Saturday, 1 February 2014

बदनाम गली (ऐसी ही दर्द भरी चित्कारों से)

इतना मत जुल्म ढहावो मुझ पर,
ना मुझ पर इतना अत्याचार करो
मैं भी किसी की हूं बेटी,
ना हमसे इतना क्रूर व्यवहार करो

आंटी,अंकल मैं पांव पड़ रही,
मुझ पर इतना ना जुल्म करो
जिस्म फरोशी के धंधे के लिये,
नहीं मुझे मजबूर करो

मेरा जीवन तबाह हो जायेगा,
ना ही मुझे कोई अपनायेंगे
मेरे घर के परिवार सभी,
जीते जी मर जायेंगे

माँ जीते जी मर जायेगी,
मेरे पापा कहां मुंह दिखायेंगे
जब तक जियेंगे लोगों में,
नफरत से देखे जायेंगे

ऐसी ही दर्द भरी चित्कारों से,
वो उन सबसे विनती करती होगी
जब कोई अबला या बेटी,
जिस्म फरोशों के जाल मे फसती होगी
जब कोई अबला या बेटी,
जिस्म फरोशों के जाल मे फसती होगी.....

मोहन श्रीवास्तव(कवि)
31-01-2014,Friday,05:00pm,(848)

Pune,M.H.




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