Thursday, 22 November 2018

''संसार के आधार हैं वो '' हरिगीतिका छंद ( SSIS SSIS S SIS SSI S )


"संसार के आधार  हैं वो"
 हरिगीतिका छंद ( SSIS SSIS S  SIS SSI S )


संसार के आधार  हैं वो , ज्ञान के भंडार हैं | 
आकाश में पाताल  में , वो शांत पारावार हैं || 
ब्रह्माण्ड में हैं व्याप्त  सारे ,वेद के वो सार हैं  | 
औतार लेके तारते हैं , मोक्ष के ही द्वार हैं || 

सारे  जहाँ में वो समाये , बात ये भी मानिये | 
पाते सुखों को ध्या रहे जो , वो सभी में जानिये || . 
जो जान के अंजान होते , नाम लेते हैं नहीं | 
वो क्लेष पाते हैं सदा ही ,बात ये मानो सही || 

ब्रह्मा विष्णू वो ही त्रिधामा , देवता ये एक हैं | 
जो भी करे हैं ध्यान पूजा , ईश सारे एक हैं || 
लेते उन्हीं का नाम सारे , जान या अंजान में | 
पाते कृपा हैं नाथ के वो , हों किसी भी स्थान में || 

प्यारे दुलारे जीव सारे ,नाथ को जो मानते | 
माता पिता के रूप जैसे ,बालकों को पालते || 
जो छोड़ के सारा जमाना  , आपको ही ध्यानते | 
इच्छा सभी की पूर्ण होती  , आप ही  हैं साधते || 



कवि मोहन श्रीवास्तव 
रचना क्रमांक ;- ( 1126 )
23 . 11 . 2018 


Monday, 19 November 2018

"राम जी का नाम लेके"गीतिका छंद ( SISS SISS SISS SIS )


"राम जी का नाम लेके"
गीतिका छंद ( SISS  SISS   SISS SIS )


राम जी का नाम लेके , काम सारे कीजिये | 
जागते सोते सदा ही , नाम प्यारे लीजिये || 
राम ही  प्यारे सभी को ,राम ही हैं  तारते  | 
राम ही हैं प्राण देते ,    राम ही संहारते     || 

राम छंदातीत हैं तो ,    राम प्यारे मीत हैं  |  
राम कालातीत हैं तो ,    राम मेरे  गीत हैं || 
राम ही सारा जहाँ हैं ,  राम ही ब्रह्माण्ड हैं | 
राम ही दाता विधाता ,    वो सवेरे चाँद हैं || 

राम जी का काम ही है ,प्राणियों को तारना | 
हार के भी जीत देते ,   ये सदा ही मानना  || 
हो धनी या हो भिखारी  , रंक राजा और हो | 
राम की पाते कृपा ही  ,  या कसाई चोर हो || 

राम को जो जान लेते ,    दास हैं वो राम के  | 
काटते बाधा सभी के  ,    आसरे जो राम के  || 
राम जी संसार के हैं ,      बाप सारे जानिये   | 
ध्यान सेवा राम का हो , राम को ही मानिये ||

राम जी का नाम लेके , काम सारे कीजिये | 
जागते सोते सदा ही , नाम प्यारे लीजिये || 


कवि  मोहन श्रीवास्तव 
रचना क्रमांक :- (११२५ ) 


Wednesday, 14 November 2018

''हे वीर तुम रणधीर हो'' ( मधुमालती छंद )

"हे वीर तुम रणधीर हो"
( मधुमालती छंद )

हे वीर तुम रणधीर हो | 
चलते रहो  रणवीर हो || 
माँ भारती के हीर हो  | 
रिपु के लिये यमतीर हो || 

भुज बंध पर अभिमान हो | 
बस जीत ही अरमान हो || 
हित देश बस यह प्राण हो || 
निज वतन पर बलिदान हो || 

