो भरत पागल, चरण में सिर नवाया है।
अवध में राम जी आये, महा आनंद छाया है।
जली शुभ ज्योति नगरी भर, महल भी जगमगाया है।।२।।

सिया को गोद में लेकर, सभी मैया दुलारे हैं। 
लखन सिय राम तीनों को, अवधवासी निहारे हैं।।
उतारे आरती सारे, हिया में सुख समाया है।
अवध में राम जी आये, महा आनंद छाया है।
जली शुभ ज्योति नगरी भर, नगर भी जगमगाया है।।३।।

 कवि मोहन श्रीवास्तव

कृष्ण विरह (दोहे)

"कृष्ण विरह" (दोहे )
जय श्री राधे कृष्ण

जब से ब्रज को छोड़ के, आया मथुरा धाम।
राधा तेरी याद में, तरसूं आठों याम।।
जब देखूं जोड़े कहीं,हस मिलके बतियाय।
तब तब मेरे नैन में,आंसू भरि भरि जाय।।
प्रिया विरह में रात दिन,भूख लगे ना प्यास।
नैना आंसू पी रहे,मन है बहुत उदास।।
जैसे तैसे दिन कटे मगर,कटे नहि रात।
कण्ठ रूआंसा मन भरा,मुख निकसे नहि बात।।
ऋतु बसंत देता मुझे, बैरी बन संताप।
फगुनाई बहती हवा, भरती उर में ताप।।
चंद्र उजाले में तुझे,ढूंढे नैन चकोर।
विरह वेदना विकल हो,पिया बावरा तोर।।
बिना तुम्हारे राधिका,जीवन बज्र समान।
हर पल तेरी याद में,बुझा बुझा तन प्राण।।
 मोहन श्रीवास्तव

छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य मण्डल कवि सम्मेलन

विगत शनिवार "छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य मंडल" की आनलाइन काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता परमादरणीय गुरुदेव आचार्य अमर नाथ त्यागी जी ने की और शानदार मंच संचालन आदरणीय बड़े भाई प्रख्यात व्यंगकार श्री सुनील पांडेय जी की।। जिसमें सभी कवि व कवयित्रियों ने देशभक्ति और राष्ट्रवाद को मजबूत करने के लिए ओज भरी कविताएं पढ़ीं। जिसमें शोभामोहन और मुझे भी काव्य पाठ करने का अवसर मिला। नई दुनिया और अन्य पत्रिकाओं ने हैं दोनो की राष्ट्रवादी पंक्तियों को प्रमुखता से प्रकाशित किया उसके लिए आभार।

कवयित्री शोभामोहन श्रीवास्तव ने राष्ट्रवाद को मजबूत करती पंक्तियां पढ़ी।
जागो रे मेरे प्यारे, मां भारती के लाल
आराध्य तुम्हारे शंभु विष्णु
जग में तुम हो सबसे सहिष्णु।
अब फुफकारो बन शेषनाग
वक्षस्थल में धधकाओ आग।

कवि मोहन श्रीवास्तव ने भारत की महानता का गान किया।
राम कृष्ण बुद्ध जहां है जन्मे और हुए अवतार।
भारत माता की गोदी में, जनम मिले हर बार।।
सिंधु करे है पहरेदारी, बना हिमालय ढाल।
काश्मीर है मुकुट सरीखा, रहते सब खुशहाल।।

शनि स्तुति (विजात छंद)

"विजात छंद"
(शनि स्तुति)
जय जय शनि देव

लिए धनुबाण हाथों में, प्रभो शनिदेव जी प्यारे।
सुसज्जित दिव्य शस्त्रों से, बदन पर नीलपट डारे।।

दमकता कांतिमय मुखड़ा, कलेवर नील रंगी है। 
कहाते न्याय के अधिपति, भगत के परम संगी हैं।।
पिता रवि मातु छाया हैं, भगत के कष्ट सब टारें।
लिए धनुबाण हाथों में, प्रभो शनिदेव जी प्यारे।।१।।

सहचरी आठ पत्नी हैं, तुरंगी धामिनी ध्वजिनी।
अजा कंटकी कंकाली, कलहप्रिय देवि है महिषी।।
सवारी गिद्ध है उनकी, सभी के ताप प्रभु जारे।
लिए धनुबाण हाथों में, प्रभो शनिदेव जी प्यारे।।२।।

अराधक कृष्ण के सच्चे, ग्रहों के मुख्य हैं स्वामी।
अचानक रुष्ट होवें तो, बिगाड़े काम जगनामी।।
संँवारे काज भक्तों के, सदा शनिदेव रखवारे।
लिए धनुबाण हाथों में, प्रभो शनिदेव जी प्यारे।।३।।

कवि मोहन श्रीवास्तव

फोटो

आज जगत में गूंज रहा है

सरसी छंद 
"आज जगत में गूंज रहा है"

आज जगत में गूंज रहा है, जय जय जय श्रीराम।
भव्य भुवन निर्माण हो रहा,अवध पुरी सुखधाम।।

पांच सदी मे सनातनी के,जागे सोये भाग।
आज बुझी है धधक रही थी,सदियों से जो आग।।

मुगल लुटेरे राम भवन का,किये विकट विध्वंस।
लाखों हिन्दू मार काटकर, मिटा दिये थे वंश।।

मंदिर ऊपर मस्जिद गढ़कर, किये लुटेरे काम।
कार सेवकों ने कर डाला, उसका काम तमाम।।

रामभक्त बलिदान हुए जो,नमन करें हम आज।
सत्य सनातन की रक्षा में,सारा राम समाज।।

तंबू मे श्रीराम विराजित, देख दुखित सब लोग।
न्यायालय ने दिया फैसला, तभी बना संयोग।।

