चाह नही मुझे ऐसी भेंट का, जब राहों में मैं फेंका जाऊं । मैं तो अपनी डाली में मस्त हूं, जहां हंसते हंसते मैं मर जाऊं ॥ ईनाम पुरष्कारों की नही चाह, जब नहीं मिले तो दुःख पाऊं । मैं तो अपनी डाली में मस्त हूं, जहां हंसते हंसते मैं मर जाऊं ॥ चाह मुझे उन अच्छे ईंषानों का, जिनके दिल मैं बस जाऊं । चाह मुझे उन सत्य पथिक का, जिनके चरणों में मैं चढ़ जाऊं ॥ चाह मुझे उन हवाओं का, जब मैं खुशबू उनके संग बिखराऊ । चाह मुझे भगवान के चरणों का, जहां हसते हसते मैं चढ़ जाऊं ॥ मोहन श्रीवास्तव (कवि)
Sunday, 22 January 2023
अवध में राम जी आए (विजात छंद)
कृष्ण विरह (दोहे)
छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य मण्डल कवि सम्मेलन
शनि स्तुति (विजात छंद)
आज जगत में गूंज रहा है
Saturday, 21 January 2023
श्री राम तांडव स्तोत्र" भावानुवाद
"श्री राम तांडव स्तोत्र" भावानुवाद
छन्द : पञ्चचामर
जटा समूह युक्त भाल दीर्घ है महामना,
अमर्ष लाल नेत्र से जटा बिखेर के विभो।
प्रचण्ड वेग के प्रहार रौद्र रूप काल सा,
अराति छिन्न भिन्न झुण्ड मध्य शोभते प्रभो।।१।।
विशाल सैन्य वानराधिराज युक्त उग्र हैं,
महान अस्त्र शस्त्र सज्य चाप त्रोण बाण हैं।
प्रचण्ड दैत्य सैन्य अग्निरूप राम सिन्धु हैं,
अराति आर्तभाव याचना लगात त्राण हैं ।।२।।
भुजा विशाल कंप ओष्ठ गात वृक्ष छाल है,
विदीर्ण शत्रु देह की महान कामना करें।।
प्रघोर रोष व्याप्त है सिया हरे दशानना,
धरे प्रचण्ड रूप राम दैत्य प्राण को हरे।।३।।
अधर्मवृद्धि कामना करे कुमार्ग दैत्य ने,
कुकर्मनाश हेतु बाण श्रीनिवास छोड़ते।
हठी पयोधि सेतु बांध पार सैन्य को किये,
प्रमत्त यातुधान गर्व राघवेन्द्र तोड़ते।।४।।
कटार खड्ग पाश आदि यातुधान धारते,
पटी हुई वसुंधरा विभत्स हाड़ मांँस से।
घिरे प्रभो कपीश झुण्ड रक्त से नहा रहे,
विदीर्ण दैत्य देह से पटी मही विनाश से।।५।।
विशालदंष्ट्र कुंभकर्ण आदि वीर बाँकुरे,
अजेय दैत्य मेघनाद आदि रक्षते जिसे।
अभेद्य दुर्ग स्वर्ण लंक दिव्य अस्त्र से विंधे,
पहाड़ धूलि के समान राम क्रोध से पिसे।।६।।
प्रसिद्ध सिद्ध चारणों व योगिराज आदि से,
सदैव भक्तवृंद के सुपुज्य आप हैं विभो।
शरीर शीश छिन्न-भिन्न भूमि में दशानना,
अराति सैन्य सर्वनाश आपने किया प्रभो।।७।।
कराल रूप युक्त आप उग्र चाप धार के,
पड़े कपीश रीछ मोह में सभी अधार को।
बिभिषणादि से किये विचार शत्रुनाश को,
भजूं सदैव उर्मिलापती कनीष्ठ भ्रात को।।८।।
ध्वजा कटार कुंत धार दास शत्रु सैन्य के,
विराट रौद्र रूप देख यत्र तत्र भागते।
विनाश प्राप्त हो रहे प्रघोर घोर युद्ध में,
अजेय राम रूप देख शत्रु प्राण त्यागते।।९।।
प्रभा महान युक्त सर्व पुष्ट तुष्ट हैं किये,
विकार आदि से विरक्त भक्त कष्ट काटते।
कपीश सैन्य नाथ जी अधर्मनाश के लिए ,
परोपकार सृष्टि हेतु दिव्य देह धारते।।१०।।
कटार खड्ग शूल भिंदिपाल तीर फावड़ा ,
कुठार आदि अस्त्र से प्रचण्ड दैत्य को हते।
विशाल चाप के दहाड़ शत्रु कान बेधते,
धरा अनंत प्राणहीन दैत्य देह से पटे।।११।।
उदार देव हो प्रसन्न मोहना मनाय है,
समस्त दुर्गुणादि नष्ट को करो महाप्रभो।
भजो सप्रेम भाव से सभी दयालु राम को,
प्रह्लाद आदि दैत्यवृंद इंद्र पूज्य हे विभो।।१२।।
इति श्री भागवतानंद गुरुणा विरचिते श्री राघवेंद्र चरिते इंद्रादि देवगणैः कृतम श्री राम ताण्डव स्तोत्रम सम्पूर्णम।
Wednesday, 18 January 2023
"विजात छंद" (श्री हनुमान स्तुति) जय जय श्री राम
"विजात छंद"
(श्री हनुमान स्तुति) जय जय श्री राम
लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।
