Friday, 30 September 2011

मैं हूं कांटा, तुम तो गुलाब


मद होश हो गया तेरे रूप-रंग से,
नयनों के बाण से घायल हुआ!
तेरी रेशमी ज़ुल्फ़ों के प्रहार से,
सचमुच मै पागल सा हुआ!!

मुस्कान तुम्हारी जीवन बन गई,
बाहें जो गले का हार बना!
है रात अंधेरी पर तेरा मुख चंदा,
नफ़रत जो तुम्हारा प्यार बना!!

हम दूर-दूर व अंजाने थे,
कैसे हम दोनों निकट आए!
जब घड़ी मिलन की आई तो,
गगन मे बादल हैं छाए!!

रहता हूं जहां ,तुम भी तो वहां,
तुम्हे दिल मे तो सजा के रखता हूं!
मैं हूं कांटा, तुम तो गुलाब,
तेरी खुशबू के तले मै रहता हूं!!

पास आ गए हम दोनों,
अब दूर तो जाना मुश्किल है!
कभि दूर हुई,यदि तुम मुझसे,
तब मोहन की मौत तो निश्चित है!!

  मोहन श्रीवास्तव
  दिनांक-२५/०७/१९९९, रविवार,रात १२.४५ बजे
  चंद्रपुर(महाराष्ट्र)

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