ऐसे शासक जन का हम पर,बहुत बड़ा उपकार।
जिनकी मेहनत और लगन से,हमें मिला उपहार।।

भगवा अपना विजय पताका, कलशा घर के द्वार।
दीपों से मन रही दिवाली, घर घर वंदनवार।।

कोटि कोटि सब रामभक्त को,मोहन करे प्रणाम्।
राम नाम के दिये जलाओ,अपने अपने धाम।।

आज जगत में गूंज रहा है, जय जय जय श्रीराम।
भव्य भुवन निर्माण हो रहा,अवध पुरी सुखधाम।।

मोहन श्रीवास्तव

छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य मण्डल में मेरी श्रीमती शोभामोहन श्रीवास्तव जी काव्य पाठ करती हुई

साहित्य सृजन संस्थान का आभार

वक्ता मंच का आभार

साहित्य सृजन संस्थान का बहुत बहुत आभार

वक्ता मंच और साहित्य सृजन संस्थान

Saturday, 21 January 2023

श्री राम तांडव स्तोत्र" भावानुवाद

 "श्री राम तांडव स्तोत्र" भावानुवाद

छन्द : पञ्चचामर




जटा समूह युक्त भाल दीर्घ है महामना,

अमर्ष लाल नेत्र से जटा बिखेर के विभो।

प्रचण्ड वेग के प्रहार रौद्र रूप काल सा, 

अराति छिन्न भिन्न झुण्ड मध्य शोभते प्रभो।।१।। 


विशाल सैन्य वानराधिराज युक्त उग्र हैं,

महान अस्त्र शस्त्र सज्य चाप त्रोण बाण हैं।

प्रचण्ड दैत्य सैन्य अग्निरूप राम सिन्धु हैं, 

अराति आर्तभाव याचना लगात त्राण हैं ।।२।। 


भुजा विशाल कंप ओष्ठ गात वृक्ष छाल है,

विदीर्ण शत्रु देह की महान कामना करें।।

प्रघोर रोष व्याप्त है सिया हरे दशानना,

धरे प्रचण्ड रूप राम दैत्य प्राण को हरे।।३।। 


अधर्मवृद्धि कामना करे कुमार्ग दैत्य ने,

कुकर्मनाश हेतु बाण श्रीनिवास छोड़ते।

हठी पयोधि सेतु बांध पार सैन्य को किये,

प्रमत्त यातुधान गर्व राघवेन्द्र तोड़ते।।४।। 


कटार खड्ग पाश आदि यातुधान धारते,

पटी हुई वसुंधरा विभत्स हाड़ मांँस से।

घिरे प्रभो कपीश झुण्ड रक्त से नहा रहे,

विदीर्ण दैत्य देह से पटी मही विनाश से।।५।। 


विशालदंष्ट्र कुंभकर्ण आदि वीर बाँकुरे,

अजेय दैत्य मेघनाद आदि रक्षते जिसे।

अभेद्य दुर्ग स्वर्ण लंक दिव्य अस्त्र से विंधे,

पहाड़ धूलि के समान राम क्रोध से पिसे।।६।। 


प्रसिद्ध सिद्ध चारणों व योगिराज आदि से,

सदैव भक्तवृंद के सुपुज्य आप हैं विभो।

शरीर शीश छिन्न-भिन्न भूमि में दशानना,

अराति सैन्य सर्वनाश आपने किया प्रभो।।७।। 


कराल रूप युक्त आप उग्र चाप धार के,

पड़े कपीश रीछ मोह में सभी अधार को।

बिभिषणादि से किये विचार शत्रुनाश को,

भजूं सदैव उर्मिलापती कनीष्ठ भ्रात को।।८।। 


ध्वजा कटार कुंत धार दास शत्रु सैन्य के,

विराट रौद्र रूप देख यत्र तत्र भागते।

विनाश प्राप्त हो रहे प्रघोर घोर युद्ध में,

अजेय राम रूप देख शत्रु प्राण त्यागते।।९।। 


प्रभा महान युक्त सर्व पुष्ट तुष्ट हैं किये,

विकार आदि से विरक्त भक्त कष्ट काटते।

कपीश सैन्य नाथ जी अधर्मनाश के लिए ,

परोपकार सृष्टि हेतु दिव्य देह धारते।।१०।। 


कटार खड्ग शूल भिंदिपाल तीर फावड़ा ,

कुठार आदि अस्त्र से प्रचण्ड दैत्य को हते।

विशाल चाप के दहाड़ शत्रु कान बेधते,

धरा अनंत प्राणहीन दैत्य देह से पटे।।११।। 


उदार देव हो प्रसन्न मोहना मनाय है,

समस्त दुर्गुणादि नष्ट को करो महाप्रभो।

भजो सप्रेम भाव से सभी दयालु राम को,

प्रह्लाद आदि दैत्यवृंद इंद्र पूज्य हे विभो।।१२।।

कवि मोहन श्रीवास्तव 

इति श्री भागवतानंद गुरुणा विरचिते श्री राघवेंद्र चरिते इंद्रादि देवगणैः कृतम श्री राम ताण्डव स्तोत्रम सम्पूर्णम।




Wednesday, 18 January 2023

"विजात छंद" (श्री हनुमान स्तुति) जय जय श्री राम

 "विजात छंद"


