Wednesday, 31 October 2018

"आज पुकार रहे हम केशव"


मत्तगयंद छंद ( SII SII SII SII SII SII SII SS )

"आज पुकार रहे हम केशव"

आज पुकार रहे हम केशव , जाय छुपे कह हो  सुख      धामा | 
काज सवांरहु हे मनमोहन , आज पड़ा तुमसे बड़ कामा        || 
जाय रही अब लाज महाजन , आकर लाज रखो अभिरामा    | 
दीनदुखी हम स्वामि सखा तुम , नाथ तुम्ही मम पूरणकामा  || 1 || 

जाय छुड़ाय दियो गजराज कु , ग्राह्य धरा पद था  सुरधामा  | 
तारि दियो तुम गौतम नारि कु , पाहन थी पहुची पति धामा || 
चीर बढ़ाय दियो द्रुपदी  कर , लाज बची तबहीं गुणधामा      || 
मान कियो धन दानहु देकर , दीन दुखी फटहाल सुदामा || 2 || 

तारि दियो जिमि गीध अजामिल , नृसिंह रूप लिए अवतारा  | 
प्राण बचाय दियो प्रह्लाद कु , जाय उहां हिरण्याकश्यपु मारा || 
काज कियो नरसी कर माधव , भात  भराय दियो सुख सारा   || 
बालक ध्रुव करा तप साधन , लोक दियो खुश हो ध्रुव तारा   ||  3 || 

आनि पिलाय दयो बिष राजन , नाथ मिरा कर प्राण बचायो   |
बेर जुठे शबरी घर खाकर , दीनन को तुम मान   बढ़ायो       || 
गाय सके नहि वेद पुरानन , नाथ कृपा   जितनी       बरसायो | 
काज सवारहु श्याम पिया मम , आज तुम्ही पर आस लगायो ||  
काज सवारहु श्याम पिया मम , आज तुम्ही पर आस लगायो || 4 || 



कवि मोहन श्रीवास्तव 
रचना क्रमांक ;- ( 1123 )





Sunday, 21 October 2018

"भिन्न भिन्न ढेरों पंथ "

भिन्न भिन्न ढेरों पंथ , लिखे जा रहे हैं ग्रन्थ 
सब उसी परमेश का ही ध्यान करते | 
परमेश जो है एक , उसके रूप अनेक 
निज मति सब कोई गुणगान करते || 
यह है हमारा देव , वह है तुम्हारा देव 
जहाँ तहाँ सभी जन इसी पे हैं लड़ते | 
एक ही ईश्वर जान , सब उसकी संतान। 
फिर क्यूँ आपस में लड़ लड़ मरते || 
फिर क्यूँ आपस में लड़ लड़ मरते || 


कवि  मोहन श्रीवास्तव 

Tuesday, 9 October 2018

"महादेव शंभो पुकारा करेंगे "

भुजंग प्रयात छंद ( ISS  ISS  ISS ISS )


महादेव शंभो पुकारा करेंगे |
तुम्हारे बिना ना गुजारा करेंगे ||
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......

हरी ध्यान बाबा तुम्ही हो लगाते |
सभी के दुखों को सदा हो मिटाते ||
जटा शीश  गंगा तुम्ही हो समाते  |
दुखी लोग जो हैं गले से लगाते ||
बिहाने बिहाने उचारा करेंगे |
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......

भवानी करे ध्यान बाबा तुम्हारी |
इसी हेतु वो है तुम्हारी पियारी ||
अर्ध चंद सोहे गले सांप माला |
गणेशा व् कार्तिक दोनों उजाला ||
सुबो शाम भोले निहारा करेंगे |
 महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......

जटाजूट माथे सुहाना लगे है |
भभूती रमाये दिवाना लगे है ||
मदारी ,अनाड़ी ,कहे हैं पुरारी |
सदा लाज राखो तुम्ही त्रीपुरारी ||
सभी को आधारे उबारा करेंगे ||

महादेव शंभो पुकारा करेंगे |
तुम्हारे बिना ना गुजारा करेंगे ||
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......

कवि मोहन श्रीवास्तव 
 http://kavyapushpanjali.blogspot.com/2018/10/blog-post_9.html


रचना क्रमांक ;-( 1112 )
04/10/2018



Friday, 5 October 2018

"जब याद करें तब आँख भरे "

तोटक छंद
 (   I I S    I I S   I I S   I I S  )

जबसे तुमको हम ध्याय रहे ,
तब से जग मोह समान लगे |
हर जीव बिना तुम होत दुखी ,
सब ओर जहान मसान लगे || 

अब नाथ दया कर दो हमपे ,
सब छोड़ तुम्हे नित ध्यान करें |
बस आस तुम्ही पर हो गहरा ,
जब याद करें तब आंख भरें ||

धन दौलत की अब चाह नहीं ,
कहता जग क्या परवाह नही |
जन मानस जान सके न तुम्हें ,
तुम सागर हो तव थाह नही ||

हमसे यदि हो गलती फिर भी ,
तब नाथ हमें तुम माफ़ करो | 
मन में अभिमान जगे जब भी ,
अपराध क्षमा दिल साफ करो || 

हम दीन दुखी असहाय सुनो ,
तुम आदि अनादि अनंत पिया |
जग पे उपकार तुम्ही करते ,
तुमसे बढ़के न कहीं रसिया ||


जबसे तुमको हम ध्याय रहे ,
तब से जग मोह समान लगे |
हर जीव बिना तुम होत दुखी ,
सब ओर जहान मसान लगे || 

कवि मोहन श्रीवास्तव 
http://kavyapushpanjali.blogspot.com/2018/10/blog-post.html





Friday, 28 September 2018

मै व् मेरी श्रीमती कवयित्री शोभा मोहन श्रीवास्तव  जी काव्य पाठ  करते हुए 





Wednesday, 26 September 2018

'चरखे का बस गुणगान मत करिए '

देश को आजादी मिली , सबकी थी बांछे खिली 
चरखे का बस  गुणगान मत करिए |
बड़े बड़े वीरवर , देश पथ निछावर 
बलिदानियों का हीनमान मत करिए ||
 बाहरी लुटेरे थे जो , लूटने को घेरे थे जो 
उनका यहाँ पे सनमान मत  करिए |
सच्चा इतिहास अब , जानें  देशवासी सब 
झूठे इतिहास का बखान मत करिए ||

कवि मोहन श्रीवास्तव 


Tuesday, 11 September 2018

"श्री गणेश वंदना "

देवताओं में प्रथम ,सुमिर रहे हैं हम 
श्री गणेश आपका तो गुणगान करते | 
आओ आओ गजानन ,आपका मूसवाहन 
शिव सुत आपका हम आह्वान करते || 
विघ्न बाधा दूर करो ,कारज  को सिद्ध करो 
मंगलमूर्ति आपका सन्मान करते | 
बस आस आप पर ,निज दास जानकर 
हिरदे में आपको विराजमान करते || 

 कवि मोहन श्रीवास्तव