जयचंद दल पहचान हो | 
उनकी जगह शमसान हो || 
बलवंत तुम गुणवान हो  | 
अरि वक्ष लहू लोहान हो || 

माँ भारती के लाल हो | 
तुम दुश्मनों के काल हो || 
हम सभी के तुम ढाल हो | 
रण में सदा बेताल हो || 

अरि लहू की नित प्यास हो | 
श्री विजय की बस आस हो || 
धैर्य सदा तव पास हो | 
माँ भारती के दास हो || 

जय हिन्द की ललकार हो | 
सदा वैरियों पे प्रहार हो || 
निज हाथ में औजार हो | 
दिन रात ही जयकार हो || 
हे वीर तुम रणधीर हो | 
चलते रहो  रणवीर हो || 
माँ भारती के हीर हो  | 
रिपु के लिये यमतीर हो || 


कवि  मोहन श्रीवास्तव 

रचना क्रमांक :- ( 1124 )

Wednesday, 31 October 2018

"आज पुकार रहे हम केशव"


मत्तगयंद छंद ( SII SII SII SII SII SII SII SS )

"आज पुकार रहे हम केशव"

आज पुकार रहे हम केशव , जाय छुपे कह हो  सुख      धामा | 
काज सवांरहु हे मनमोहन , आज पड़ा तुमसे बड़ कामा        || 
जाय रही अब लाज महाजन , आकर लाज रखो अभिरामा    | 
दीनदुखी हम स्वामि सखा तुम , नाथ तुम्ही मम पूरणकामा  || 1 || 

जाय छुड़ाय दियो गजराज कु , ग्राह्य धरा पद था  सुरधामा  | 
तारि दियो तुम गौतम नारि कु , पाहन थी पहुची पति धामा || 
चीर बढ़ाय दियो द्रुपदी  कर , लाज बची तबहीं गुणधामा      || 
मान कियो धन दानहु देकर , दीन दुखी फटहाल सुदामा || 2 || 

तारि दियो जिमि गीध अजामिल , नृसिंह रूप लिए अवतारा  | 
प्राण बचाय दियो प्रह्लाद कु , जाय उहां हिरण्याकश्यपु मारा || 
काज कियो नरसी कर माधव , भात  भराय दियो सुख सारा   || 
बालक ध्रुव करा तप साधन , लोक दियो खुश हो ध्रुव तारा   ||  3 || 

आनि पिलाय दयो बिष राजन , नाथ मिरा कर प्राण बचायो   |
बेर जुठे शबरी घर खाकर , दीनन को तुम मान   बढ़ायो       || 
गाय सके नहि वेद पुरानन , नाथ कृपा   जितनी       बरसायो | 
काज सवारहु श्याम पिया मम , आज तुम्ही पर आस लगायो ||  
काज सवारहु श्याम पिया मम , आज तुम्ही पर आस लगायो || 4 || 



कवि मोहन श्रीवास्तव 
रचना क्रमांक ;- ( 1123 )





Sunday, 21 October 2018

"भिन्न भिन्न ढेरों पंथ "

भिन्न भिन्न ढेरों पंथ , लिखे जा रहे हैं ग्रन्थ 
सब उसी परमेश का ही ध्यान करते | 
परमेश जो है एक , उसके रूप अनेक 
निज मति सब कोई गुणगान करते || 
यह है हमारा देव , वह है तुम्हारा देव 
जहाँ तहाँ सभी जन इसी पे हैं लड़ते | 
एक ही ईश्वर जान , सब उसकी संतान। 
फिर क्यूँ आपस में लड़ लड़ मरते || 
फिर क्यूँ आपस में लड़ लड़ मरते || 


कवि  मोहन श्रीवास्तव 

Tuesday, 9 October 2018

"महादेव शंभो पुकारा करेंगे "

भुजंग प्रयात छंद ( ISS  ISS  ISS ISS )


महादेव शंभो पुकारा करेंगे |
तुम्हारे बिना ना गुजारा करेंगे ||
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......

