Monday, 29 July 2013

जानम यूं इतराना ठीक नही



अंगड़ाई लेके मुस्कराकर,
फ़िर दिल का जलाना ठीक नही !
आहें भरना और इतराना ,
बिजली का गिराना ठीक नही !!

नागिन कि तरह चलना-फ़िरना ,
राहों मे ऐसे ठीक नही !
आंखो के नुकिले काजल से ,
मदिरा का पिलाना ठीक नही !!

हंस-हस के बातों को करके,
फ़िर मन को चुराना ठीक नही !
सर पर से सरकते दुपट्टे से,
धड़कन को बढ़ाना ठीक नही !!

बालों का सावन की घटा जैसे,
हवा मे लहराना ठीक नही !
अंग-अंग हो झलकते तो ऐसे,
कपड़ों का पहनना ठीक नही !!

गैरों से हो मिलना -जुलना ,
फ़िर अपनों से शर्माना ठीक नही !
फूलों कि खुशबू को देकर,
फ़िर कांटो का चुभाना ठीक नही !!

मदमस्त जवानी को पाकर ,
बुढ़ापे को भुलाना ठीक नही !
उजाले से भरी इन रातों मे,
दिन का बिसराना ठीक नही !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक- १३/०७/२००० ,वॄहस्पतिवार ,रात - ११.५५ बजे ,

चंद्रपुर (महाराष्ट्र)
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