Sunday, 20 November 2011

गजल(तुम ही मेरी मुकद्दर की तकदीर हो)


तुम ही मेरी मुकद्दर की तकदीर हो
मै तुम्हारे सहारे ही जीता रहा
आज ऐसे अचानक तुम क्यु रूटी हो
मै तुम्हारे गमो को भी पिता रहा
तुम ही मेरी मुकद्दर..
आज तेरी बेवफ़ा से हैरान हू
कोई नही है मुझे रास्ता
फ़िर भी मै हु तुम्हारे पिछे पड़ा
दे रहा हु तुझे प्यार का वास्ता
तुम ही मेरी मुकद्दर की ...
चली जावोगी तुम जब इस स्थान से
य्शा कोई न होगा सहारा मेरा
मै भी जाउंगा उसी कब्रिस्तान मे,
वहा कोई तो होगा किनारा मेरा!!
तुम ही मेरी मुकद्दर...
मै तेरी इक ही अदा पे हुआ था घायल
आज तुमने मुझसे कैसा धोखा किया!
मै तुम्हारी वफ़ा का क्या दाद दू
हमसे तुमने ये कैसा बदला लिया!!
तुम ही मेरी...
तुम्हे ऐसा ही करना था यदि इस तरह
तुम फ़साई क्यु अपनी जाल मे!
मै तुम्हारा शुकिरिया कैसे करू
मै फ़सा हू तुम्हारे ही जाल मे!!
तुम ही मेरी मुकद्दर...
तुमने हमसे किया था बहुत सी वादे
उन वादो का कोई जवाब नही!
मै तुम्हारी ही वादो पे लुट गया
खाली बोतल जिसमे शराब नही!!
तुम ही मेरी मुकद्दर की...

मोहन श्रीवास्तव
दिनांक-२०/५/१९९१, सोमवार,दोपहर-११.३० बजे,
एन.टी.पी.सी.दादरी,गाजियाबाद(उ.प्र.)
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