हरी ध्यान बाबा तुम्ही हो लगाते |
सभी के दुखों को सदा हो मिटाते ||
जटा शीश  गंगा तुम्ही हो समाते  |
दुखी लोग जो हैं गले से लगाते ||
बिहाने बिहाने उचारा करेंगे |
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......

भवानी करे ध्यान बाबा तुम्हारी |
इसी हेतु वो है तुम्हारी पियारी ||
अर्ध चंद सोहे गले सांप माला |
गणेशा व् कार्तिक दोनों उजाला ||
सुबो शाम भोले निहारा करेंगे |
 महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......

जटाजूट माथे सुहाना लगे है |
भभूती रमाये दिवाना लगे है ||
मदारी ,अनाड़ी ,कहे हैं पुरारी |
सदा लाज राखो तुम्ही त्रीपुरारी ||
सभी को आधारे उबारा करेंगे ||

महादेव शंभो पुकारा करेंगे |
तुम्हारे बिना ना गुजारा करेंगे ||
महादेव शंभो पुकारा करेंगे.......

कवि मोहन श्रीवास्तव 
 http://kavyapushpanjali.blogspot.com/2018/10/blog-post_9.html


रचना क्रमांक ;-( 1112 )
04/10/2018



Friday, 5 October 2018

"जब याद करें तब आँख भरे "

तोटक छंद
 (   I I S    I I S   I I S   I I S  )

जबसे तुमको हम ध्याय रहे ,
तब से जग मोह समान लगे |
हर जीव बिना तुम होत दुखी ,
सब ओर जहान मसान लगे || 

अब नाथ दया कर दो हमपे ,
सब छोड़ तुम्हे नित ध्यान करें |
बस आस तुम्ही पर हो गहरा ,
जब याद करें तब आंख भरें ||

धन दौलत की अब चाह नहीं ,
कहता जग क्या परवाह नही |
जन मानस जान सके न तुम्हें ,
तुम सागर हो तव थाह नही ||

हमसे यदि हो गलती फिर भी ,
तब नाथ हमें तुम माफ़ करो | 
मन में अभिमान जगे जब भी ,
अपराध क्षमा दिल साफ करो || 

हम दीन दुखी असहाय सुनो ,
तुम आदि अनादि अनंत पिया |
जग पे उपकार तुम्ही करते ,
तुमसे बढ़के न कहीं रसिया ||


जबसे तुमको हम ध्याय रहे ,
तब से जग मोह समान लगे |
हर जीव बिना तुम होत दुखी ,
सब ओर जहान मसान लगे || 

कवि मोहन श्रीवास्तव 
http://kavyapushpanjali.blogspot.com/2018/10/blog-post.html





Friday, 28 September 2018

मै व् मेरी श्रीमती कवयित्री शोभा मोहन श्रीवास्तव  जी काव्य पाठ  करते हुए 





Wednesday, 26 September 2018

'चरखे का बस गुणगान मत करिए '

देश को आजादी मिली , सबकी थी बांछे खिली 
चरखे का बस  गुणगान मत करिए |
बड़े बड़े वीरवर , देश पथ निछावर 
बलिदानियों का हीनमान मत करिए ||
 बाहरी लुटेरे थे जो , लूटने को घेरे थे जो 
उनका यहाँ पे सनमान मत  करिए |
सच्चा इतिहास अब , जानें  देशवासी सब 
झूठे इतिहास का बखान मत करिए ||

कवि मोहन श्रीवास्तव 


Tuesday, 11 September 2018

"श्री गणेश वंदना "

देवताओं में प्रथम ,सुमिर रहे हैं हम 
श्री गणेश आपका तो गुणगान करते | 
आओ आओ गजानन ,आपका मूसवाहन 
शिव सुत आपका हम आह्वान करते || 
विघ्न बाधा दूर करो ,कारज  को सिद्ध करो 
मंगलमूर्ति आपका सन्मान करते | 
बस आस आप पर ,निज दास जानकर 
हिरदे में आपको विराजमान करते || 