(श्री हनुमान स्तुति) जय जय श्री राम


लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।

हृदय सियराम की मूरत,सदा श्री राम उच्चारे।।


अतुल बलवान बजरंगी,सभी वेदों के हैं ज्ञाता।

पिता श्री वायु हैं उनके, लला की अंजनी माता।।

सियापति राम के सेवक,सदा संतो को हैं तारे।

लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।।१।।


परम विद्वान रिपु हंता,असुर दल मारने वाले।

मिटाते राम द्रोही को,भजन में विध्न जो डाले।।

भजे हनुमान जी को जो,सभी संकट प्रभो टारे।

लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।।२।।


जहां पर राम कीर्तन हो,वहां हनुमान जी आते।

सुनें प्रभु राम चर्चा को,कथा विश्राम पर जाते।।

अमर हैं देव कलयुग के,स्वयं को राम पर वारे।

लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।।३।।


लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।

हृदय सियराम की मूरत,सदा श्री राम उच्चारे।।


कवि मोहन श्रीवास्तव







"शिव रुद्राष्टकम स्तोत्र" भावानुवाद (भुजंगप्रयात सवैया)

 "शिव रुद्राष्टकम स्तोत्र" भावानुवाद 
(महाभुजंगप्रयात सवैया)
ISS ISS ISS ISS ISS ISS ISS ISS 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

प्रभो आप ब्रम्हांड के हो विधाता,
तुम्हें मैं महादेव माथा नवाऊंँ।
सभी रूप व्यापी तपस्वी यशस्वी,
तुम्हें वेदरूपी रिझाऊँ मनाऊंँ।।
सदा मोह से दूर दातार शंभू,
दिशावस्त्रधारी गुणातीत गाऊँ।
भजूँ आपका नाम दाता पुरारी,
महाकाल भैरौ सदा माथ नाऊँ।।१।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।


निराकार ओंकार के मूल स्वामी,
परे ज्ञान इंद्रीय वाणी प्रभो हो।।
महाकाल के काल स्वामी गुणी हो,
परे आप संसार से भी विभो हो।।२।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

लगे गात गौरीय नागेश जैसे,
करोड़ों प्रभो मीनकेतू लजाये।
गले सर्पमाला जटा शीशगंगा,
सदा माथ पे दूज चंदा सुहाये।।३।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।


हिले कान में कुंडलें दीर्घ नैना,
महादेव हो नीलकंठी दयालू।
गले मुंडमाला सभी के हितैषी,
भजूँ नित्य बाघाम्बरी हे कृपालू।।४।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

करोड़ों विवस्वान को हैं लजाते,
भजूंँ मैं सती के पती शूलधारी।
हरो व्याधि सारे महादेव भोले,
अजन्मा अखंडा प्रचण्डा पुरारी।।५।।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

परे आप स्वामी कला आदि से हो,
सभी सज्जनों को सदा मान देते।
हरो मोहमाया भजे आपको जो,
लुटा हर्ष से ज्ञान सम्मान देते।।६।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

भजे आपको जो नहीं हे कपाली,
जरे ताप में वो नहीं शांति पाये ।
सभी जीव में आपका वास स्वामी,
सदा आप संतुष्ट होना सहाये।।७।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

नहीं जानता योग पूजा पिनाकी,
तुम्हें सर्वदा नाथ माथा नवाऊँ।
बुढ़ापा तथा जन्म के चक्करों के,
दुखों के महादेव मैं पार पाऊंँ।।८।। 
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।

किए प्रार्थना विप्र जो शंभु से हैं ,
महादेव संतुष्ट होके सहाए।
करे भक्त जो पाठ रुद्राष्टकम का,
सदा शंभु आशीष वो भक्त पाए।।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।
करूं अर्चना वंदना हे पुरारी।।9।।

कवि मोहन श्रीवास्तव





#भिक्षा_यात्रा 🙏🏻


 #भिक्षा_यात्रा 🙏🏻


कृपया सभी सनातनी भाई बहन स्वामी दीपांकर जी की भिक्षा यात्रा में जुडें। 


नहीं मांगते अन्न धन्न दौलत, जगा रहे जाकर हर द्वार।

नाम है स्वामी दीपांकर जी, जोड़ रहे बिखरा परिवार।।1।।

भिक्षा मांग रहा सन्यासी, नगर डगर में लगा पुकार।

सनातनी तुम इक हो जाओ, जाति पाति की तोड़ दीवार।।2।।


देश धर्म के रक्षक बनकर आए युग ऋषि संत महान।

इनको पूर्ण समर्थन देकर ,हम सबको देना है मान।।3।।


हमको ताकत देने आए,सब मिल देना पूरा साथ।

भिक्षा यात्रा सफल बनाने,हिंदू सभी बढ़ाओ हाथ।।4।।


कवियों लिखो गायकों गाओ, स्वयंसेवियों करो प्रचार।

करो प्रकाशित भिक्षा यात्रा , पत्रकार से करूं गुहार।।5।।

कवि मोहन श्रीवास्तव


#भिक्षा_यात्रा जय हो सनातन धर्म की 🚩

पण्डित सुंदर लाल शर्मा

पण्डित सुंदर लाल शर्मा 

(सरसी छंद)


