Thursday, 6 October 2011

बस पापी पेट का सवाल है

सूरज की तपती गर्मी या,
अग्नि की धधकती ज्वाला हो !
आंधी -तूफ़ान या बारिस हो,
घना अंधकार या उजाला हो !!

सह सकता है जीव सभी कुछ,
पर पेट का मार नही सह सकता है !
पेट की भूख मिटाने के लिए,
यह मौंत से भी लड़ सकता है !!

प्राणों से प्रिय अपने परिजनों का,
यह त्याग कर सकता है !
इनके पेटों को भरने के लिए,
यह अपना भी बलिदान कर सकता है !!

पेट के कारण कभी-कभी,
ईंसान सत्य से बिचलित हो जाता है !
अपने सम्मान को दावं लगा,



कभी-कभी यह अपमानित हो जाता है !!

कोई नही दुनिया मे ऐसा,
दिखता नही मिशाल है !
हर जगह एक ही प्रश्न है ?
बस पापी पेट का सवाल है ?
बस पापी पेट का सवाल है ?

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
रचना की तारीख-१३/०२/२००१,मंगलवार,
सुबह१०.०५ बजे, थोप्पुरघाट,धर्मपुरी,(तमिलनाडु) ,


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