 कवि मोहन श्रीवास्तव



Thursday, 30 August 2018

"चारों तरफ तामसी, प्रबृति का बोलबाला "

चारों तरफ तामसी, प्रबृति का बोलबाला 
असुर समान इंसान आज हो रहे | 
जीवहत्या नशाखोरी , पापकर्म , बेईमानी 
बुरे कर्मों का बीज सब जगह बो रहे || 
नारियों पे अत्याचार, रोज होते बलात्कार 
बेटियों को गर्भ में ही आज लोग खो रहे | 
पाप कर्म देख देख, और कुरूप वेष 
सीधे सादे इंसानों के दिल तो आज रो रहे || 

कवि मोहन श्रीवास्तव 

Friday, 24 August 2018

"कालिका कराल काल, गले नर मुण्डमाल "

कालिका कराल काल, गले नर मुण्डमाल 
करती रुधिर पान और अट्हास है | 
जिव्हा ज्वलिनी  ज्वाल, नयना हैं लाल लाल 
शत्रुओं का प्रतिपल करती विनाश है || 
भक्तों की करती जय, पापियों की करे क्षय 
रक्तबीज जैसों से बुझाती निज प्यास है | 
भक्तों के लिए है ढाल, वैरियों के लिए काल 
महाकाली हमको तो तुमपे ही आस है || 

कवि मोहन श्रीवास्तव

Friday, 17 August 2018

"हे अजातशत्रु अटल बिहारी जी "

"युग पुरुष अटल जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि" 

 हे अजातशत्रु अटल बिहारी जी 
शत शत बार नमन तुमको  |
भारत माता के सच्चे सपूत 
बारम्बार नमन तुमको  ||

अपने शासन काल के दिनों में 
तुमने जो करके दिखलाया था |
आजादी से अब तक ना कोई 
ऐसा तो कर पाया था ||

सत्य अहिंसा भाई चारे की 
नीति पे चलने वाले थे |
कटुता -शत्रुता भुला करके 
सबको साथ में लेके चलने वाले थे ||

हे युगपुरुष तुम चले गए 
छोड़ के इस भवसागर को |
अब प्रेम अमृत से कौन भरेगा 
भारत माता के गागर को ||

आशीष तुम्हारा हम सबको 
सदा सदा ही मिलता रहे |
भारत माता के  अनमोल पुष्प 
तू जनमानस में खिला रहे ||
भारत माता का अनमोल पुष्प 
तू जनमानस में खिला रहे ||

कवि मोहन श्रीवास्तव

  

Tuesday, 14 August 2018

"कालों के भी महाकाल, भारत माता के लाल "




कालों के भी महाकाल, भारत माता के लाल 
शत्रुओं के सीस काट काट आगे बढिये | 
थम जाये वैरी चाल, कर दो बेहाल हाल 
रिपुओं  के शव पाट पाट आगे बढिये || 
चारों ओर उड़े धूल, अरि जाएं राहभूल 
द्रोहियों को डांट डांट कर आगे बढिये | 
ऐसा करो प्रतिघात, जल कर होवे खाक
वैरियों को मार मार लात आगे बढिये || 
 मोहन  श्रीवास्तव 

Monday, 13 August 2018

"वही होकर बड़े माँ - बाप को जख्मी किया करते"

उम्मीदों के भरोसे ही यहाँ पे सब जिया करते ,
सभी अपमान को सहकर जहर को भी पिया करते | 
बहुत अरमान से सब पालते हैं  अपने बच्चों को ,
वही होकर बड़े माँ - बाप को जख्मी किया करते || 

मोहन श्रीवास्तव ( कवि )
 

Saturday, 4 August 2018

"ऐसी करतूतों से गुलामी के आसार हैं "