त्याग तपस्या के थे मूरत, पंडित सुंदर लाल ।

छत्तीसगढ़ दाई के गोदी, को कर गए निहाल ।।


पंडित जी का महलनुमा घर, चमसुर नामक गाँव ।

धन दौलत की कमी नहीं थी, महानदी की छाँव ।।


खेत सैकड़ों एकड़ जिसमें, आम जाम के बाग ।

पंक्षी तोता मैना कोयल, मिलकर छेड़ें राग ।।


सोन अंगूठी सदा पहनते, सोना जड़ित लिबास ।

घर में रहकर किये पढ़ाई, काशी गुरु से खास ।।


छंदबद्ध कविताएं लिखते, उनका हृदय उदार ।

कई बार वे जेल गए थे, पर ना माने हार ।।


रचे दान लीला पंडित जी, जिसमें गोपी श्याम ।

प्रेम भक्ति का मिश्रण लिखकर, अमर कर गए नाम ।।


अव्वल नंबर के थे जिद्दी, जिद्द ही उनका पंथ ।

रात रात भर जाग जाग कर, लिखे अठारह ग्रंथ ।।


नये नये तकनीकों का वे, करते सदा प्रयोग ।

भब्य जलाशय बाँध बनाकर, करते थे उपयोग ।।


जौ गेहूं को पिसवाते थे, पनचक्की से आप ।

छुआछूत का भेद मिटाने, सहे बहुत संताप ।।


छत्तीसगढ़ में रोपा पद्धति, लाए थे श्रीमान ।

प्रगतिशील खेतिहर का उनको, मिला बड़ा सम्मान ।।


छुआछूत के घोर विरोधी, सब मेंं देखें राम ।

दलित प्रवेश कराए मंदिर, राजिम लोचन धाम ।।


अंग्रेजों ने जलकर थोपा, उसका किये विरोध ।

तब कंडेल गांव में जाकर, लिए उचित प्रतिशोध ।।


वस्तु स्वदेशी अपनाने को, बेचे संपत्ति खेत ।

आखिर मेंं कंगाल हो गए, राष्ट्र धर्म के हेत ।।


अंत समय मेंं दुर्दिन देखे, मगर न टूटे आप ।

हरि का सुमिरन करते करते, भोगे सब दुख ताप ।।


एक ही कुर्ता एक ही धोती, बचा हुआ था पास ।

सिल सिल कर उसे पहनते, जब निकला था श्वाँस ।।


ऋणी रहेगा भारत उनका, छत्तीसगढ़ की शान ।

करता है मोहन पग वंदन, सुंदर लाल महान ।।


त्याग तपस्या के थे मूरत, पंडित सुंदर लाल ।

छत्तीसगढ़ दाई के गोदी, को कर गए निहाल ।।


मोहन श्रीवास्तव


"अष्टपदी छंद" (वर्णिक) "शिव स्तुति" भगत जपत शिव शंकर, अभयंकर हे। अजर अमर अहि हार,जय जय शंभु हरे।।१।। शशिधर विषधर सुंदर, सुख सागर हे। हरि उर बसत गिरीश,जय जय शंभु हरे।।२।। अखिल जगत शिव पूजित, भव तारत हे। हरत जगत सब व्याधि,जय जय शंभु हरे।।३।। पितु गजवदन उमापति,प्रिय लागत हे। रतिपति हति गति देत, जय जय शंभु हरे।।४।। विपत हरत दुख टारत, खल मारत हे। सिर तव चरन नवात,जय जय शंभु हरे।।५।। प्रबल गरल गर धारत, दुःख टारत हे। अहिगन कर फुफकार, जय जय शंभु हरे।।६।। दिनकर हिमकर पावक, तव नैनन हे। विनय करत तव दास, जय जय शंभु हरे।।७।। विमल धवल तव मूरत, खुबसूरत हे। भजन करत दिन रात, जय जय शंभु हरे।।८।। कवि मोहन श्रीवास्तव

"शिव स्तुति" "विजात छंद" ISSS ISSS,ISSS ISSS लगाऊँ ध्यान भोले का, सदा जो राम को ध्याते। हृदय से भावपूरित हो, सदा गुनगान को गाते।। महादानी जटाधारी, जटा में पावनी गंगा। लिए त्रिशूल हाथों में, धरें हैं रूप अड़बंगा। लपेटे कंठ में विषधर, कलाधर माथ पे सोहे। भभूती तन रमा के वो, करोड़ों काम को मोहे।। बजाते नाथ डम डमरू, जिसे सुन पाप कट जाते। लगाऊँ ध्यान भोले का, सदा जो राम को ध्याते।। पहन कटि व्याघ्र की छाला, सवारी बैल की साजे। भवानी संगिनी भी है, सुशोभित अग्र में राजे।। लगे मनमोहिनी जोड़ी, सदा नंदी खड़ा द्वारे। मची है धूम मंदिर में, लगाते भक्त जय कारे ।। करें सब कामना पूरी, भगत जो शिव शरण आते। लगाऊँ ध्यान भोले का, सदा जो राम को ध्याते।। हृदय से भावपूरित हो, सदा गुनगान को गाते।। कवि मोहन श्रीवास्तव

(घनाक्षरी) "शिव वंदना" आदि देव महादेव,जिन्हें सेवें सभी देव, ऐसे भोलेनाथ जी का रूप तो निराला है। क्षण में होते प्रसन्न,भक्तों को करे धन्य, शिव नाम तमस में करता उजाला है।। सीस सोहे चंद्र गंग,भभूति रमाए अंग, पत्नी पार्वती देवी गणपति जी लाला हैं। हरि ध्यान करें हर,जगत की पीड़ा हर, कालों का भी महाकाल वो डमरू वाला है।। कवि मोहन श्रीवास्तव

Tuesday, 6 July 2021

(विधाता छंद)"मुक्तक" ‌चली बेटी विदा होके,घराना रो रहा देखो ।

"मुक्तक"(विधाता छंद)
‌(ISSS  ISSS    ISSS  ISSS)

चली बेटी विदा होके,घराना रो रहा देखो ।
लिपट कर रो रही है माँ,ठिकाना रो रहा देखो ।।
विदाई हो गई जब तो,जिसे पत्थर सभी समझे ।
पिता के नैन सागर का, मुहाना रो रहा देखो ।।

मोहन श्रीवास्तव

(शार्दूलविक्रीडितम् छंद" आया है नववर्ष आज अपना, उल्लास ढेरों यहाँ।

"शार्दूलविक्रीडितम् छंद" 

आया है नववर्ष आज अपना, उल्लास ढेरों यहाँ।
चारों ओर सुगंध वायु बहती, नाचे मयूरा महा।।
बूढ़े बाल युवा सभी मगन हैं, नारी सुता भी सभी।
बैठी कोयल डाल पे विटप के,बोली सुनाती जहाँ।।1।। 

