Sunday, 9 October 2011

भारत के मुशाफ़िर खाने मे


लुट रहे आज हम देखो जरा,
मंदिर के गलियारो में !
बिक रहा देखो ईमान आज ,
बेइमानी के बाजारों में !!

ज़िश्म -फ़रोशी के अब धंधे,
पर्दे के पिछे चल रहे हैं !
सत्य के पथ पर चलने वाले,
ज़िंदे ही आज जल रहे हैं !!

जो धर्म के कभी रखवाले थे,
वे अधर्म का मार्ग अपनाने लगे !
भारत की सभ्यता को भुला करके,
अंग्रेजी फ़ैशन को भुनाने लगे !!

संचार क्रांति जब से आया,
बस लाज शर्म है दिखावे के !
लुटा रही है ईज्जत वे अपनी,
बेढंगे पहिनावे से !!

कानून-न्याय बिक रहा है आज,
दौलत के पैमाने में !
अपराधियों को ताज पहनाया जाता,
भारत के मुशाफ़िर खाने में !!
अपराधियों को ताज पहनाया जाता,
भारत के मुशाफ़िर खाने में .......


मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-०५/०५/२००१,बुद्धवार,
सुबह बजे,
थोप्पुर घाट ,धर्मपुरी, (तमिलनाडु)





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