"ऐसी करतूतों से गुलामी के आसार हैं "


काक जैसे कांव कांव ,स्वान जैसे भांव -भांव ,
गिद्ध जैसे संसद में करें ब्यवहार हैं | 
कुर्सी के नशे में चूर , जिम्मेदारियों से दूर ,
टांग खिंचने  में और बड़े होशियार हैं || 
 देश हित बात छोड़ , करें स्वार्थ गठजोड़ ,
ऐसे नेता भारत माता के लिए भार  हैं ||
वोटों के तो ये हैं ठग , देख रहा सारा जग ,
ऐसी करतूतों से गुलामी के आसार हैं || 

मोहन श्रीवास्तव ( कवि ) 

Sunday, 22 July 2018

"वर्षा ऋतु भाय रही हर मन "

वर्षा ऋतु भाय रही हर मन , उत्सव सी मनाय रही है धरा | 
बुँदे जिमि पायल सी रुनझुन , चहुँ ओर उड़ाय रहे बदरा  || 
मदमस्त हुए सब जीव बहुत , धरती लहराय रही अंचरा  | 
नव  अंकुर फूट रहे थल पे , दादुर अब देई रहे पहरा  || १|| 


कर ताल - तलाई रहे संगम , सरिता निज सिंधु समाय रही | 
नभ प्यास बुझाय रहा बसुधा , तरुवर से लता लिपटाय रही || 
बगियां में मोर है नाचि रहे , अरु कोयल गीत सुनाय  रही | 
जिनके हैं पिया  परदेश बसे , रही रही के वो अकुलाय रही || २|| 


कृषिराज जी खेती किसानी करें , जन ग्वालन धेनु चराय रहे | 
धान रोपाई करें सखियाँ अरु ,  बगुले नित ध्यान लगाय रहे  || 
हरियाली चारिहुँ ओर भई , दिनकर जी लुकाय छिपाय रहे | 
कभी मध्यम तेज बयार चले , तरु शाखा हिलाय डुलाय रहे || ३|| 


मृदंग बजाई रहे बादल , ईन्दर जी बिजुरी चमकाय रहे | 
छपरी जिनकी है टूट रही , रहि रहि के वो बिलखाय रहे || 
बरसे मेघा जबहीं दिन में , बस बैठि के सबही बिताय रहे | 
सब खाई रहे भजिया - गुझिया , अरु जोड़े तो खूब मोहाय रहे || ४ || 

मोहन श्रीवास्तव ( कवि )

रचना क्रमांक ;-1083 
22 / 07 /2018 , durg .c.g 
 

Tuesday, 17 July 2018

"तुमको निहारूं श्याम"

"आप सभी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभ कामनाएं"

तुमको निहारूं श्याम , दिन - रात सुबो शाम ,
जिंदगी तो तेरी ही कहानी अब लगती | 
मूरतिया प्यारी तेरी , देखूं बस घड़ी घड़ी ,
तेरी हर बात ही , सुहानी अब लगती ||
गाल है गुलाबी तेरे , नैन हैं शराबी तेरे ,
मस्त रहूं मै  तो , मस्तानी अब लगती  | 
दरशन की है आस   , बुझती  नहीं है प्यास ,
मीरा जैसी मै  भी तो  दिवानी अब लगती ||१ ||

कानो के कुंडल तेरे , कटि करधनी घेरे ,
सुंदर श्रृंगार कर जग को रिझा रहे ।
बांसुरी की छेड़ तान ,नेह भरी मुस्कान ,
नारी ब्रजवासिनी को बावरी बना रहे । 
ग्वाल बाल जन संग ,गोपी संग रास रंग ,
मेरे हरि  लीला कर , सुख को लुटा रहे ।
सब के जीवन धन , रहे कर मनहरन ,
किसी को रूठा रहे तो किसी को मना रहे ।।२।






मोहन श्रीवास्तव ( कवि )



Tuesday, 19 June 2018

"वो हैं भारत के हितैषी और हमराज सही"

वो हैं भारत के हितैषी और हमराज सही |
जिन्हें तिरंगा उठाने में कोई लाज नहीं ||  
वो हैं भारत के हितैषी............

