चाह नही मुझे ऐसी भेंट का, जब राहों में मैं फेंका जाऊं । मैं तो अपनी डाली में मस्त हूं, जहां हंसते हंसते मैं मर जाऊं ॥ ईनाम पुरष्कारों की नही चाह, जब नहीं मिले तो दुःख पाऊं । मैं तो अपनी डाली में मस्त हूं, जहां हंसते हंसते मैं मर जाऊं ॥ चाह मुझे उन अच्छे ईंषानों का, जिनके दिल मैं बस जाऊं । चाह मुझे उन सत्य पथिक का, जिनके चरणों में मैं चढ़ जाऊं ॥ चाह मुझे उन हवाओं का, जब मैं खुशबू उनके संग बिखराऊ । चाह मुझे भगवान के चरणों का, जहां हसते हसते मैं चढ़ जाऊं ॥ मोहन श्रीवास्तव (कवि)
Friday, 21 July 2023
बरसा ऋतु आय गई जब से
"बरसा रितु आय गई जब से"
बरसा रितु आय गई जब से ,जुबती जइसे मुसकाय धरा |
बुँदे जिमि पायल सी छनके , चहुँ ओर उड़ाय रहे बदरा ||
मदमस्त हुए सब जीव महा , धरती लहराय रही अंँचरा |
नवअंकुर फूट रहे थल में, सब दादुर देवत हैं पहरा || १||
मिल ताल - तलाइ रहे अब तो , सरिता जल सिंधु समाय रही |
नभ प्यास बुझाय रहा वसुधा , तरु से लतिका लिपटाय रही ||
बगियांँ अब मोर भी नाचि रहे , अरु कोयल गीत सुनाय रही |
जिनके पिय हैं परदेश बसे , बिरही मन में अकुलाय रही || २||
कृषिराज चले अब खेत सभी , जन ग्वालन धेनु चराय रहे |
सखियाँ सब धान लगावत हैं , बगुले नित ध्यान लगाय रहे ||
चहु ओर धरा अब होय हरी, रविराज लुकाय छिपाय रहे |
जब मध्यम तेज बयार चले , तरु शाख हिलाय डुलाय रहे || ३||
बदरा मिरदंग बजावत हैं , नभ में बिजुरी चमकाय रहे |
छपरी जिनकी अब टूट रही , धरिके सिर ओ बिलखाय रहे ||
बरसे जबहीं दिन मेघ घने , बस बैठि सभी बतलाय रहे |
सब खाय रहे भजिया - गुँझिया , सजना सजनी इतराय रहे || ४ ||
कवि मोहन श्रीवास्तव
http://kavyapushpanjali.blogspot.com/2018/07/blog-post_22.html
रचना क्रमांक ;-1083
22 / 07 /2018 , durg .c.g