Friday, 17 August 2018

"हे अजातशत्रु अटल बिहारी जी "

"युग पुरुष अटल जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि" 

 हे अजातशत्रु अटल बिहारी जी 
शत शत बार नमन तुमको  |
भारत माता के सच्चे सपूत 
बारम्बार नमन तुमको  ||

अपने शासन काल के दिनों में 
तुमने जो करके दिखलाया था |
आजादी से अब तक ना कोई 
ऐसा तो कर पाया था ||

सत्य अहिंसा भाई चारे की 
नीति पे चलने वाले थे |
कटुता -शत्रुता भुला करके 
सबको साथ में लेके चलने वाले थे ||

हे युगपुरुष तुम चले गए 
छोड़ के इस भवसागर को |
अब प्रेम अमृत से कौन भरेगा 
भारत माता के गागर को ||

आशीष तुम्हारा हम सबको 
सदा सदा ही मिलता रहे |
भारत माता के  अनमोल पुष्प 
तू जनमानस में खिला रहे ||
भारत माता का अनमोल पुष्प 
तू जनमानस में खिला रहे ||

कवि मोहन श्रीवास्तव

  

Tuesday, 14 August 2018

"कालों के भी महाकाल भारत माता के लाल "


 आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की ढेर सारी  हार्दिक बधाई व् शुभ कामनाएं 

कालों के भी महाकाल भारत माता के लाल 
शत्रुओं के सीस काट काट आगे बढिये | 
थम जाये वैरी चाल कर दो बेहाल हाल 
रिपुओं  के शव पाट पाट आगे बढिये || 
चारों ओर उड़े धूल अरि जाएं राहभूल 
द्रोहियों को डांट डांट कर आगे बढिये | 
ऐसा करो प्रतिघात जल कर होवे खाक
वैरियों को मार मार लात आगे बढिये || 
 मोहन एवं  शोभामोहन श्रीवास्तव 

Monday, 13 August 2018

"वही होकर बड़े माँ - बाप को जख्मी किया करते"

उम्मीदों के भरोसे ही यहाँ पे सब जिया करते ,
सभी अपमान को सहकर जहर को भी पिया करते | 
बहुत अरमान से सब पालते हैं  अपने बच्चों को ,
वही होकर बड़े माँ - बाप को जख्मी किया करते || 

मोहन श्रीवास्तव ( कवि )
 

Saturday, 4 August 2018

"ऐसी करतूतों से गुलामी के आसार हैं "


"ऐसी करतूतों से गुलामी के आसार हैं "


काक जैसे कांव कांव ,स्वान जैसे भांव -भांव ,
गिद्ध जैसे संसद में करें ब्यवहार हैं | 
कुर्सी के नशे में चूर , जिम्मेदारियों से दूर ,
टांग खिंचने  में और बड़े होशियार हैं || 
 देश हित बात छोड़ , करें स्वार्थ गठजोड़ ,
ऐसे नेता भारत माता के लिए भार  हैं ||
वोटों के तो ये हैं ठग , देख रहा सारा जग ,
ऐसी करतूतों से गुलामी के आसार हैं || 

मोहन श्रीवास्तव ( कवि ) 

Sunday, 22 July 2018

"वर्षा ऋतु भाय रही हर मन "

वर्षा ऋतु भाय रही हर मन , उत्सव सी मनाय रही है धरा | 
बुँदे जिमि पायल सी रुनझुन , चहुँ ओर उड़ाय रहे बदरा  || 
मदमस्त हुए सब जीव बहुत , धरती लहराय रही अंचरा  | 
नव  अंकुर फूट रहे थल पे , दादुर अब देई रहे पहरा  || १|| 


कर ताल - तलाई रहे संगम , सरिता निज सिंधु समाय रही | 
नभ प्यास बुझाय रहा बसुधा , तरुवर से लता लिपटाय रही || 
बगियां में मोर है नाचि रहे , अरु कोयल गीत सुनाय  रही | 
जिनके हैं पिया  परदेश बसे , रही रही के वो अकुलाय रही || २|| 


कृषिराज जी खेती किसानी करें , जन ग्वालन धेनु चराय रहे | 
धान रोपाई करें सखियाँ अरु ,  बगुले नित ध्यान लगाय रहे  || 
हरियाली चारिहुँ ओर भई , दिनकर जी लुकाय छिपाय रहे | 
कभी मध्यम तेज बयार चले , तरु शाखा हिलाय डुलाय रहे || ३|| 


मृदंग बजाई रहे बादल , ईन्दर जी बिजुरी चमकाय रहे | 
छपरी जिनकी है टूट रही , रहि रहि के वो बिलखाय रहे || 
बरसे मेघा जबहीं दिन में , बस बैठि के सबही बिताय रहे | 
सब खाई रहे भजिया - गुझिया , अरु जोड़े तो खूब मोहाय रहे || ४ || 

मोहन श्रीवास्तव ( कवि )

रचना क्रमांक ;-1083 
22 / 07 /2018 , durg .c.g 
 

Tuesday, 17 July 2018

"तुमको निहारूं श्याम"

तुमको निहारूं श्याम , दिन - रात सुबो शाम ,
जिंदगी तो तेरी ही कहानी अब लगती | 
मूरतिया प्यारी तेरी , देखूं बस घड़ी घड़ी ,
तेरी हर बात ही , सुहानी अब लगती ||
गाल है गुलाबी तेरे , नैन हैं शराबी तेरे ,
मस्त रहूं मै  तो , मस्तानी अब लगती  | 
दरशन की है आस   , बुझती  नहीं है प्यास ,
मीरा जैसी मै  भी तो  दिवानी अब लगती ||१ ||

कानो के कुंडल तेरे , कटि करधनी घेरे ,
सुंदर श्रृंगार कर जग को रिझा रहे ।
बांसुरी की छेड़ तान ,नेह भरी मुस्कान ,
नारी ब्रजवासिनी को बावरी बना रहे । 
ग्वाल बाल जन संग ,गोपी संग रास रंग ,
मेरे हरि  लीला कर , सुख को लुटा रहे ।
सब के जीवन धन , रहे कर मनहरन ,
किसी को रूठा रहे तो किसी को मना रहे ।।२।

 
 



मोहन श्रीवास्तव ( कवि )