पर  नमक हरामों से कह दो कहीं और जाएँ |
हिंदुस्तान में उनका है कोई काज नही ||
 वो हैं भारत के हितैषी............

नाम और धर्म बदलके जिसने लूटा है |
उन्हें अपना बनाने का यहाँ रिवाज नही ||
 वो हैं भारत के हितैषी............

हमें आपस में लड़ा करके जिसने राज किया |
वो हो सकते कभी भी सरताज नही ||
 वो हैं भारत के हितैषी............

वतन का खाते हैं और दुश्मनों का गाते हैं |
उन्हें डूब मरने में कोई भी देखो  लाज नही ||
 वो हैं भारत के हितैषी............

तमाम ऊम्र ही हमको अँधेरे में रखा |
कल और बात थी मोहन अब और आज नही ||

 वो हैं भारत के हितैषी और हमराज सही |
जिन्हें तिरंगा उठाने में कोई लाज नहीं ||  
वो हैं भारत के हितैषी............

मोहन श्रीवास्तव ( कवि )

रचना क्रमांक ;-(1077)
19-06-2018,उतई ,दुर्ग (छत्तीसगढ़)



 

Wednesday, 6 June 2018

"पर्यावरण को बचाना है तो"

पर्यावरण को बचाना है तो,
ढेरों वॄक्ष लगाना है !
शुद्ध हवा मे रहना है तो,
धरती को हरियाली बनाना है !!

आवो हर जगह पेड़ लगाए हम,
और जंगलों को काटना बंद करें !
अपनें संतानों जैसी उनकी सेवा कर,
उनके छावों मे रहकर आनंद करें !!

पेड़ों को देखो वे कितने अच्छे होते हैं,
जो हमे अपनी छावों मे रखते हैं !
अपने हरे-भरे पत्तों से ,
हमारे तन-मन को शीतल रखते हैं !!

हम जिनकी छावों मे रहते हैं,
उन्हें काटना ठीक नही !
जो हमको फ़ल देते हैं
उन्हें उखाड़ना ठीक नही !!

जंगली पेड़ों के साथ-साथ ,
हमे फ़लों के भी वॄक्ष लगाना है !
हरे-भरे बाग -बगिचों से ,
अपने भारत को सुंदर बनाना है !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)

www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक- २८/०५/२०००,रविवार,शाम - .३० बजे

चंद्रपुर (महाराष्ट्र)

Friday, 1 June 2018

"जल रहा आज मेरा बस्तर "

हर दिल में आतंक और दहशत ,
मन में डर बहुत समाया है |
जल रहा आज मेरा बस्तर ,
सीने में दर्द छिपाया है ||

कभी अमन-चैन बसता था जहां ,
सब दिन सब रात सुहाने थे |
रहते थे सब बिन डर -भय के ,
कितने रंगीन ज़माने थे  ||
पर सब कुछ सपना सा वो हुआ ,
अब हर पल  मौत का साया है ||
जल रहा आज मेरा बस्तर ,
सीने में दर्द छिपाया है ||


कुछ लोग नक्सली बन करके ,
वे खून की होली खेल रहे |
इनके जुल्मों को बस्तरिया ,
और वीर जवान हैं झेल रहे ||
दो पाटों के बीच पीस रहे ,
कहीं चैन आराम न पाया है ||
जल रहा आज मेरा बस्तर ,
सीने में दर्द छिपाया है ||

शासन के विकास की गंगा को ,
नक्सली हैं बहने नहीं देते |
जो इनकी बात नहीं माने ,
उन्हें चैन से रहने नहीं देते ||
जीवन जीना है वहां मुश्किल ,
अब लगे ये प्रीत पराया है ||
जल रहा आज मेरा बस्तर ,
सीने में दर्द छिपाया है ||

