Thursday, 17 November 2011

तेरे पास मै आना चाहता हूं

तेरे पास मै आना चाहता हूं
आऊं मै कैसे बतावो मेरी जा..

तेरे हुश्न की अनेको है बोलें
तुम कैसे भी आवो अपना बना ले,
मेरी सनम करो अब रहम
मै तुझको पाना चाहता हूं
तेरे पास मै आना चाहता हूं

ये पक्की दीवार है बीच मे
मै इस पार,तुम उस पार
कैसे भी आवो वो मेरी वफ़ा
तेरे पास मै आना चाहता हूं

तुम हो कितनी भोली ये खुद को पता
तुम्हारी कोमल काम -कला
मेरी जीवन की मस्ती तुम्ही हो
सुबो-शाम मै देखना चाहता हूं
तेरे पास मै आना चाहता हूं

तुम्ही मेरे दिल की वो नन्ही परी हो
किताबों पे तुम्ही रोशनी हो
मै दिन-रात, मै दिन रात
तुझे तरासना चाहता हूं
सजा सह रहा हूं मजा चाहता हूं
तेरे पास मै आना चाहता हू

तुम मेरे बागों की कच्ची कली हो
मेरी निगाहों से सुन्दर भली हो
तुम्हारी कंठों की आवाज को हम
सदा ही सदा सुनना चाहता हूं
अर्ज कर रहा हूं
कर्ज चाहता हूं
आऊं मै कैसे ,बतावो मेरी जा
तेरे पास मै आना चाहता हूं......

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-१३//१९९१

,एन.टी.पी.सी. दादरी, गाजियाबाद(.प्र.) 
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