Monday, 26 September 2011

महंगाई

हर ईंषान आज दुखी है तो इसी लिये,
महंगाई रातों -रात कैसी बढ जाती है !
महंगाई से तो हो गया है बुरा हाल,
जईसे लगन मंडप से कभी दुल्हन भग जाती है !!

हर एक चीज मे है आग लगी हुई,
पानी मे भी आग नजर हमे आती है !
बज़ट बना के रखते पगार मिलने के पहले,
पर बज़ट मे किमतों से आग लग जाती है !!

खरीददारी करने घर से निकलते ही ,
हल्का सा मुस्कान चेहरे पे जाता है !
बाज़ार से वे जब वापस लौटते है,
सौ  वाट का बल्ब ज़ीरो नज़र आता है !!

लम्बी लिस्ट बनाये थे, बज़ार मे गये थे जब,
पत्नी के मेकप के, और बच्चों के भी कपड़े थे !
राशन और तेल मे ही बज़ट बिगड़ गया,
घर मे जब आये तो वो मुहं फ़ुलाए खड़े थे !!

रोज-रोज किमतों मे वृद्धि का हुआ असर,
आदमी की त्रिशंकु कि स्थिति बन जाती है !
घर-दफ़्तर-महंगाई के बीच फ़ंसा हुआ,
उसकी हालत एक मूर्ति सी रह जाती है !!

हर ईंषान आज.........

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
१५//९४ ,१०.४५ पी.एम बुद्धवार
खापरी, नागपुर
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