जहाँ ढोल -नगाड़े बजते थे  ,
पक्षी का कलरव होता था |
दिन भर थका हुआ बस्तर ,
जहाँ प्यार की नीद में सोता था ||
अब बारूदी बम्ब धमाकों से ,
सारा बस्तर गुंजाया है ||
जल रहा आज मेरा बस्तर ,
सीने में दर्द छिपाया है ||


मोहन श्रीवास्तव ( कवि )
रचना क्रमांक;- (1076),30/05/2018,tuesday,
in yashawant pur -lucknow express train.




Wednesday, 23 May 2018

"इक रोज अकेले जाना है "

इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है | 
दुनिया है गाँव रुदाली का ,
हमें उत्सव वहां मनाना है || 
इस भीड़ -भाड़ में ....... 

जानें पर बात नही मानें ,
विपदाओं का मनुहार करे | 
तुम्हे सत्य लगे या भरम लगे ,
होता वह जो करतार करे || 
हर दुःख में एक सहारा पर ,
हर सुख का कुछ हर्जाना है |
 इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है ||


संयोगी पाती पीत लिखे ,
कुछ विरह -मिलन के गीत लिखे | 
खर्चीली रिश्तेदारी में ,
सौ दुश्मन तब इक मीत लिखे || 
शांशो की टूटी माला तो ,
निर्जन में सेज बिछाना है |
इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है ||

कितना भी बड़ा खरीददार हो तूँ ,
लेकिन वो गाँव निराला है | 
जो करम का खाता खोलेगा ,
वो एक हिसाबी लाला है || 
सुध खोये हुए प्रवासी को ,
गीतों से मुझे जगाना है |
इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है ||

हर जोड़ शून्य हो जाता है ,
जाते हैं सभी भिखारी बन | 
तन थकते ही धन -दौलत पर ,
सुत बैठेंगे अधिकारी बन || 
तिनका -तिनका तुम जोड़ रहे ,
आखिर में सब लुट जाना है |
इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है || 

मतलब के मीत हजारो हैं ,
मोहन सब समझ छलावा है | 
तैयारी कर ले जाने की ,
घर वापस तेरा बुलावा है | 
इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है || 


इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है | 
दुनिया है गाँव रुदाली का ,
हमें उत्सव वहां मनाना है || 
इस भीड़ -भाड़ में ....... 

मोहन श्रीवास्तव (कवि )
 http://kavyapushpanjali.blogspot.in/2018/05/blog-post_23.html



रचना क्रमांक ;-1065
12/05/2017,शुक्रवार ,10:45 pm,झीट ,पाटन ,
दुर्ग (छ. गढ़)


Sunday, 13 May 2018

"उस कुल में मेरा जन्म न हो"

उस कुल में मेरा जन्म न हो ,
बेटी जिनको स्वीकार न हो |
जहां नफरत और अपमान मिले ,
और जीने का अधिकार न हो ||
उस कुल में मेरा ...........

कोख पे आरी चल जाती ,
और माँ ममता की उजड़ जाती |
जब कभी पिले हाथ हुए तो ,
दहेज की बलि है चढ़ जाती  ||

ऐसे हैवानों के यहाँ ,
मेरा अपना घर -द्वार न हो ...
उस कुल में मेरा ..........

जहां नारी का सम्मान न हो ,
ऐसे घर मेरा बिवाह न हो |
जहां शब्दों के तीन तलाक मिले ,
वहां मेरा कभी निकाह न हो ||

जहां हिंसा और हो मार -काट ,
वहां कभी मेरा ब्यवहार न हो ....
उस कुल  मे मेरा ...........

 ऐसे घर मेरा जन्म न हो ,
जहां मजहब की  दिवारें हों |
बेटी जिनको मंजूर न हो ,
और बेटे जिन्हें दुलारे हों ||

उस कोख की मुझको चाहत है ,
जिसमें मेरी खुशियाँ उधार  न हों ......