आया चैत्र नवीन शुक्ल प्रथमा, आनंद छाने लगे।
चारों ओर खिले हुए पुहुप है, प्यारे सुहाने लगे।।
धानी पल्लव पेड़ पे सज रहे, सारे दिवाने लगे।
भौरें चूस रहे प्रसून रस को, आमोद पाने लगे।।2।। 

आई है नवरात्रि पावन महा, माँ को सभी पूजते।
घंटा शंख बजे सदा भवन में,चारों दिशा गूँजते।।
ज्वारा दीपक नीर युक्त कलशा, माता मनायें सभी।
काटे विघ्न सुखी करें जगत को,जो रोग से जूझते।।3।। 

मोहन श्रीवास्तव

(मेनका छंद वर्णिक)"हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे"

(मेनका छंद वर्णिक)

"हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे" 

हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे।
आपसी व्यौहार वाले, दूर से ही हैं भगें।। 

रोग है संसार छाया, है दवाओं की कमी।
काल गालों मे समाते, लोग चारों ओर ही ।।
मौत की चारों दिशा से, आ रहे संदेश है।
हैं डरे से लोग भारी, जो अभी भी शेष हैं ।।
नेह-नाते और पैसा, पास होके भी ठगें।
हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे।।1।। 

सावधानी से रहो जी, गेह में ही लाक हो।
दूर से ही हाथ जोड़ो, नाक पे ही मास्क हो।।
साबुनों से हाथ धोयें, स्वच्छता का ध्यान हो।
गर्म पानी भाप लेके, नित्य काढ़ा पान हो।।
बात सारी जानके भी, लोग जो भी ना जगें।
हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे।।2।। 

चेत जाओ देख लीला, जो रचाए राम जी।
अक्ल आई हो कहीं तो, लो उसी का नाम जी ।।
खेल खेला काल ने तो, पात से काँपे सभी।
और ज्यादा रौद्र होगी, जो नहीं चेते अभी।।
छोड़ सारी व्यर्थ बातें, राम चर्चा में पगें ।
हाय कोरोना बिमारी, काल के जैसे लगे।।3।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

(प्रमाणिका छंद वर्णिक) प्रणाम राम आपको

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  "प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।"
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("प्रमाणिका छंद"वर्णिक)
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लिए कमान चाप को।बुझाव आप ताप को।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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हरो समस्त पाप को। प्रणाम राम आपको।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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रमूँ महान नाम में। रहूँ कृपालु धाम में।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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समान शीत घाम में। रहूँ भरोस राम में ।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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प्रसून में पराग हैं। सितार चारु राग हैं।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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सुवास आप बाग हैं। मनोज नाश आग हैं।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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सरोज नेत्र सोहते। मुखारविन्द मोहते।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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विरक्त पंथ जोहते। समस्त दुष्ट को हते।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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जटा सजाय माथ में। सिया सदैव साथ में।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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विकास नाश हाथ में। सभी समाय नाथ में।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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अखंड हो निवासते। त्रिलोक को उजासते।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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प्रचंड दैत्य नाशते। उदार मंद हाँसते।।
प्रणाम राम आपको। प्रणाम राम आपको।।
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कवि मोहन श्रीवास्तव
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सृष्टि करे प्रतिकार है

"सृष्टि करे प्रतिकार है" 

धरती पर बढ़ गया आजकल, इतना पापाचार है।
पाप परायणता के कारण, सृष्टि करे प्रतिकार है।। 

पापों के फल को जाने बिन, जानबूझ कर पाप करें।
फिर अपनी गलती मानें बिन, पीछे बगुला जाप करें।।
धन पाने की विकट चाह में, भ्रात खून का प्यासा है।
छोटे से जीवन में पालें, अमर हेतु अभिलाषा है।।
मद्यपान कर कच्छ मच्छ ये, सारे दुष्टाहार हैं।
पाप परायणता के कारण, सृष्टि करे प्रतिकार है।।1।। 

दे गायों को नरक यातना, सब जीवों को मार रहे।
साधू संतो की हत्या कर, पागल से उन्माद बहे।।
देव मंदिरों की प्रतिमा को, खंड-खंड कर तोड़ रहे।
मात पिता की सेवा करने, से अपना मुख मोड़ रहे।।
ऐसों का ही श्राप मिला है, तब तो हाहाकार है।।
पाप परायणता के कारण, सृष्टि करे प्रतिकार है।। 
2।। 

करें कटाई नित पेड़ों की, जंगल सभी उजाड़ रहे।
दोहन करते नित्य भूमि का, पर्वत सीना फाड़ रहे।।
नदी तलाबों को अपने हित,धीरे धीरे पाट दिये।
सत्य सनातन को सदियों से, टुकड़े-टुकड़े बाट दिये।।
छोड़ बुराई करो भलाई, करती समय पुकार है।
पाप परायणता के कारण, सृष्टि करे प्रतिकार है।।3।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

(मेनका छंद) है पधारी ग्यानदेवी

"है पधारी ग्यान देवी"
(मेनका छंद "वर्णिक")

है पधारी ग्यान देवी, हाथ में वीणा धरे।
ग्यान का भंडार देके, भक्त की पीड़ा हरे।। 

हंस पे बैठी हुई है,  हाथ पोथी धार के।
श्वेत साड़ी है लपेटे, मोहिनी को डार के।। 

आसनी राजीव की है, कंठमाला मंजरी।
दे रही आशीष माता, जो पसारे अंजुरी।। 

लेखनी कोई उठाये, चेतना आलोक में।
दौड़ के आती विधाता, लोक से भू लोक में।। 

छोड़ के जो ईश चर्चा, व्यर्थ की बातें लिखे।
तो दुःखी होके विधात्री, क्रोध में जाती दिखे।। 

