Wednesday, 19 October 2011

सत्ता-सुख से बढ़कर कोइ सुख है नही

सत्ता-सुख से बढ़कर कोइ सुख है नही,
जो कि राम -रहीम को भी भुला देता !
जिनके बल पे वे कुर्सी पाते,
उसकी तरफ़ से वह  आंख घुमा लेता !!

आज का ऐसा सत्ता सुख है,
कि तु चल मै भी आता हूं !
खाली झोली तुम भर लो अपनी,
मै भी अपनी झोली लेकर आता हूं !!

उन गरीबों के वोटों से बनी ये थैली,
जो उनके खुन के रंग से रंगा है !
आसूवों से उनके ये साफ़ हुई,
ये राजा बन गए, वह बना भिखमंगा है !!

सत्ता- सुख का बड़ा करिश्मा,
जो तुम्हे कंगाल से करोण पति बना देता !
तुम्हे झोपड़ी से महलों मे ला करके,
ये तुम्हे रातो-रात अतीत मे पहुंचा देता !!

सत्ता सुख का दॄश्य बहुत है मनोरम,
जिसमें पलक कभी गिरता हि नही !
यदि पलक गिरा तो कुर्सी से गिरे,
फ़िर सत्ता का सुख मिलता हि नही !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)



दिनांक - ०९/११/२००० ,बॄहस्पतिवार,रात- ००.४५ बजे,
चंद्रपुर(महाराष्ट्र)


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