Tuesday, 3 September 2013

यदि सच्चे अर्थों मे कोई संत है तो,

संत सदा से रहे हैं इस धरा पे,
और आगे भविष्य़ मे रहेंगे भी
उनके ही आशिर्वचनों से,
हम फूल और फल रहे हैं सभी

पर आज के संतों को देखो,
वे अपनी खुब तिजोरी भर रहे हैं
और काम-वासना मे अंधे हो,
संतों के नाम को कलंकित कर रहे हैं

गृहस्थ आश्रम वाले तो,
बेचारे कंगाल हो रहे हैं
पर संत,पादरी,मुल्ला अब,
खुब मालामाल हो रहे हैं

यदि सच्चे अर्थों मे कोई संत है तो,
उसे काम-माल की जरुरत क्यों
धन-दौलत-परिवार बंग्ला,
उन्हें भौतिक सुख की जरुरत क्यों

पाप कर्म कोई भी करे,
पर पाप का घड़ा तो फूटता ही है
इनके ऐसे कृत्यों को देख-देख कर,
लोगों का दिल तो टुटता ही है

पर आज के इस परिवेश मे भी,
बहुत संत ऐसे भी हैं
जिन्हें काम-दाम की चाह नही,
और उनसे आशिर्वाद हमें मिलते भी हैं

और उनसे आशिर्वाद हमें मिलते भी हैं .......


मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com,

03-09-2013,tuesday,1pm,
pune,maharashtra.


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