है पधारी ग्यान देवी, हाथ में वीणा धरे।
ग्यान का भंडार दे के, भक्त की पीड़ा हरे।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

("स्त्रग्धरा छंद" "वर्णिक")"शिव स्तुति""आई बारात द्वारे" हर हर महादेव

("स्त्रग्धरा छंद" "वर्णिक")
"शिव स्तुति"
"आई बारात द्वारे" हर हर महादेव

आई बारात द्वारे, हिम भवन यहाँ, लोग आमोद पायें।
कैलाशी हैं पधारे,डम डम डमरु, साथ में ले बजायें।।
नंदी पे है सवारी, जगतपति महा, शीस मौरा सजाये।
माथे पे चंद्र गंगा, हर हर करती, ध्वनि भारी सुहाये।।1।। 

बोली बोले अनोखे,  हर गण भुतहा, घोर लीला डरायें।
कोई नैना बिना है, मुख श्रवन नहीं, देख सारे परायें।।
ठाढ़े हैं देख बूढ़े, मन मन हंँसते, धीर धारो बतायें।
भोले के ये बराती, भवन मत भगो, व्याहने गौरि आये।।2।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

(उपेंद्रवज्रा छंद,वर्णिक)

(उपेंद्रवज्रा छंद,वर्णिक)

"काली स्तुति"
"महाकराली विकराल काली" 

महाकराली विकराल काली,कटार लेके लड़ने चली है।
निकाल जिव्हा गल मुंडमाला, निशाचरों को हनने चली है।। 

किये सवारी शवयान देखो, किरीटधारी धनु को चलाती।
गदा धरे है कर में भवानी, मलीन पापी दल को जलाती।। 

उदारदानी जय माँ भवानी, हरो सभी के दुःख दर्द सारे।
सिवा तुम्हारे जग में न कोई, रहें सदा ही मइया सहारे।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

वागीश्वरी सम्मान

देश की प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था वक्तामंच मानवता की सेवा और सम्मान के लिए प्रतिबद्ध संस्था है, जिसके द्वारा समाज के विविध विधाओं के सृजनकारों को सम्मानित करने की एक नैष्ठिक परम्परा चलायी जा रही हैं प्रतिभाओं का सम्मान किसी बढ़ते वृक्ष को खाद पानी देने और सेवा करने जैसा परम पावन कृत्य है । समाज में मनुष्यता और शुभता को प्रकाशित करने के लिए वक्तामंच का योगदान अतुलनीय है। वक्तामंच  के सभी समर्पित सेनानियों का शत् शत् वंदन हार्दिक अभिनंदन एवं "वागीश्वरी सम्मान" देने के लिए वक्ता मंच का बहुत बहुत आभार..

(महाभुजंग प्रयात सवैया,वर्णिक)"सती वियोग मे भगवान महादेव जी की दशा का वर्णन""भवानी बिना आज कैलाश सूना"

(महाभुजंग प्रयात सवैया,वर्णिक)
"सती वियोग मे भगवान महादेव जी की दशा का वर्णन"
"भवानी बिना आज कैलाश सूना" 
भवानी बिना आज कैलाश सूना,सती नाम लेके महादेव रोते।
करें याद सारी पुरानी कहानी,जली है सती सोच नैना भिगोते।।
हिया में सदा वो समाई हुई है, प्रिया सोच में नाथ आनंद खोते।
न जागें न सोयें न पीयें न खायें, गणों संग रोते मृगा मोर तोते।।1।। 

जटा जूट का भी नहीं ध्यान कोई, पुरारी लगें ज्यों गवायें हुए हैं।
जहाँ शंभु जाते सती साथ होती, व्यथा भाव यादें सवाये हुए हैं।।
हमेशा सताती उन्हें याद प्यारी, महाशोक कैलाश छाये हुए हैं।
बिना प्राणप्यारी वृथा जिंदगानी, यही सोच बाबा, झंँवाये हुए हैं।।2।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

ई मंच फाउंडेशन की ओर से आयोजित आनलाइन कवि सम्मेलन मे कवरेज करने के लिए दैनिक भास्कर समूह का बहुत बहुत आभार। इस कवि सम्मेलन में मै व मेरी श्रीमती शोभामोहन श्रीवास्तव के साथ कवि श्री सुनिल पांडेय, श्री राकेश अग्रवाल और रोशन अग्रवाल जी ने भाग लिया।https://fb.watch/63gr45vKNQ/

(मंदारमाला छंद,वर्णिक)'जीवन झूठा मृत्यु सत्य है'

(मंदारमाला छंद,वर्णिक)
'जीवन झूठा मृत्यु सत्य है'

"आया बुलावा पिया के यहां से" 

आया बुलावा पिया के यहां से, सभी छोड़ देखो चली जा रही।
डोली सजाई गई बांस की है, सभी रो रहे आप मुस्का रही।।
लपेटी हुई लाल साड़ी लजीली, सितारा जड़ी वो पिया भा रही।
पीछे उदासी भरे लोग जाते, सजी खूब डोली दुखी ढा रही।।1।। 

माता पिता और रोये सहेली, सभी प्रीत वाले, दुःखी याद में।
संसार वाला पिया रो रहा है, छुपाते हुए अश्रु को बाद में।।
सूने पड़े गांव के गैल सारे, सभी व्यस्त तेरे ही संवाद में।।
यादें पुरानी तुम्हें चाहते जो, पुकारा करें वे सभी नाद में।।2।। 

डोली रूकाई गई घाट पे है, चिता काठ पे है लिटाई गई।
दावाग्नि प्यारे सगा ने लगाये, लिए प्यार सच्चे पिया की भई।।
हाड़ा जले काठ की आग जैसे, जले चामड़ी घास जैसे जई।
प्यारी दुलारी पिया से मिली है, भुला नेह नाते पुराने कई।।3।। 

