Monday, 8 July 2013

कविवर हृदय अटल जी का



कविवर हृदय अटल जी का,
जो दुश्मन की चाल ना थे समझ पाए
मीठा जहर वो पिला रहा था,
उसकी बातों को वे ना समझ पाए॥

कर रहे थे यात्रा बस से वे,
उसका पिछला इतिहास नही देखे
उसकी कुटिल मुस्कानों के पिछे,
कांटों का झाड़ नही देखे

आखें खुली थी हमारी तब,
जब दुश्मन अन्दर घुस आए
कुंभकर्ण की नींद मे सोए थे हम,
जब आखें खुली तो पछताए

पर मार भगाये थे हम उनको,
तब अपनी भुमि छुड़ाये थे हम
अपने कुछ वीरों की आहुति देकर,
सीमा पर तिरंगा फहराये थे हम

तब पाकी समझ गये थे कविवर को,
कोमल है ,पर कठोर भी है
दोस्तों के लिए वो दोस्त है,
पर दुश्मनों के लिये तो वो बोझ भी है

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
rewised on,22-06-2013,saturday,

raipur,chhattisgarh.
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