Thursday, 13 October 2011

कितने जुल्म ढहाए थे उन पर

आजादी कि इस अनुपम बेला को,
हम खुश होके आज मनाते है !
इस दिन के लिए जो शहीद हुए ,
उन्हे हम श्रद्धा के सुमन चढ़ाते है !!

आजादी के पावन दिन पर,
जो हम सब आज खड़े है !
इसके लिए उन बीरों के ,
हम पर एहसान बड़े है !!

कितने वीरों ने गोली खाई,
कितनो का अपमान हुआ !
कितने -कितने लटके फ़ासी पे ,
और कितनो का बलिदान हुआ !!

कितनो कि मांगे सुनी हो गई,
कितनो कि गोदे खाली !
कितने -कितने बिछुड़ गए ,
और कितनों कि छिनी थी थाली !!

कितने ज़ुल्म ढहाए थे उन पर,
उन अंग्रेजी सिपह -सलारों ने !
कितनों कि ईज्जत लूटी थी,
उन भीड़ भरे बाज़ारों मे !!

हिन्दु-मुस्लिम-सिक्ख-इसाई ,
सबने अपने खून बहाए थे !
बहुत बड़ी मुश्किल से हमको,
अपनी आजादी वापस दिलाए थे !!

उनके सपनो को सच करना ही,
कर्तव्य हमारा पहला हो !
आजादी की रक्षा करना ,
हर दिल नहले पे दहला हो !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक -१५/०८/२००२ ,रात -.१५ बजे,

नामक्कल (तमिल नाडु)



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