मोहन श्रीवास्तव

गंगोदक सवैया(राधा रानी का कृष्ण वियोग)

(गंगोदक सवैया, वर्णिक छंद)
(राधारानी का कृष्ण वियोग)

"रो रही राधिका" 

रो रही राधिका श्याम की याद में, और कोई उसे है सुहाता नहीं।
है बनी बाँवरी चैन खो के लली, हास उल्लास आनंद भाता नहीं।।
अर्कजा तीर बैठी हुई सोचती, क्यों पिया पत्र संदेश आता नहीं।
प्रात से साँझ होती प्रतीक्षा घनी, आ रहे श्याम कोई बताता नहीं।।1।। 

होश खोये हुए नैन खोजे पिया, केश फैले घने नैन आँसू भरे।
भूख लागे नहीं प्यास जागे नहीं, जेठ से ताप में प्रेयसी यूँ जरे।।
नींद आती नहीं याद जाती नहीं, भोर होते नदी तीर जाया करे।
वेदना अंग में है समाई हुई, श्याम संदेश दे कौन पीड़ा हरे।।2।। 

गीत प्यारे सुहाने सुनी जो कभी, बाँसुरी श्याम की याद आती रही।, 
हाथ में हाथ लेके चली साथ जो, प्रेम सारा पिया पे लुटाती रही।।
बोलती ठोलती हैं सखी आज तो, नैन नीचे किये वो लजाती रही।
मौन साधे हुए बैन से नैन से, नित्य आँसू बहा के बुलाती रही।।3।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

पर्यावरण मित्र सम्मान

आदरणीय राजेश पराते जी के कुशल नेतृत्व एवं कर्मठ सहयोगी आदरणीय शुभम साहू जी व वक्ता मंच के सभी पदाधिकारियों को नमन । जो मानवता की सेवा के लिए सदा समर्पित हैं। हमारे समाज को आज ऐसे ही मार्गदर्शी संस्थाओं की आवश्यकता है ।जो समाज को मानव कल्याण के लिए प्रेरित कर सके ।

वक्ता मंच अपने महान कर्मों के माध्यम से समाज मे सकारात्मक परिवर्तन सेवा व सम्मान करके अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर रही है ।ऐसे महान उद्देश्य वाली निःस्वार्थ सेवा भावी संस्था के सानिध्य मे हम स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
 पौध रोपण के हमारे लघु प्रयास को "पर्यावरण मित्र सम्मान"  से पुरष्कृत कर बल देने के लिए   वक्तामंच आपका हार्दिक आभार।

🌹🌹🙏🙏🙏🌹
मोहन श्रीवास्तव

मंदारमाला छंद वर्णिक

(मंदार माला छंद "वर्णिक") 

"ध्याऊँ भजूँ राम के नाम को मैं" 

ध्याऊँ भजूँ राम के नाम को  मै, हिया और कोई नहीं नाम है ।
गाऊँ बना गीत मैं राम जी के, नहीं गीत कोई बिना राम है।
छाये सभी में समाये सभी में, बिना राम के ना कोई धाम है।
सौदा हमारा सभी है अधूरा, बिना राम कोई नहीं दाम है।।1।। 

आकाश पाताल पृथ्वी सभी में, दिखे जो जहाँ भी नजारे वही ।
शीतांशु आदित्य नक्षत्र तारे, बनाते वही हैं उझारे वही ।।
ब्रह्मा महादेव लक्ष्मीविलासी, सभी जीव के तो सहारे वही।
ब्रह्मांड के ये सभी काज भक्तो, बिगाड़े वही हैं सवाँरे वही ।।2।। 

माता पिता पुत्र भाई सगे हैं, सखा कंत प्यारे सभी नाथ है।
ऐसा नहीं ठाँव कोई कहीं भी, जहाँ आप स्वामी नहीं साथ हैं।।
है जीव सारे खिलौने तुम्हारे, झुकाये सभी ने तुम्हें माथ हैं।
गाना गवाना जगाना सुलाना, हँसाना रुलाना प्रभो हाथ हैं।।3।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव

छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्यमंडल की 24सवीं काव्य गोष्ठी

विगत रविवार को आचार्य इंजीनियर श्री अमरनाथ त्यागी जी और श्री सुनील पांडेय जी के कुशल मंच संचालन में छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्यमंडल द्वारा आयोजित आन लाइन विशेष काव्यगोष्ठी का ऐतिहासिक आयोजन किया गया।जिसकी विशेषता यह रही कि यह छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य मंडल की 24सौंवी काव्यगोष्ठी थी। जिसमें मेरी श्रीमती  शोभामोहन श्रीवास्तव जी के साथ मुझे भी भाग लेने का अवसर मिला।

Saturday, 1 May 2021

स्त्रग्धरा छंद" "वर्णिक" "शिव स्तुति"


("स्त्रग्धरा छंद" "वर्णिक)
"शिव स्तुति"
"आई बारात द्वारे" 

आई बारात द्वारे, हिम भवन यहाँ, लोग आमोद पायें।
कैलाशी हैं पधारे,डम डम डमरु, साथ में ले बजायें।।
नंदी पे है सवारी, जगतपति महा, शीस मौरा सजाये।
माथे पे चंद्र गंगा, हर हर करती, ध्वनि भारी सुहाये।।1।। 

बोली बोले अनोखे,  हर गण भुतहा, घोर लीला डरायें।
कोई नैना बिना है, मुख श्रवन नहीं, देख सारे परायें।।
ठाढ़े हैं देख बूढ़े, मन मन में हंँसते, धीर धारो बतायें।
भोले के ये बराती, भवन मत भगो, व्याहने गौरि आये।।2।। 

कवि मोहन श्रीवास्तव












Thursday, 7 March 2019

‘’पाती सैनिक का पत्नी के नाम’’


