Thursday, 17 November 2011

बच्चे


बच्चों के खेल हैं कैसे ।
जैसे नन्ही रेल हो जैसे ॥

इनमे आपस मे कितना प्यार ।
ए राम-कॄष्ण अवतार ॥

ये आपस मे है भाई ।
नही इनकी किसी से बुराई ॥

इनमे राग-द्वेष नही होता।
इनमे कोई बड़ा न छोटा ॥

ईश्वर ने इनकी प्रीति बनाई।
जैसे मधुर वाद शहनाई॥

ये कैसे भोले-भाले ।
इनके दिल होते नही काले ॥

इनकी ओतली-तोतली भाषा ।
इनसे है बहुत सी आशा ॥

तुम आपस मे हो क्यों लड़ते ।
लड़-लड़ कर क्यों हो मरते ॥

इनसे शीक्षा तुम ले लो ।
तुम इनके साथ हो खेलो ॥

तुम क्यों बनते शैतान ।
इनसे ले लो अब ग्यान ॥

मत बेचो दीन-ईमान ।
बन जाओ नेक ईंषान ॥

इन नन्हे-मुन्नो की दुनिया ।
ढेरों लाती हैं खुशियां ॥

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-१५//१९९१
एन.टी.पी.सी. दादरी, गाजियाबाद (.प्र.)



Post a Comment