Monday, 26 September 2011

(भारत माता) परी हो तुम गुजरात की

परी हो तुम गुजरात की, रूप तेरा मद्रासी !
सुन्दरता कश्मिर की तुममे ,सिक्किम जैसा शर्माती !!

खान-पान पंजाबी जैसा, बंगाली जैसी बोली !
केरल जैसा आंख तुम्हारा ,है दिल तो तुम्हारा दिल्ली !!

महाराष्ट्र तुम्हारा फ़ैशन है, तो गोवा नया जमाना !
खुशबू हो तुम कर्नाटक कि,बल तो तेरा हरियाना !!

सिधी-सादी ऊड़ीसा जैसी,एम.पी जैसा मुस्काना !
दुल्हन तुम राजस्थानी जैसी ,त्रिपुरा जैसा इठलाना !!

झारखन्ड तुम्हारा आभूषण,तो मेघालय तुम्हारी बिन्दीया है  !
सीना तो तुम्हारा यू.पी है तो ,हिमांचल तुम्हारी निन्दिया है !!

कानों का कुन्डल छत्तीसगढ़ ,तो मिज़ोरम तुम्हारा पायल है !
बिहार गले का हार तुम्हारा ,तो आसाम तुम्हारा आंचल है !!

नागालैन्ड- आन्ध्र दो हाथ तुम्हारे, तो ज़ुल्फ़ तुम्हारा अरुणांचल है !
नाम तुम्हारा भारत माता, तो पवित्रता तुम्हारा ऊत्तरांचल है !!

सागर है परिधान तुम्हारा,तिल जैसे है दमन- द्वीव !
मोहित हो जाता है सारा जग,रहती हो तुम कितनी सजीव !!

अन्डमान और निकोबार द्वीप,पुष्पों का गुच्छ तेरे बालों में !
झिल-मिल,झिल-मिल से लक्षद्वीप, जो चमक रहे तेरे गालों में !!

ताज तुम्हारा हिमालय है ,तो गंगा पखारती चरण तेरे !
कोटि-कोटि हम भारत वासियों का ,स्वीकारो तुम नमन मेरे !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-११-१२-२००३
स्थान-नामक्कल(तमिलनाडु)                        




लेना है तो जीवन ले लो (महंगाई)


अन्तराष्ट्रीय किमतों की दुहाई देकर,
अब डीज़ल- पेट्रोल के दाम बढाए जाते !
बे कसूर भोली जनता पर ,
महंगाई का कफ़न चढाए जाते!!

इनकी किमतें बढने से ही,
वस्तूओं के दाम स्व्यम बढ जाते हैं!
इससे महंगाई पे फ़र्क नही पड़्ता,
ए हमे झूठी दिलाशा हैं दे जाते!!

इस आग उगलती महंगाई से,
लोगों का जीवन नर्क हुआ!
इन वोटों के सौदागरों से,
सब का बेड़ा गर्त हुआ!!

कोई कितना बज़ट बना के रखे,
पर ए भष्मासुर हैं बन जाते!
लोगों के सुनहरे सपनों को ,
ए पल भर में चौपट कर जाते!!

अब तो रहम करो हम पर,
अपने नाकामी का बोझ नही डालो!
लेना है तो जीवन ले लो,
तड़पा-तड़्पा के हमे नही मारो!!
                   मोहन श्रीवास्तव
                    ०२/०३/२०१० समय-१०.३० ए एम, सोमवार
                     रायपुर(छत्तीस गढ)

महंगाई

हर ईंषान आज दुखी है तो इसी लिये,
महंगाई रातों -रात कैसी बढ जाती है !
महंगाई से तो हो गया है बुरा हाल,
जईसे लगन मंडप से कभी दुल्हन भग जाती है !!

हर एक चीज मे है आग लगी हुई,
पानी मे भी आग नजर हमे आती है !
बज़ट बना के रखते पगार मिलने के पहले,
पर बज़ट मे किमतों से आग लग जाती है !!

खरीददारी करने घर से निकलते ही ,
हल्का सा मुस्कान चेहरे पे जाता है !
बाज़ार से वे जब वापस लौटते है,
सौ  वाट का बल्ब ज़ीरो नज़र आता है !!

लम्बी लिस्ट बनाये थे, बज़ार मे गये थे जब,
पत्नी के मेकप के, और बच्चों के भी कपड़े थे !
राशन और तेल मे ही बज़ट बिगड़ गया,
घर मे जब आये तो वो मुहं फ़ुलाए खड़े थे !!

रोज-रोज किमतों मे वृद्धि का हुआ असर,
आदमी की त्रिशंकु कि स्थिति बन जाती है !
घर-दफ़्तर-महंगाई के बीच फ़ंसा हुआ,
उसकी हालत एक मूर्ति सी रह जाती है !!

हर ईंषान आज.........

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
१५//९४ ,१०.४५ पी.एम बुद्धवार
खापरी, नागपुर