Friday, 16 August 2013

कजरी (सखी सावन क, अइसन बहार बा)

सखी सावन , अइसन बहार बा,
जिया बेकरार, बा ना...
सखी रिमझिम , अइसन बरसात बा,
जिया बेकरार, बा ना....
सखी सावन , अइसन.......

झुला पड़ा, चारों ओर
नाचे मोर, चहुं ओर
लागत प्रेम, डोर
दिल में होत, बा अजोर
सखी मन , हमार तो, पतंग भा..
जिया बेकरार, बा ना....
सखी सावन , अइसन.......

घटा घेरे, घनघोर।
पानी बरसे, बड़ा जोर
देखो पपिहा, करे शोर
दादुर बोले, जोर-जोर
सखी रहि-रहि के, बिजुरी चमकात बा...
जिया बेकरार, बा ना....
सखी सावन , अइसन.......

चारों ओर बा, हरियाली
खुश हो रहल, बा माली
कहीं होत बा, बोआई
कहीं धान , रोपाई
सखी हिल-मिल के, गीत गवात बा...
जिया बेकरार, बा ना....
सखी सावन , अइसन.......


जेके पिया हैं, परदेश
ओके सावन, लागे जेठ
ना ही सजते, उनके केश
ना ही बढ़ियां, सा बेष
सखी बिरहिनि के, सावन , सोहात बा....
जिया बेकरार, बा ना...

सखी सावन , अइसन बहार बा,
जिया बेकरार, बा ना...
सखी रिमझिम , अइसन बरसात बा,
जिया बेकरार, बा ना....
सखी सावन , अइसन.......

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavypushpanjali.blogspot.com
07-08-2013,wednesday,7.35pm,
pune,m.h.




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