Wednesday, 23 May 2018

"इक रोज अकेले जाना है "

इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है | 
दुनिया है गाँव रुदाली का ,
हमें उत्सव वहां मनाना है || 
इस भीड़ -भाड़ में ....... 

जानें पर बात नही मानें ,
विपदाओं का मनुहार करे | 
तुम्हे सत्य लगे या भरम लगे ,
होता वह जो करतार करे || 
हर दुःख में एक सहारा पर ,
हर सुख का कुछ हर्जाना है |
 इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है ||


संयोगी पाती पीत लिखे ,
कुछ विरह -मिलन के गीत लिखे | 
खर्चीली रिश्तेदारी में ,
सौ दुश्मन तब इक मीत लिखे || 
शांशो की टूटी माला तो ,
निर्जन में सेज बिछाना है |
इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है ||

कितना भी बड़ा खरीददार हो तूँ ,
लेकिन वो गाँव निराला है | 
जो करम का खाता खोलेगा ,
वो एक हिसाबी लाला है || 
सुध खोये हुए प्रवासी को ,
गीतों से मुझे जगाना है |
इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है ||

हर जोड़ शून्य हो जाता है ,
जाते हैं सभी भिखारी बन | 
तन थकते ही धन -दौलत पर ,
सुत बैठेंगे अधिकारी बन || 
तिनका -तिनका तुम जोड़ रहे ,
आखिर में सब लुट जाना है |
इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है || 

मतलब के मीत हजारो हैं ,
मोहन सब समझ छलावा है | 
तैयारी कर ले जाने की ,
घर वापस तेरा बुलावा है | 
इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है || 


इस भीड़ -भाड़ में मत भूलो ,
इक रोज अकेले जाना है | 
दुनिया है गाँव रुदाली का ,
हमें उत्सव वहां मनाना है || 
इस भीड़ -भाड़ में ....... 

मोहन श्रीवास्तव (कवि )
 http://kavyapushpanjali.blogspot.in/2018/05/blog-post_23.html



रचना क्रमांक ;-1065
12/05/2017,शुक्रवार ,10:45 pm,झीट ,पाटन ,
दुर्ग (छ. गढ़)


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