हृदय सियराम की मूरत,सदा श्री राम उच्चारे।।
अतुल बलवान बजरंगी,सभी वेदों के हैं ज्ञाता।
पिता श्री वायु हैं उनके, लला की अंजनी माता।।
सियापति राम के सेवक,सदा संतो को हैं तारे।
लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।।१।।
परम विद्वान रिपु हंता,असुर दल मारने वाले।
मिटाते राम द्रोही को,भजन में विध्न जो डाले।।
भजे हनुमान जी को जो,सभी संकट प्रभो टारे।
लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।।२।।
जहां पर राम कीर्तन हो,वहां हनुमान जी आते।
सुनें प्रभु राम चर्चा को,कथा विश्राम पर जाते।।
अमर हैं देव कलयुग के,स्वयं को राम पर वारे।
लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।।३।।
लगा सिंदूर काया में, गदा को हाथ में धारे।
हृदय सियराम की मूरत,सदा श्री राम उच्चारे।।
कवि मोहन श्रीवास्तव
"शिव रुद्राष्टकम स्तोत्र" भावानुवाद (भुजंगप्रयात सवैया)
#भिक्षा_यात्रा 🙏🏻
#भिक्षा_यात्रा 🙏🏻
कृपया सभी सनातनी भाई बहन स्वामी दीपांकर जी की भिक्षा यात्रा में जुडें।
नहीं मांगते अन्न धन्न दौलत, जगा रहे जाकर हर द्वार।
नाम है स्वामी दीपांकर जी, जोड़ रहे बिखरा परिवार।।1।।
भिक्षा मांग रहा सन्यासी, नगर डगर में लगा पुकार।
सनातनी तुम इक हो जाओ, जाति पाति की तोड़ दीवार।।2।।
देश धर्म के रक्षक बनकर आए युग ऋषि संत महान।
इनको पूर्ण समर्थन देकर ,हम सबको देना है मान।।3।।
हमको ताकत देने आए,सब मिल देना पूरा साथ।
भिक्षा यात्रा सफल बनाने,हिंदू सभी बढ़ाओ हाथ।।4।।
कवियों लिखो गायकों गाओ, स्वयंसेवियों करो प्रचार।
करो प्रकाशित भिक्षा यात्रा , पत्रकार से करूं गुहार।।5।।
कवि मोहन श्रीवास्तव
#भिक्षा_यात्रा जय हो सनातन धर्म की 🚩
पण्डित सुंदर लाल शर्मा
पण्डित सुंदर लाल शर्मा
(सरसी छंद)
त्याग तपस्या के थे मूरत, पंडित सुंदर लाल ।
छत्तीसगढ़ दाई के गोदी, को कर गए निहाल ।।
पंडित जी का महलनुमा घर, चमसुर नामक गाँव ।
धन दौलत की कमी नहीं थी, महानदी की छाँव ।।
खेत सैकड़ों एकड़ जिसमें, आम जाम के बाग ।
पंक्षी तोता मैना कोयल, मिलकर छेड़ें राग ।।
सोन अंगूठी सदा पहनते, सोना जड़ित लिबास ।
घर में रहकर किये पढ़ाई, काशी गुरु से खास ।।
छंदबद्ध कविताएं लिखते, उनका हृदय उदार ।
कई बार वे जेल गए थे, पर ना माने हार ।।
रचे दान लीला पंडित जी, जिसमें गोपी श्याम ।
प्रेम भक्ति का मिश्रण लिखकर, अमर कर गए नाम ।।
अव्वल नंबर के थे जिद्दी, जिद्द ही उनका पंथ ।
रात रात भर जाग जाग कर, लिखे अठारह ग्रंथ ।।
नये नये तकनीकों का वे, करते सदा प्रयोग ।
भब्य जलाशय बाँध बनाकर, करते थे उपयोग ।।
जौ गेहूं को पिसवाते थे, पनचक्की से आप ।
छुआछूत का भेद मिटाने, सहे बहुत संताप ।।
छत्तीसगढ़ में रोपा पद्धति, लाए थे श्रीमान ।
प्रगतिशील खेतिहर का उनको, मिला बड़ा सम्मान ।।
छुआछूत के घोर विरोधी, सब मेंं देखें राम ।
दलित प्रवेश कराए मंदिर, राजिम लोचन धाम ।।
अंग्रेजों ने जलकर थोपा, उसका किये विरोध ।
तब कंडेल गांव में जाकर, लिए उचित प्रतिशोध ।।
वस्तु स्वदेशी अपनाने को, बेचे संपत्ति खेत ।
आखिर मेंं कंगाल हो गए, राष्ट्र धर्म के हेत ।।
अंत समय मेंं दुर्दिन देखे, मगर न टूटे आप ।
हरि का सुमिरन करते करते, भोगे सब दुख ताप ।।
एक ही कुर्ता एक ही धोती, बचा हुआ था पास ।
सिल सिल कर उसे पहनते, जब निकला था श्वाँस ।।
ऋणी रहेगा भारत उनका, छत्तीसगढ़ की शान ।
करता है मोहन पग वंदन, सुंदर लाल महान ।।
त्याग तपस्या के थे मूरत, पंडित सुंदर लाल ।
छत्तीसगढ़ दाई के गोदी, को कर गए निहाल ।।
मोहन श्रीवास्तव





