Thursday, 17 November 2011

हम चाह तुम्हारी करते है


हम चाह तुम्हारी करते हैं,
ऐसी मेरी तकदीर कहां !
सेजों को सजाए बैठे है,
जावो मेरी तश्वीरे जहां !!

हम मस्त हुए है खयालों मे,
शबनम से बनी तुम नूरजहा !
तेरी राहों मे हम बैठे,
जावो मेरी वो जाने अदा !!

तुम शिशा हो, संगमर्मर हो,
तुम आशावों की समुन्दर हो !
तुम चलती-फिरती परी कोई,
जो आशिकों के दिल के अंदर हो !!

जब से देखा है तुमको हम
तेरे आशिक हो गए है हम !
दिन रात तुम्हारी हम राह तकें,
जावो मेरी वो शाने गजल  !!

हम तुम्हारे जवानी के दिवाने हुए
जाने कितने फ़साने हुए !
मेरे मुहब्बत की आरजू,
जावो मेरी वो मस्त परी !!

मेरे दिल की शीश महल
घायल कर रही तुम्हारी अदा !
तुम चाहे जैसे भी जावो
तेरी बाहों मे हम झूलें !!

हम तेरी मुहब्बत के प्यासे
हमको तो बना लो किसी नाते !
मेरी सरकार तुम जावो
फ़ूलों से राह सजाए है !!

मेरी चन्दा तुम हो रुखसाना
हम है तेरे दिवाने !
तेरे प्यार मे पागल हो गए हम,
जावो मेरी वो ताज महल !!
दिन- रात तड़पते है तुझ -बिन
अब मत मारो मेरी राजकुवंरि

हम चाह तुम्हारी करते है
ऐसी मेरी तकदीर कहा......

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-१२/०४/१९९१,
एन.टी.पी.सी. दादरी,गाजियाबाद(.प्र.)





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