Friday, 23 August 2013

प्याज के आंसू अभी रो रहे हैं सब


मंहगाई की आग मे, जलते हुओं का,
अब तो कुछ, बाकी रहा
चाम-मांस तो, जल गये हैं पहले,
अब तो अस्थि-अस्थि, ही बचा रहा

सरकारों की गलत, नीतियों के चलते,
सब कुछ इनका, तबाह हुआ
घुट-घुट कर, रहते हैं लोग,
अब तो जीना, बहुत बेहाल हुआ

सुरसा जैसी, मंहगाई मे अब,
लोग सुनहरे सपने, भूल रहे
आगे का जीवन, जीयेंगे कैसे,
सब के हाथ-पांव है, फूल रहे

अब बजट बजट बनाते, नही हैं लोग,
क्योंकि बजट मे आग, लग जाता है
किमतें बढ़ रही हैं, अब रोज-रोज,
जिससे उनका सपना, चौपट हो जाता है

क्या खायेंगे,कैसे पढ़ायेंगे?,
और कैसे करेंगे, बेटियों की शादी
प्याज के आसूं, अभी रो रहे हैं सब,
और आगे मंहगाई से, लिखा है बर्बादी
प्याज के आसूं, अभी रो रहे हैं सब,
और आगे मंहगाई से, लिखा है बर्बादी......

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
21-08-2013,wednesday,11:45pm,
pune,maharashtra.


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