Saturday, 10 March 2012

मां की ममता

मेरे लाल, आंचल मे छिपा लूं मै तुम्हें !
कब से रूठा है तू ,सीने से लगा लूं मै तुम्हें !!
मेरे लाल...........

तू जब नन्हा सा था खिलौना,मेरी इन बाहों का !
जब कभी हंसता था, तो खुशियां मिलती थी हमें !!
मेरे लाल........

तेरे रोने से पहले, मै भी रोने लगती !
लोरियां गाती हुई, थपकी से सुलाती थी तुम्हें !!
मेरे लाल.........

तेरे सोने जैसे मुखड़े, को सजाती रहती !
सारी दुनिया की ,नज़रों से बचाती थी तुम्हें !!
मेरे लाल.........

जब कभी सीने से ,मेरे तुम जुदा होते थे !
ठंडी रातों मे, गर्म बिस्तर पे लिटाती थी तुम्हे !!
मेरे लाल................

अब जब तू दूर, चला ही गया है मेरे से !
तू जहां भी रहे ,तुझे लाखों है दुआएँ मेरी!!
मेरे लाल........

कभी ठोकर ना लगे, कांटा चुभे तेरे पावों में !
मै मिलुंगी , तू जहां भी रहे तेरे राहों में !!
मेरे लाल............

तूं सदा खुश रहे, और लगे मेरी ऊमर !
तू सूरज की तरह चमके,और आसान हो जीवन का सफ़र !!

मेरे लाल, आंचल मे छिपा लूं मै तुम्हे !
कब से रुठा है तू,सीने से लगा लूं मै तुम्हे !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
१७//१९९९,सोमवार,शाम बजे,

चन्द्रपुर महा.

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