उस कुल में मेरा जन्म न हो ,
बेटी जिनको स्वीकार न हो |
जहां नफरत और अपमान मिले ,
और जीने का अधिकार न हो ||
उस कुल में मेरा ...........


मोहन श्रीवास्तव ( कवि )
रचना क्रमांक ;-( 1064 ),08/05/2017,
झीट ,पाटन ,दुर्ग (छ .ग )

Saturday, 7 April 2018

"शराब मुक्त हो छत्तीसगढ़ "


शराब मुक्त हो छत्तीसगढ़ ,ये हम सबकी मांग है|
बर्बाद हो रहा जनमानस,ये जलती हुई सी आग है || 

उस घर में सुख और चैन नही,जहाँ मदिरा पान किया जाता |
दूध -दही व् रस के बदले, हंस के जहर ये पिया जाता  ||
मार -पीट और नोक-झोंक व् तन तो उजड़ा बाग है ....  
शराब मुक्त हो छत्तीसगढ़ ,ये हम सबकी मांग है.....

अत्याचार महिलाओं पर ,और बच्चों में भय होता है |
करने से कमाई नही इनके ,धन का भी क्षय होता है ||
यह शराब का प्रचलन तो ,जैसे समाज पर दाग है........
 शराब मुक्त हो छत्तीसगढ़ ,ये हम सबकी मांग है.....

एक तरफ दारू बंदी का, सरकारी फरमान है |
और दूसरी तरफ हर जगह , दारू की  दुकान है ||
पूर्ण शराब बंदी ही हो ,ये हम सबका राग है ......
शराब मुक्त हो छत्तीसगढ़ ,ये हम सबकी मांग है.....

पीना नही और नही पिलाना ,सौगंध आज  हमे खाना है |
शराब मुक्त हो प्रदेश हमारा ,ये अभियान चलाना है ||
जीवन नही मृत्यु है यह ,काला  बिषैला नाग है........


शराब मुक्त हो छत्तीसगढ़ ,ये हम सबकी मांग है|
बर्बाद हो रहा जनमानस,ये जलती हुई सी आग है ||

मोहन श्रीवास्तव (कवि )
रचना क्रमांक ;-(1075)
06-04-2018







Wednesday, 4 April 2018

''इन जुल्फों के लहराने से"

इन जुल्फों के लहराने से ,कहीं मैं भटक न जाऊं |  
नज़रों का जाम पीके, कहीं मैं बहक न जाऊं      ||
इन जुल्फों के लहराने से........ 
 
नजदीक जैसे आग के,गलता है कोई मोम  | 
तेरे हुश्न के शोले से , कहीं मैं धधक न जाऊं || 
 इन जुल्फों के लहराने से........

अमराई गुनगुनाती  है,कोयल का तरन्नुम |
 पाजेब की रुनझुन से, कहीं मैं चहक न जाऊं || 
 इन जुल्फों के लहराने से........ 

बादल में ज्यों बिजली के,चमकने का असर हो | 
झुमके के पेंच में तेरे  ,कहीं मैं अटक न जाऊं    || 

इन जुल्फों के लहराने से........
खुश्बू घुली हवा में ज्यों,फूलों की छुअन से  | 
नाजुक तेरे अहसास से ,कहीं मैं महक न जाऊं || 

इन जुल्फों के लहराने से........
बहकर बयार बांवरा, छलकाए ज्यों  जज्बात   | 
मुझको संभालो आखों में ,कहीं मैं छलक न जाऊं || 

 
इन जुल्फों के लहराने से ,कहीं मैं भटक न जाऊं |  
नज़रों का जाम पीके, कहीं मैं बहक न जाऊं      ||




 मोहन श्रीवास्तव ( कवि )
रचना क्रमांक (1066)