( चौपाई छंद )

प्राण पिआरी दिल की रानी  | सदा सुहागिन होउ सयानी   ||
आज तेरी चिट्ठी क्या आई   |  याद मुझे सबकी है सताई  ||
वन्दवुं प्रथम बाबा अरु दादी | सीस झुकाऊँ मातु पिता जी  ||
कैसे हैं सब चाचा चाची     | बडकी मैया बड़े पिता जी   ||
गुडिया जैसी कैसी बहना    | आशिर्वाद उसे भी कहना    ||
भैया भाभी चरण मनाऊँ    | सिया राम जैसे गुण गाऊँ   ||
अनुज कहो कैसा है मेरा    | इहां उहां करता क्या फेरा    ||
करे पढाई मन से कहना    | पढ लिख कर फौजी है बनना ||
चन्ठ भतीजा और भतीजी   | कैसी है हम सबकी जीजी    ||
प्यारा बेटा प्यारी बेटी      | कैसे गांव गली अरु खेती     ||
बड़े दिनों में पाती पाया    | पढते पढते आंसू आया       ||
मै लिखता सनेह से पाती   | भरि आई लिखते मम छाती  ||
पिछली छुट्टी में घर आया  | खुशियाँ था भरपूर मनाया    ||
माँ के हाथों का वो खाना  | आंचल से मुझको दुलराना    ||
आती मुझको याद तिहारी  | भूल न पाऊँ तुमको प्यारी    ||
हर पल रखती ध्यान हमारा | अपना सब कुछ मुझ पर वारा ||
बात बात में वो इतराना    | मंद मंद तेरा मुसुकाना      ||
छाई थी तुमपे हरियाली    | होठों पे सजती थी लाली     ||
करती थी तुम नैन इशारे   | इक दूजे को सदा निहारे    ||
जाने का दिन जब था आया | आँखों ने आंसू छलकाया    ||
रो रो मेरी करी विदाई      | वारि बिना जिमि नदी सुहाई ||
वच्चों का रोना बिलखाना   | बापू जल्दी वापस आना     ||
गले लगाके मैया रोई      | बापू की आँखें थी खोई      ||
यूनिट में था जब मै आया  | सबने मिलकर गले लगाया   ||
मिलकर सबने बैग थे खोले  | भाभी ने क्या भेजा बोले    ||
जो भी था सब मिलके खाए  | आपस में सब खूब हँसाए   ||
और सुनाओ प्राण पिआरी    | लगे मोहिनी मोपर डारी    ||
जो जो मन्नत बचा तिहारा   | अबकी पूरा करना सारा    ||
छोटू का मुंडन है करना      | मन्नत का धागा है बधना  ||
सीमा पे अभी युद्ध की हलचल | रक्षा में रहते हम प्रतिपल  ||
सारा भारत परिवार हमारा    | मातृभूमि पे जीवन वारा    ||
छुट्टी मिलते ही आऊँगा      | सबकी खुशियाँ लौटाऊंगा    ||
छोटू का भी टैंक खिलौना    | बिटिया के गुडिया का गहना ||
और सभी का लीस्ट बनाया  | तेरे झुमके को बनवाया     ||
पत्र नही दिल इसको मानो  | बाँहों में मुझको हूँ जानो    ||
कभी नही रोना तुम प्यारी  | हर पल है आशिष हमारी    ||
पाती पढते पढते हलचल   | बाहर झांकी ठहर गया पल   ||
सैनिक गाड़ी द्वारे आई    | सहम गई कुछ बोल न पाई  ||
देखा इक शव उसमे आया  | जो है तिरंगे में लिपटाया    ||
भीड़ बड़ी द्वारे है मोहन     | रुक गइ जैसे सबकी धड़कन ||
पति पहिचानि के पिटहि छाती | पर धीरज मन में है लाती  ||
अजर अमर  हो पिया हमारे   | जोर जोर जय हिंद पुकारे  ||
अजर अमर  हो पिया हमारे   | जोर जोर जय हिंद पुकारे  ||

कवि मोहन श्रीवास्तव

30/03/2019
रचना क्रमांक :- ( 1173 )

           



Thursday, 22 November 2018

''संसार के आधार हैं वो '' हरिगीतिका छंद ( SSIS SSIS S SIS SSI S )


"संसार के आधार  हैं वो"
 हरिगीतिका छंद ( SSIS SSIS S  SIS SSI S )


संसार के आधार  हैं वो , ज्ञान के भंडार हैं | 
आकाश में पाताल  में , वो शांत पारावार हैं || 
ब्रह्माण्ड में हैं व्याप्त  सारे ,वेद के वो सार हैं  | 
औतार लेके तारते हैं , मोक्ष के ही द्वार हैं || 

सारे  जहाँ में वो समाये , बात ये भी मानिये | 
पाते सुखों को ध्या रहे जो , वो सभी में जानिये || . 
जो जान के अंजान होते , नाम लेते हैं नहीं | 
वो क्लेष पाते हैं सदा ही ,बात ये मानो सही || 

ब्रह्मा विष्णू वो ही त्रिधामा , देवता ये एक हैं | 
जो भी करे हैं ध्यान पूजा , ईश सारे एक हैं || 
लेते उन्हीं का नाम सारे , जान या अंजान में | 
पाते कृपा हैं नाथ के वो , हों किसी भी स्थान में || 

प्यारे दुलारे जीव सारे ,नाथ को जो मानते | 
माता पिता के रूप जैसे ,बालकों को पालते || 
जो छोड़ के सारा जमाना  , आपको ही ध्यानते | 
इच्छा सभी की पूर्ण होती  , आप ही  हैं साधते || 



कवि मोहन श्रीवास्तव 
रचना क्रमांक ;- ( 1126 )
23 . 11 . 2018