Friday, 2 August 2013

एक नही सौ-सौ दुर्गा

एक नहीं सौ-सौ दुर्गा,
जो इस देश पे, मर-मिट जाती हैं
अपनी कर्तव्य, परायणता से,
वे पीछे कदम, नहीं हटाती हैं

आंधी नही, तूफान हैं ये,
अब इन्हें रोकना ,मुश्किल होगा
ये भारत की, शान हैं वे,
इन्हें अपमानित करना, मुश्किल होगा

वीरों की धरती है ये,
यहां कई वीर, पैदा होते
अपने प्राणों की, बाजी लगा,
वे ऐसे ही काम, किया करते

हमें गर्व हो ऐसे लोगों पर,
जो अपना सही, कर्तव्य निभाते हैं
पर उनको ईनाम, के बदले,
उन पर ऐसे ही जुल्म, ढहाए जाते हैं

पर सही राह पे, चलना है तो,
उन्हें ऐसे ही अग्नि परीक्षा से, गुजरना पड़ता
पर सत्यमेव जयते, भी उसी की,
और हमें और बहादुर, बनना पडता

हमें ऐसे लोगों के, सम्मान हेतु,
दिल खोलकर, सामने आना होगा
सरकारों के साथ हमें,
उन्हें उचित न्याय, दिलाना होगा

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
03-08-2013,4am,saturday,

pune,m.h.
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